







डॉ. संतोष राजपुरोहित
भारत में शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन, आर्थिक विकास और रोजगार का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम माना जाता है। पिछले कुछ दशकों में स्कूलों और उच्च शिक्षण संस्थानों की संख्या तेजी से बढ़ी है। विश्वविद्यालयों, कॉलेजों और निजी संस्थानों का विस्तार हुआ है तथा उच्च शिक्षा में विद्यार्थियों की भागीदारी भी बढ़ी है। इसके बावजूद एक महत्वपूर्ण सवाल बना हुआ हैकृक्या उच्च शिक्षा को सरकारों की विकास-प्राथमिकताओं में वह स्थान और संसाधन मिल पाए हैं, जिसकी वह हकदार है?
यह कहना कि उच्च शिक्षा सरकारों की प्राथमिकता नहीं है, पूरी तरह तथ्यात्मक नहीं होगा। केंद्र और राज्य सरकारें संस्थानों, छात्रवृत्तियों, योजनाओं और वित्तीय सहायता के माध्यम से उच्च शिक्षा के विस्तार में लगातार भूमिका निभाती रही हैं। लेकिन वित्तीय संसाधनों, शिक्षकों, शोध, रोजगार और संस्थागत गुणवत्ता से जुड़ी चुनौतियां यह सवाल जरूर उठाती हैं कि क्या उच्च शिक्षा को अपेक्षित स्तर पर प्राथमिकता मिल रही है।
शिक्षा मंत्रालय के अखिल भारतीय उच्च शिक्षा सर्वेक्षण 2021-22 के अनुसार देश में करीब 4.33 करोड़ विद्यार्थी उच्च शिक्षा में नामांकित थे, जबकि 2014-15 में यह संख्या लगभग 3.42 करोड़ थी। विश्वविद्यालयों और कॉलेजों की संख्या में भी वृद्धि हुई है। यह विस्तार महत्वपूर्ण उपलब्धि है, लेकिन केवल संस्थानों और विद्यार्थियों की संख्या बढ़ना पर्याप्त नहीं है।
यदि कॉलेजों में पर्याप्त शिक्षक नहीं हैं, प्रयोगशालाएं आधुनिक नहीं हैं, पुस्तकालय और शोध सुविधाएं कमजोर हैं तथा विद्यार्थियों को व्यावहारिक प्रशिक्षण नहीं मिलता, तो उच्च शिक्षा का विस्तार अपनी पूरी क्षमता हासिल नहीं कर सकता। इसलिए सवाल अब केवल यह नहीं होना चाहिए कि देश में कितने कॉलेज हैं, बल्कि यह भी कि उनमें शिक्षा की गुणवत्ता कैसी है।
उच्च शिक्षा की गुणवत्ता का सीधा संबंध वित्तीय संसाधनों से है। नीति दस्तावेजों में भी उच्च शिक्षा पर सार्वजनिक व्यय और शोध एवं विकास में निवेश बढ़ाने की आवश्यकता स्वीकार की गई है। विश्वविद्यालय पर किया गया खर्च केवल एक बजटीय मद नहीं है। योग्य शिक्षक, आधुनिक प्रयोगशालाएं, शोध परियोजनाएं, पुस्तकालय और छात्रवृत्तियां भविष्य की मानव पूंजी तैयार करती हैं।
हालांकि शिक्षा के क्षेत्र में सरकारों के सामने प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा, पोषण, विद्यालयी ढांचे और सार्वभौमिक शिक्षा जैसी बड़ी जिम्मेदारियां भी हैं। इसलिए चुनौती स्कूल बनाम उच्च शिक्षा की नहीं, बल्कि शिक्षा के पूरे चक्र को मजबूत करने की है। प्राथमिक स्तर कमजोर होगा तो विद्यार्थी उच्च शिक्षा के लिए तैयार नहीं हो पाएगा और उच्च शिक्षा कमजोर होगी तो देश को उच्च कौशल वाले मानव संसाधन की कमी का सामना करना पड़ेगा।
उच्च शिक्षा की एक बड़ी चुनौती डिग्री और रोजगार के बीच बढ़ता अंतर है। रोजगार बाजार डिजिटल कौशल, डेटा विश्लेषण, तकनीकी ज्ञान, संचार क्षमता, प्रबंधन और समस्या समाधान जैसी क्षमताओं की मांग कर रहा है। ऐसे में केवल परीक्षा आधारित और पारंपरिक पाठ्यक्रम विद्यार्थियों को बदलती अर्थव्यवस्था के लिए पर्याप्त रूप से तैयार नहीं कर सकते।
इसी तरह शोध पर अपेक्षित ध्यान न देना भी दीर्घकाल में महंगा पड़ सकता है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, कृषि, चिकित्सा, हरित ऊर्जा और औद्योगिक तकनीक जैसे क्षेत्रों में देश की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता मजबूत करने के लिए विश्वविद्यालयों में शोध और नवाचार को पर्याप्त संसाधन और स्वतंत्र अकादमिक वातावरण देना जरूरी है।
उच्च शिक्षा में निजी संस्थानों की भूमिका लगातार बढ़ी है। ऐसे में सरकार की जिम्मेदारी केवल सरकारी विश्वविद्यालय और कॉलेज चलाने तक सीमित नहीं रह सकती। उसे गुणवत्ता, नियमन, समान अवसर, छात्रवृत्ति, शोध और सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने की भूमिका भी निभानी होगी। आर्थिक रूप से कमजोर विद्यार्थी केवल संसाधनों के अभाव में गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा से वंचित न हो, यह सार्वजनिक नीति की महत्वपूर्ण कसौटी है।
उच्च शिक्षा को वास्तविक प्राथमिकता बनाने के लिए स्थिर और पर्याप्त वित्तीय संसाधन, शिक्षकों के रिक्त पदों की समयबद्ध भर्ती, उद्योग से जुड़ा पाठ्यक्रम, इंटर्नशिप और व्यावहारिक प्रशिक्षण, शोध एवं नवाचार के लिए पर्याप्त सहायता तथा ग्रामीण और छोटे शहरों के विद्यार्थियों के लिए गुणवत्तापूर्ण अवसर जरूरी हैं।
अंततः उच्च शिक्षा की सफलता का पैमाना केवल खुले कॉलेजों और बढ़े नामांकन से तय नहीं होना चाहिए। असली कसौटी यह है कि कितने विद्यार्थी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, कौशल, रोजगार और शोध के अवसर प्राप्त कर पाए।
भारत को यदि ज्ञान-आधारित और विकसित अर्थव्यवस्था बनना है तो उच्च शिक्षा को सामान्य बजटीय खर्च नहीं, बल्कि दीर्घकालीन मानव पूंजी में निवेश के रूप में देखना होगा। आने वाली पीढ़ी की क्षमता और देश की आर्थिक दिशा, काफी हद तक इसी निवेश की गुणवत्ता पर निर्भर करेगी।
-लेखक भारतीय आर्थिक परिषद के सदस्य हैं








