



डॉ. संतोष राजपुरोहित.
वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आई गिरावट ने एक बार फिर आम उपभोक्ता के मन में यह सवाल खड़ा कर दिया है कि जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर क्रूड ऑयल सस्ता हो रहा है तो भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतें कम क्यों नहीं हो रहीं? हाल ही में विभिन समाचार पत्रों में प्रकाशित रिपोर्ट ने भी इसी विरोधाभास को रेखांकित किया कि वैश्विक बाजार में तेल की नरमी के बावजूद घरेलू बाजार में उपभोक्ता को वैसी राहत नहीं मिल पा रही, जिसकी उम्मीद की जाती है। यह केवल कीमतों का नहीं बल्कि ऊर्जा अर्थव्यवस्था, सरकारी राजस्व और वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच संतुलन का प्रश्न है।
भारत दुनिया के सबसे बड़े ऊर्जा उपभोक्ताओं में से एक है। देश अपनी कच्चे तेल की लगभग 85 प्रतिशत से अधिक जरूरत आयात के माध्यम से पूरी करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव भारत की अर्थव्यवस्था को सीधे प्रभावित करता है। वर्ष 2026 में ब्रेंट क्रूड की कीमतों में उल्लेखनीय नरमी आई और यह लगभग 70 से 75 डॉलर प्रति बैरल के दायरे में पहुंच गया, जबकि रूस-यूक्रेन युद्ध और भू-राजनीतिक तनाव के दौर में यह 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर जा चुका था। सामान्य उपभोक्ता को लगता है कि जब कच्चा तेल सस्ता हुआ है तो पेट्रोल-डीजल भी तुरंत सस्ता होना चाहिए, लेकिन ईंधन मूल्य निर्धारण की वास्तविकता इससे कहीं अधिक जटिल है।

भारत में पेट्रोल और डीजल की अंतिम कीमत केवल कच्चे तेल की लागत से तय नहीं होती। इसमें रिफाइनिंग लागत, परिवहन खर्च, तेल कंपनियों का मार्जिन, डीलर कमीशन तथा केंद्र और राज्य सरकारों के कर शामिल होते हैं। पेट्रोलियम उत्पाद अभी भी जीएसटी के दायरे से बाहर हैं। केंद्र सरकार उत्पाद शुल्क तथा राज्य सरकारें वैट के माध्यम से राजस्व प्राप्त करती हैं। यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट का पूरा लाभ सीधे उपभोक्ता तक नहीं पहुंच पाता।
तेल कंपनियों की वित्तीय स्थिति भी इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। जब वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में तेज वृद्धि हुई थी, तब भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतों को लंबे समय तक नियंत्रित रखा गया ताकि आम जनता को महंगाई का बड़ा झटका न लगे। इसके परिणामस्वरूप तेल विपणन कंपनियों को लागत दबाव का सामना करना पड़ा। अब जब वैश्विक बाजार में कीमतें कम हुई हैं, कंपनियां अपने वित्तीय संतुलन को सुधारने का प्रयास कर रही हैं।

रुपये और डॉलर का समीकरण भी तेल कीमतों की कहानी का महत्वपूर्ण हिस्सा है। भारत कच्चा तेल डॉलर में खरीदता है। यदि डॉलर मजबूत और रुपया कमजोर होता है तो कम कीमत वाला तेल भी भारतीय मुद्रा में उतना सस्ता नहीं पड़ता। इसलिए केवल डॉलर में क्रूड ऑयल की कीमत देखकर घरेलू पेट्रोल-डीजल कीमतों का अनुमान लगाना सही नहीं है।
इसके अलावा सरकार के सामने भी एक आर्थिक चुनौती रहती है। पेट्रोलियम उत्पादों से प्राप्त कर राजस्व केंद्र और राज्यों के लिए आय का महत्वपूर्ण स्रोत है। इस राजस्व का उपयोग आधारभूत ढांचे, सड़क निर्माण और विभिन्न विकास योजनाओं में किया जाता है। यदि ईंधन पर करों में अचानक बड़ी कमी की जाए तो राजकोषीय संतुलन प्रभावित हो सकता है।
हालांकि इसका दूसरा पक्ष उपभोक्ताओं से जुड़ा हुआ है। महंगा पेट्रोल और डीजल परिवहन लागत को बढ़ाता है, जिसका प्रभाव खाद्य वस्तुओं से लेकर दैनिक उपयोग की वस्तुओं तक दिखाई देता है। ईंधन की कीमतों में कमी न केवल आम नागरिक को राहत देती है बल्कि महंगाई नियंत्रण और मांग बढ़ाने में भी सहायक हो सकती है।

आज भारत ऊर्जा सुरक्षा के एक परिवर्तनशील दौर से गुजर रहा है। सरकार एक ओर पारंपरिक ईंधन पर निर्भरता कम करने के लिए इलेक्ट्रिक वाहन, ग्रीन एनर्जी और वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों को बढ़ावा दे रही है, वहीं दूसरी ओर वर्तमान आर्थिक आवश्यकताओं को भी संतुलित करना पड़ रहा है।
क्रूड ऑयल की कीमतों में कमी और पेट्रोल-डीजल की कीमतों के बीच सीधा संबंध मानना उचित नहीं है। वास्तविकता यह है कि ईंधन कीमतें वैश्विक बाजार, कर नीति, मुद्रा विनिमय, तेल कंपनियों और सरकारी वित्तीय रणनीति के संयुक्त प्रभाव से तय होती हैं। उपभोक्ताओं को वास्तविक राहत तभी मिल सकती है जब वैश्विक तेल कीमतों में स्थायी कमी, मजबूत रुपया और संतुलित कर नीति एक साथ दिखाई दें। यही भारत की ऊर्जा अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी चुनौती और आवश्यकता है।
-लेेखक भारतीय आर्थिक परिषद के सदस्य हैं






