



रोहित अग्रवाल, एडवोकेट
देश इस समय आर्थिक चुनौतियों के दौर से गुजर रहा है। महंगाई, बाजार में कम होती खरीद क्षमता, छोटे व्यापारों की घटती आय और लगातार बढ़ते खर्चों ने व्यापारी वर्ग को पहले ही चिंता में डाल रखा है। ऐसे समय में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं सार्वजनिक मंचों से आर्थिक परिस्थितियों की कठिनाइयों का उल्लेख कर चुके हैं, तब दूसरी ओर जीएसटी विभाग द्वारा भारी टैक्स संग्रह के लक्ष्य निर्धारित किए जाना व्यापारियों के लिए नई परेशानी बनता जा रहा है।
वर्तमान में देशभर में जीएसटी संग्रह बढ़ाने के लिए विभागीय अधिकारियों पर लगातार दबाव बनाया जा रहा है। इसका परिणाम यह दिखाई दे रहा है कि छोटे और मध्यम व्यापारियों को बार-बार नोटिस, जांच, सर्वे और तकनीकी त्रुटियों के नाम पर परेशान किया जा रहा है। कई मामलों में व्यापारी यह महसूस कर रहे हैं कि वास्तविक कर चोरी रोकने की बजाय राजस्व लक्ष्य पूरा करने की होड़ अधिक दिखाई दे रही है।

जीएसटी लागू होने के समय यह कहा गया था कि यह व्यवस्था ‘एक राष्ट्र, एक कर’ के सिद्धांत पर आधारित होकर व्यापार को सरल बनाएगी। लेकिन समय के साथ इसमें लगातार बढ़ती तकनीकी जटिलताएं, पोर्टल की समस्याएं, बार-बार बदलते नियम और अनुपालन का बोझ छोटे व्यापारियों के लिए कठिन होता गया है। आज एक सामान्य व्यापारी को व्यापार करने से अधिक समय रिटर्न, नोटिस और कागजी कार्यवाही में लगाना पड़ रहा है।
विशेष रूप से छोटे शहरों और कस्बों के व्यापारियों की स्थिति अधिक चुनौतीपूर्ण है। सीमित संसाधनों के बीच व्यापार चलाना, बढ़ती प्रतिस्पर्धा का सामना करना और ऊपर से विभागीय दबाव झेलना आसान नहीं है। कई व्यापारी केवल तकनीकी त्रुटियों के कारण भारी मांग नोटिस प्राप्त कर रहे हैं, जबकि उनका उद्देश्य कर चोरी करना नहीं होता। कभी ई-वे बिल की छोटी गलती, कभी रिटर्न मिलान में अंतर और कभी पोर्टल संबंधी त्रुटियों को लेकर व्यापारी महीनों तक विभागीय प्रक्रियाओं में उलझे रहते हैं।

व्यापारी वर्ग हमेशा से देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना गया है। यही वर्ग रोजगार पैदा करता है, बाजार को गति देता है और सरकार को राजस्व प्रदान करता है। यदि यही वर्ग असुरक्षा और अनावश्यक दबाव महसूस करेगा तो इसका सीधा असर बाजार की गतिविधियों पर पड़ेगा। व्यापार में भय का वातावरण कभी भी स्वस्थ अर्थव्यवस्था का संकेत नहीं माना जा सकता।
यह भी सत्य है कि सरकार को राजस्व की आवश्यकता होती है और कर चोरी रोकना आवश्यक है। लेकिन कर प्रशासन और कर आतंकवाद में अंतर होना चाहिए। वास्तविक फर्जी बिलिंग, बोगस फर्मों और संगठित कर चोरी करने वालों पर कठोर कार्रवाई अवश्य होनी चाहिए, परंतु ईमानदारी से व्यापार कर रहे छोटे व्यापारियों को केवल लक्ष्य पूर्ति के लिए परेशान करना उचित नहीं कहा जा सकता।

आज आवश्यकता इस बात की है कि जीएसटी व्यवस्था को अधिक सरल और व्यवहारिक बनाया जाए। छोटे व्यापारियों के लिए अनुपालन प्रक्रियाएं आसान हों, तकनीकी त्रुटियों पर दंडात्मक कार्रवाई की बजाय सुधार का अवसर मिले और विभागीय अधिकारियों को केवल वसूली के आंकड़ों से नहीं बल्कि समाधान आधारित दृष्टिकोण से कार्य करने के लिए प्रोत्साहित किया जाए।
सरकार और जीएसटी विभाग को यह समझना होगा कि मजबूत व्यापारी ही मजबूत अर्थव्यवस्था का आधार होता है। यदि व्यापारी आत्मविश्वास के साथ व्यापार करेगा, तभी बाजार में निवेश बढ़ेगा, रोजगार के अवसर बनेंगे और देश की आर्थिक स्थिति भी मजबूत होगी। इसलिए वर्तमान समय में आवश्यकता संतुलित कर नीति और संवेदनशील प्रशासन की है, ताकि राजस्व संग्रह और व्यापारिक हितों के बीच उचित संतुलन बनाया जा सके।
-लेखक कर सलाहकार व टैक्स बार एसोसिएशन के अध्यक्ष हैं






