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हनुमानगढ़ विधायक गणेशराज बंसल को एडीजे एससी-एसटी न्यायालय से जमानत मिलने के बाद हनुमानगढ़ की राजनीति में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। जंक्शन स्थित जेल से बाहर निकलते ही समर्थकों की भीड़, नारेबाजी और बाद में सिविल लाइंस स्थित आवास पर हुआ स्वागत इस बात का संकेत रहा कि बंसल के समर्थक इस पूरे घटनाक्रम को महज कानूनी कार्रवाई के रूप में नहीं, बल्कि राजनीतिक संघर्ष के एक अहम पड़ाव के तौर पर देख रहे हैं।
एडीजे एससी-एसटी न्यायालय की न्यायाधीश सुनीता बेड़ा ने मामले की सुनवाई के बाद 50 हजार रुपए के मुचलके पर विधायक को रिहा करने के आदेश दिए। इससे एक दिन पहले सीजेएम अदालत ने उनकी जमानत अर्जी खारिज कर दी थी। इसके बाद जांच एजेंसी सीआईडी-सीबी ने सात दिन का पुलिस रिमांड मांगा, लेकिन अदालत ने रिमांड की मांग स्वीकार नहीं की। इस घटनाक्रम ने मामले को लेकर चल रही राजनीतिक और कानूनी बहस को और तीखा कर दिया।
बचाव पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मनजिंद्र सिंह लेघा और धर्मेंद्र बंसल ने अदालत में दलील दी कि मुकदमा दबाव में और आधी रात को दर्ज किया गया तथा विधायक के खिलाफ कोई ठोस आधार या पुख्ता साक्ष्य उपलब्ध नहीं है। बचाव पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि चार दिन की पुलिस रिमांड के दौरान जांच एजेंसी ऐसी कोई महत्वपूर्ण जानकारी सामने नहीं ला सकी, जो विधायक के खिलाफ आरोपों को मजबूती देती हो। हालांकि, इन दलीलों और आरोपों को अदालत का अंतिम निष्कर्ष नहीं माना जा सकता। मामले की जांच और न्यायिक प्रक्रिया अभी जारी है।
जमानत के बाद जेल के बाहर उमड़ी भीड़ ने घटनाक्रम को राजनीतिक रंग दे दिया। समर्थकों ने फूल-मालाओं से विधायक का स्वागत किया और नारे लगाए। इसके बाद आवास पर भी बड़ी संख्या में समर्थक पहुंचे। आतिशबाजी और मिठाई बांटने के बीच बंसल का स्वागत एक राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन जैसा दिखाई दिया।
पूर्व सभापति सुमित रणवां ने अदालत के फैसले को ‘न्याय की जीत’ बताया और पूरे मामले को राजनीतिक द्वेष से प्रेरित बताया। यह समर्थकों की राजनीतिक व्याख्या है, जबकि मामले की वास्तविक कानूनी स्थिति का निर्धारण आगे की न्यायिक प्रक्रिया में होगा।
आवास के बाहर उमड़ी समर्थकों की भीड़ को संबोधित करते हुए गणेशराज बंसल ने पूरे घटनाक्रम को अपने व्यक्तिगत संघर्ष से आगे ले जाते हुए इसे जनता और लोकतंत्र से जोड़ दिया। उन्होंने नगर परिषद चुनाव में ‘टीम गणेशराज’ को मिली 35 सीटों का उल्लेख करते हुए कहा कि जनता ने उन पर भरोसा जताया है।
बंसल ने भावुक अंदाज में कहा कि जनता के प्रति उनका कर्ज इतना बड़ा है कि अपने शरीर के खून का एक-एक कतरा न्यौछावर करने के बाद भी उसे नहीं चुका सकते। उनका यह बयान समर्थकों के बीच भावनात्मक जुड़ाव पैदा करने वाला रहा।
लेकिन उनके संबोधन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा आगे की राजनीतिक रणनीति से जुड़ा रहा। उन्होंने कहा कि सरकार के कथित दबाव के बावजूद उन्होंने झुकना नहीं सीखा और समर्थकों की एकजुटता ने सरकार को संदेश दिया है। इसके साथ ही उन्होंने पंचायतीराज चुनाव की तैयारी और सरकार को ‘मुंहतोड़ जवाब’ देने की बात कही। यानी जेल से रिहाई के बाद बंसल का संदेश केवल कानूनी राहत तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने इसे सीधे आगामी राजनीतिक संघर्ष से जोड़ दिया है।
बंसल की जमानत से तत्काल राजनीतिक माहौल उनके पक्ष में उत्साहपूर्ण जरूर हुआ है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि कानूनी विवाद समाप्त हो गया। जांच की दिशा, आगे की न्यायिक कार्यवाही और आरोपों के संबंध में अदालत में सामने आने वाले साक्ष्य ही मामले की अंतिम तस्वीर तय करेंगे।
राजनीतिक रूप से देखें तो निकाय चुनाव के बाद हनुमानगढ़ में स्वतंत्र पार्षदों और बंसल समर्थक खेमे की भूमिका पहले ही चर्चा में रही है। अब उनकी रिहाई के बाद वही संगठनात्मक नेटवर्क पंचायतीराज चुनाव की तैयारी में सक्रिय होता है या नहीं, यह देखने वाली बात होगी।
फिलहाल इतना स्पष्ट है कि जेल से बाहर आते ही गणेशराज बंसल ने कानूनी राहत को राजनीतिक संदेश में बदल दिया है। समर्थकों का उत्साह, उनका भावुक संबोधन और पंचायतीराज चुनाव का आह्वान बताता है कि हनुमानगढ़ की स्थानीय राजनीति में यह अध्याय अभी खत्म नहीं हुआ है, बल्कि अगली राजनीतिक लड़ाई की भूमिका तैयार हो रही है।







