



शंकर सोनी
हमारे न्याय तंत्र की आत्मा यदि कहीं सबसे अधिक मानवीय रूप में प्रकट होती है, तो वह लोक अदालतों की परिकल्पना में है। यह कल्पना जिस संवेदनशील और दूरदर्शी सोच से जन्मी थी, उसे आकार देने वालों में न्यायमूर्ति पी.एन. भगवती अग्रणी थे। आज जब हम राष्ट्रीय लोक अदालतों के व्यवहारिक स्वरूप को देखते हैं, तो सहज ही प्रश्न उठता है, क्या यह वही लोक अदालत है, जिसका स्वप्न संविधान निर्माताओं और न्यायिक मनीषियों ने देखा था?
हनुमानगढ़ की राष्ट्रीय लोक अदालतों और राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण की कार्यप्रणाली पर नजर डालें तो तस्वीर कुछ असहज करने वाली दिखाई देती है। जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के सचिव द्वारा अनेक मामलों में यह निर्देश दिया जाना कि पहले नियमित अदालत में मुकदमा दायर किया जाए, उसके बाद ही लोक अदालत में समझौते के लिए आया जाए, अपने आप में प्री-वाद लोक अदालत की मूल भावना के विपरीत है।

प्री-वाद लोक अदालत की अवधारणा ही इस सोच पर आधारित है कि नागरिक को अदालतों के लंबे, खर्चीले और जटिल चक्रव्यूह में फंसने से पहले ही संवाद और समझौते के माध्यम से न्याय उपलब्ध कराया जाए। यह व्यवस्था विशेषकर सामान्य, गरीब और अशिक्षित नागरिक के लिए बनाई गई थी, ताकि वह बिना भारी खर्च और वर्षों की प्रतीक्षा के न्याय पा सके।
विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 स्पष्ट रूप से यह अधिकार देता है कि ऐसे विवाद, जो अभी तक किसी न्यायालय में प्रस्तुत नहीं किए गए हैं, लोक अदालत के समक्ष लाए जा सकते हैं। अधिनियम की धारा 19 और 20 इस विषय में कोई अस्पष्टता नहीं छोड़तीं। इसके अतिरिक्त लोक अदालत विनियम, 2009 भी यह निर्देश देता है कि प्री-वाद आवेदन को पंजीबद्ध कर संबंधित पक्ष को सूचना दी जाए और सुलह-समझौते की प्रक्रिया अपनाई जाए।

इसके बावजूद जब आम नागरिक के प्री-वाद आवेदन अस्वीकार कर दिए जाते हैं, तो यह केवल विधिक त्रुटि नहीं, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 39(क) की आत्मा पर सीधा आघात है। समान न्याय और निःशुल्क विधिक सहायता का अधिकार केवल कागज़ों में सिमट कर रह जाए, तो ऐसी व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है।
विडंबना यह है कि बैंक, गैर-बैंकिंग वित्तीय संस्थान और बीमा कंपनियों के प्री-वाद मामले बड़ी संख्या में स्वीकार किए जाते हैं। कारण भी छिपा नहीं है, इन मामलों से ‘निस्तारण’ के आंकड़े तेजी से बढ़ते हैं। इससे यह शंका गहराती है कि कहीं लोक अदालतें जन-न्याय का मंच न रहकर संस्थागत वसूली का औजार तो नहीं बनती जा रहीं?

सामान्य व्यक्ति के लिए स्थिति इसके ठीक उलट है। उसका आवेदन अस्वीकार होता है, उसे वकील करना पड़ता है, न्यायालय शुल्क देना पड़ता है और वर्षों तक मुकदमेबाजी झेलनी पड़ती है। जिस व्यवस्था का उद्देश्य मुकदमे रोकना था, वही व्यवस्था उसे मुकदमे की ओर धकेल रही है। यह स्थिति न केवल अन्यायपूर्ण है, बल्कि लोक अदालतों की सार्थकता पर भी गंभीर प्रश्न खड़े करती है।
और भी चिंताजनक तथ्य यह है कि कई मामलों में अधीनस्थ न्यायालयों में तीन-तीन महीने तक पक्षकारों को समझाकर समझौता कराया जाता है। जब समझौता परिपक्व हो जाता है, तब केवल औपचारिक मोहर लगाने के लिए उन प्रकरणों को राष्ट्रीय लोक अदालत में भेज दिया जाता है। इसके बाद लोक अदालतें इन्हें अपने निस्तारण के आंकड़ों में जोड़कर श्रेय ले लेती हैं। यह प्रक्रिया लोक अदालत की आत्मा के साथ एक प्रकार का छल है।

आवश्यक है कि राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण जिला स्तर पर यह समीक्षा करे कि लोक अदालतों में किस प्रकार के मामलों का निस्तारण हो रहा है और कितने सामान्य नागरिकों के प्री-वाद आवेदन वास्तव में स्वीकार किए जा रहे हैं। लोक अदालतों को ‘वसूली तंत्र’ नहीं, बल्कि ‘जन-न्याय मंच’ के रूप में पुनः स्थापित करना समय की मांग है।
प्री-वाद लोक अदालत भारतीय न्याय व्यवस्था का अत्यंत मानवीय और लोकतांत्रिक विचार है। यदि इसे केवल संस्थागत हितों तक सीमित कर दिया गया, तो लोक अदालत की मूल आत्मा नष्ट हो जाएगी। अब समय आ गया है कि इन ढकोसलों को बंद कर लोक अदालतों को उनके वास्तविक उद्देश्य सस्ता, सरल और त्वरित न्याय की ओर लौटाया जाए। यही न्यायमूर्ति भगवती की परिकल्पना थी, और यही संविधान की सच्ची भावना भी।
-लेखक नागरिक सुरक्षा मंच के संस्थापक और वरिष्ठ अधिवक्ता हैं





