





डॉ. संतोष राजपुरोहित
भारत की अर्थव्यवस्था ने एक बार फिर तेज़ विकास का संकेत दिया है। नवीनतम आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही (अप्रैल-जून 2026) में भारत की वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर 7.8 प्रतिशत रही। यह पिछले वर्ष की इसी तिमाही के 6.9 प्रतिशत से अधिक है, जबकि जनवरी-मार्च 2026 की तिमाही में संशोधित वृद्धि दर 8.6 प्रतिशत थी। नाममात्र जीडीपी वृद्धि दर लगभग 10.3 प्रतिशत दर्ज की गई। यह प्रदर्शन भारत को विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में सबसे तेज़ी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्थाओं में बनाए रखता है।
लेकिन आर्थिक विकास के इन प्रभावशाली आंकड़ों के बीच सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या जीडीपी की यह तेज़ वृद्धि वास्तव में समावेशी विकास का प्रमाण है? क्या इस विकास का लाभ किसान, मजदूर, निम्न आय वर्ग, बेरोजगार युवा और छोटे उद्यमियों तक उसी अनुपात में पहुँच रहा है, जिस अनुपात में राष्ट्रीय आय बढ़ रही है? यह प्रश्न वर्तमान परिप्रेक्ष्य में जरूरी हो जाता हैं।
जीडीपी वृद्धि निःसंदेह एक सकारात्मक संकेत है। इसका अर्थ है कि देश में वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन बढ़ रहा है तथा आर्थिक गतिविधियाँ विस्तार कर रही हैं। वर्तमान वृद्धि में निवेश, सेवा क्षेत्र और विनिर्माण की महत्वपूर्ण भूमिका दिखाई देती है। वित्तीय, रियल एस्टेट और पेशेवर सेवाओं जैसे क्षेत्रों का प्रदर्शन विशेष रूप से मजबूत रहा है, जबकि निवेश और पूंजी निर्माण में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। सकल स्थिर पूंजी निर्माण का अनुपात बढ़कर लगभग 34.3 प्रतिशत तक पहुँचने की बात सामने आई है, जो सार्वजनिक और निजी निवेश की बढ़ती भूमिका का संकेत है।

यह निश्चित रूप से उत्साहजनक है कि भारत केवल सरकारी खर्च के सहारे नहीं, बल्कि निजी निवेश को भी विकास का महत्वपूर्ण इंजन बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। अगस्त 2026 में सकल जीएसटी संग्रह लगभग 1.99 लाख करोड़ रुपये रहा, जिसमें वर्ष-दर-वर्ष 14.8 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हुई। यह आर्थिक गतिविधियों और उपभोग की मजबूती का संकेत देता है।
फिर भी, तेज़ जीडीपी वृद्धि और समावेशी विकास एक ही बात नहीं हैं। जीडीपी यह बताती है कि अर्थव्यवस्था का आकार कितना बढ़ा, लेकिन यह नहीं बताती कि उस बढ़ी हुई आय का वितरण किन लोगों के बीच हुआ। यदि राष्ट्रीय आय बढ़े लेकिन उसका बड़ा हिस्सा उच्च आय वर्ग, बड़े कॉरपोरेट समूहों और शहरी क्षेत्रों तक सीमित रह जाए, तो विकास की गति तेज़ होने के बावजूद सामाजिक असमानता बनी रह सकती है।

भारत के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती रोजगार की गुणवत्ता और रोजगार सृजन की है। आर्थिक विकास तभी व्यापक रूप से जनकल्याणकारी बनता है जब वह पर्याप्त संख्या में सम्मानजनक और स्थायी रोजगार पैदा करे। केवल पूंजी-प्रधान क्षेत्रों में निवेश बढ़ने से जीडीपी तो तेज़ी से बढ़ सकती है, लेकिन यदि रोजगार उसी अनुपात में नहीं बढ़ते तो बड़ी युवा आबादी को इसका पूरा लाभ नहीं मिल पाता। हाल के संकेतों में यह चिंता भी उभरी है कि विनिर्माण गतिविधियों की गति में कमजोरी और रोजगार पर दबाव दिखाई दे सकता है।

ग्रामीण भारत की स्थिति भी समावेशी विकास की परीक्षा है। भारत की बड़ी आबादी आज भी कृषि और उससे जुड़े कार्यों पर निर्भर है। यदि शहरी सेवा क्षेत्र और उच्च तकनीकी उद्योग तेजी से बढ़ें, लेकिन कृषि आय और ग्रामीण रोजगार अपेक्षाकृत धीमी गति से बढ़ें, तो विकास के लाभों में क्षेत्रीय और सामाजिक असंतुलन पैदा हो सकता है। इसलिए केवल महानगरों की चमक या शेयर बाजार की तेजी को पूरे भारत की समृद्धि नहीं माना जा सकता।
इसी प्रकार मध्यम वर्ग और निम्न आय वर्ग के लिए महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य और आवास की लागत महत्वपूर्ण प्रश्न हैं। यदि आय की वृद्धि के मुकाबले आवश्यक वस्तुओं और सेवाओं की लागत तेजी से बढ़ती है, तो जीडीपी वृद्धि का वास्तविक लाभ आम परिवारों को सीमित रूप में मिलता है। आर्थिक विकास का वास्तविक मूल्यांकन केवल उत्पादन वृद्धि से नहीं, बल्कि लोगों की क्रय-शक्ति और जीवन-स्तर में सुधार से किया जाना चाहिए।

भारत की वर्तमान आर्थिक वृद्धि का एक दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष क्षेत्रीय असमानता है। कुछ राज्य उद्योग, सेवा क्षेत्र, निवेश और बुनियादी ढाँचे के कारण तेजी से आगे बढ़ रहे हैं, जबकि अनेक क्षेत्र अभी भी शिक्षा, स्वास्थ्य, औद्योगीकरण और रोजगार के मामले में पीछे हैं। इसलिए राष्ट्रीय स्तर की 7.8 प्रतिशत वृद्धि दर यह नहीं बताती कि देश के प्रत्येक राज्य और प्रत्येक सामाजिक वर्ग की आय भी उसी दर से बढ़ रही है।
इसलिए यह कहना अधिक उचित होगा कि भारत की वर्तमान जीडीपी वृद्धि मजबूत और आशाजनक है, लेकिन इसे पूर्णतः समावेशी विकास कहना अभी जल्दबाजी होगी। विकास की दिशा सकारात्मक है, पर इसकी गुणवत्ता और वितरण को बेहतर बनाना आवश्यक है। भारत को ऐसी आर्थिक नीति की आवश्यकता है जिसमें केवल उत्पादन और निवेश ही नहीं, बल्कि रोजगार, कृषि आय, छोटे एवं मध्यम उद्यम, ग्रामीण विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा भी विकास के प्रमुख संकेतक बनें।
भारत की सफलता का वास्तविक पैमाना केवल यह नहीं होना चाहिए कि जीडीपी कितनी तेजी से बढ़ रही है, बल्कि यह होना चाहिए कि क्या एक गरीब परिवार की आय बढ़ रही है, क्या युवा को रोजगार मिल रहा है, क्या किसान की आर्थिक स्थिति सुधर रही है और क्या विकास के अवसर समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँच रहे हैं।
7.8 प्रतिशत की वृद्धि दर निश्चित रूप से भारत की आर्थिक शक्ति का प्रमाण है, लेकिन समावेशी विकास की वास्तविक परीक्षा अभी बाकी है। भारत को अब “तेज़ विकास” से आगे बढ़कर ‘न्यायपूर्ण, रोजगारपरक और सर्वसमावेशी विकास’ की दिशा में अपनी आर्थिक यात्रा को मजबूत करना होगा। तभी जीडीपी के आंकड़े वास्तव में जनता की खुशहाली के आंकड़े बन सकेंगे।
-लेखक भारतीय आर्थिक परिषद के सदस्य हैं





