



शंकर सोनी
नारी शक्ति वंदन अधिनियम ‘जनगणना’ और ‘परिसीमन’ की फाइलों में दब गया है। सच तो यह है कि महिलाओं को संसद पहुँचाने के लिए किसी संवैधानिक संशोधन या जटिल कानून की आवश्यकता ना कभी थी और ना ही अब है। आवश्यकता बस एक साफ ‘नीयत’ की है। कानून का तो बहाना है। राजनीतिक दल अक्सर यह तर्क देते हैं कि कानून लागू होते ही हम महिलाओं को आरक्षण देंगे। यह वैधानिक झूठ के सिवा कुछ नहीं है। क्या भारत का संविधान या ‘जनप्रतिनिधित्व अधिनियम’ किसी भी दल को अपनी मर्जी से 33 फीसद या 50 फीसद महिलाओं को टिकट देने से रोकता है ? जवाब है, नहीं।
अगर दलों की नीयत साफ होती, तो वे आज ही अपनी चयन समितियों में यह निर्णय ले सकते थे कि आगामी चुनावों में उनकी कम से कम एक-तिहाई प्रत्याशी महिलाएं होंगी। लेकिन कड़वा सच यह है कि ‘जिताऊ उम्मीदवार’ की आड़ में पार्टियाँ धनबल, बाहुबल और पुराने पितृसत्तात्मक ढांचे को ही प्राथमिकता देती हैं।

दशकों पहले यह तर्क शायद दिया जा सकता था कि ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षित महिला नेतृत्व की कमी है। लेकिन 2026 के भारत में यह दलील बेमानी है। आज देश की महिला साक्षरता दर 75 फीसद के करीब है। हर साल लाखों महिलाएं स्नातक और परास्नातक होकर निकल रही हैं। जब महिलाएं सेना के मोर्चे से लेकर अंतरिक्ष और न्यायपालिका तक का नेतृत्व कर रही हैं, तो क्या पार्टियों को 543 सीटों के लिए 181 योग्य महिलाएं नहीं मिल सकतीं ?

यह योग्यता का अभाव नहीं, बल्कि पुरुषों द्वारा सत्ता के गलियारे छोड़ने का डर है। स्थानीय निकायों में महिला आरक्षण एक जीता-जागता उदाहरण है। 1992 से पंचायतों और नगर निकायों में महिलाएं अपनी नेतृत्व क्षमता साबित कर रही हैं। अगर वहां बिना किसी शेष परिसीमन महिलाएं गांव की सरकार चला सकती हैं, तो वे देश की सरकार क्यों नहीं चला सकतीं?
वस्तुत पार्टियों के लिए महिलाएं केवल ‘वोट बैंक’ हैं, ‘शक्ति’ का हिस्सा नहीं। सभी दल दिखावा करते हैं। चुनावों में सभी दल कहते हैं कि ‘महिलाएं ही असली शक्ति हैं’ लेकिन टिकट देते समय उनके हाथ कांपते हैं। 2024 के लोकसभा चुनावों में मुख्य राष्ट्रीय दलों भाजपा और कांग्रेस ने महिलाओं को केवल 13 फीसद से 16 फीस के बीच टिकट दिए। जब बिल पास करना होता है, तो सब एक सुर में 33 फीसद की मांग करते हैं, लेकिन जब अपनी पार्टी की लिस्ट जारी करनी होती है, तो वे 15 फीसद का आंकड़ा भी पार नहीं कर पाते। महिला आरक्षण के बिना टिकट न देना पार्टियों के आडंबर का पर्दाफाश करती है।

अब समय आ गया है कि जनता और प्रबुद्ध वर्ग इन पार्टियों से सवाल पूछे, कानून का इंतज़ार क्यों ? क्या आप स्वैच्छिक रूप से महिलाओं को टिकट नहीं दे सकते? क्या आपकी विचारधारा में महिलाओं के लिए स्थान केवल नारों तक सीमित है? जब तक ऐसा नहीं होता, तब तक ‘महिला सशक्तिकरण’ के तमाम नारे केवल चुनावी जुमले ही कहलाएंगे। इंतजार जिस दिन का,वो दिन दूर नहीं जब महिला राजनीतिक दल बनेंगे जिनके सभी प्रत्याशी ही महिलाएं होगी।
-लेखक नागरिक सुरक्षा मंच के संस्थापक व पेशे से वरिष्ठ अधिवक्ता हैं




