



डॉ. संतोष राजपुरोहित.
हाल के समय में भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले लगातार दबाव में रहा है। एक वर्ष पहले जहाँ डॉलर के मुकाबले रुपया अपेक्षाकृत मजबूत स्थिति में था, वहीं अब उसकी विनिमय दर में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है। यह केवल सामान्य मुद्रा उतार-चढ़ाव नहीं है, बल्कि वैश्विक आर्थिक और भू-राजनीतिक परिस्थितियों से उत्पन्न एक गंभीर बाहरी झटका है। विशेष रूप से अमेरिका द्वारा व्यापारिक टैरिफ बढ़ाना तथा पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्ष ने वैश्विक वित्तीय बाजारों को अस्थिर कर दिया है, जिसका सीधा प्रभाव भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ा है।
रुपये पर बढ़ते दबाव का सबसे बड़ा कारण विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों द्वारा बड़े पैमाने पर पूंजी निकासी है। जब विदेशी निवेशक किसी देश के शेयर और बॉन्ड बाजार से तेजी से पैसा निकालते हैं, तो उस देश की मुद्रा पर दबाव बढ़ना स्वाभाविक हो जाता है। भारत के साथ भी यही हुआ। विदेशी निवेशकों ने बड़ी मात्रा में पूंजी निकालकर अमेरिकी परिसंपत्तियों की ओर रुख किया, क्योंकि वैश्विक अनिश्चितता के समय अमेरिका को अपेक्षाकृत सुरक्षित निवेश स्थल माना जाता है। परिणामस्वरूप डॉलर की मांग बढ़ी और रुपया कमजोर हुआ।

यह स्थिति कई लोगों को आश्चर्यचकित करती है क्योंकि भारतीय अर्थव्यवस्था की बुनियादी संरचना अभी भी अपेक्षाकृत मजबूत मानी जाती है। भारत विश्व की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ भी आने वाले वर्षों में भारत की विकास दर को मजबूत मान रही हैं। इसके बावजूद रुपया दबाव में है। इसका कारण यह है कि अल्पकाल में विनिमय दरें केवल आर्थिक आधारभूत कारकों से निर्धारित नहीं होतीं, बल्कि वैश्विक पूंजी प्रवाह, निवेशकों की मनोवृत्ति और भू-राजनीतिक जोखिम भी उन्हें प्रभावित करते हैं।

भारत के व्यापार संतुलन की स्थिति भी चिंता का विषय बनी हुई है। आयात, विशेषकर कच्चे तेल और गैस पर निर्भरता, भारत को वैश्विक ऊर्जा झटकों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील बनाती है। भारत अपनी तेल आवश्यकताओं का अधिकांश हिस्सा आयात करता है। यदि पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ता है या तेल आपूर्ति बाधित होती है, तो तेल की कीमतों में तीव्र वृद्धि हो सकती है। इसका सीधा प्रभाव भारत के आयात बिल, चालू खाते के घाटे और रुपये की स्थिरता पर पड़ेगा।

रुपये की कमजोरी का एक सीमित लाभ निर्यातकों को अवश्य मिलता है क्योंकि विदेशी मुद्रा में प्राप्त आय का मूल्य रुपये में अधिक हो जाता है। लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में यह लाभ भी सीमित है। भारत के कई निर्यात उद्योग आयातित कच्चे माल पर निर्भर हैं। जब रुपया कमजोर होता है तो इन उद्योगों की उत्पादन लागत भी बढ़ जाती है, जिससे उनकी अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धात्मकता कम हो सकती है। इसलिए गिरता रुपया स्वतः निर्यात वृद्धि की गारंटी नहीं देता।

इस परिस्थिति में सबसे बड़ी चुनौती मुद्रास्फीति की है। जब रुपया कमजोर होता है, तो आयातित वस्तुएँ महंगी हो जाती हैं। तेल, गैस, उर्वरक और अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि धीरे-धीरे पूरे अर्थतंत्र में फैल जाती है। परिवहन लागत बढ़ती है, उत्पादन लागत बढ़ती है और अंततः उपभोक्ताओं को महँगाई का सामना करना पड़ता है। यदि सरकार तेल की कीमतों का पूरा बोझ स्वयं वहन करती है, तो राजकोषीय घाटा बढ़ सकता है। दूसरी ओर यदि कीमतों का पूरा भार उपभोक्ताओं पर डाला जाता है, तो जीवन-यापन की लागत बढ़ेगी और उपभोग प्रभावित होगा। इसलिए सरकार के सामने संतुलन बनाए रखने की कठिन चुनौती है।
भारतीय रिज़र्व बैंक की स्थिति भी जटिल हो गई है। एक ओर उसे रुपये की अत्यधिक गिरावट रोकनी है, दूसरी ओर मुद्रास्फीति को नियंत्रित करना है तथा आर्थिक वृद्धि को भी बनाए रखना है। विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप करके आरबीआई अस्थिरता को कम कर सकता है, लेकिन लगातार हस्तक्षेप से विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव पड़ता है। यदि वैश्विक संकट लंबा चलता है, तो केवल भंडार के सहारे स्थिति संभालना कठिन हो सकता है।
ऐसी परिस्थितियों में भारत को बहुआयामी रणनीति अपनानी होगी। सबसे पहले कूटनीतिक स्तर पर वैश्विक तनाव कम करने और व्यापारिक अवरोधों को घटाने के प्रयास आवश्यक हैं। अमेरिका जैसे प्रमुख व्यापारिक साझेदारों के साथ संवाद बढ़ाना महत्वपूर्ण होगा। दूसरा, भारत को प्रत्यक्ष विदेशी निवेश आकर्षित करने के लिए सुधारों की गति तेज करनी होगी ताकि दीर्घकालिक स्थिर पूंजी प्रवाह सुनिश्चित हो सके।
तीसरा, ऊर्जा सुरक्षा को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाना होगा। वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों जैसे सौर ऊर्जा, हरित हाइड्रोजन और जैव ईंधन में निवेश बढ़ाना समय की आवश्यकता है। साथ ही तेल, गैस और खाद्यान्न के रणनीतिक भंडारण को भी मजबूत करना होगा ताकि वैश्विक आपूर्ति बाधाओं के समय देश अधिक सुरक्षित रह सके।
इसके अतिरिक्त सरकार को राजकोषीय अनुशासन बनाए रखना होगा। अत्यधिक सब्सिडी या अल्पकालिक लोकलुभावन उपाय भविष्य में आर्थिक असंतुलन को बढ़ा सकते हैं। यदि वैश्विक परिस्थितियाँ और बिगड़ती हैं, तो मौद्रिक नीति के तहत ब्याज दरों में वृद्धि भी आवश्यक हो सकती है, भले ही उसका अल्पकालिक प्रभाव निवेश और विकास पर पड़े।
वर्तमान संकट भारत के लिए केवल चुनौती नहीं बल्कि एक चेतावनी भी है। यह स्पष्ट हो चुका है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में अत्यधिक परस्पर निर्भरता के दौर में बाहरी झटकों से पूरी तरह बच पाना संभव नहीं है। इसलिए भारत को ऐसी आर्थिक संरचना विकसित करनी होगी जो वैश्विक अस्थिरताओं के बावजूद अधिक लचीली और आत्मनिर्भर हो। मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार, संतुलित राजकोषीय नीति, ऊर्जा आत्मनिर्भरता और दीर्घकालिक निवेश आधारित विकास ही भविष्य में रुपये और भारतीय अर्थव्यवस्था को स्थिरता प्रदान कर सकते हैं।
-लेखक भारतीय आर्थिक परिषद के सदस्य हैं




