



गोपाल झा
हनुमानगढ़ नगरपरिषद का चुनाव अभी मैदान में पूरी तरह उतरा भी नहीं है और राजनीति ने अपनी चालें चलनी शुरू कर दी हैं। 60 वार्ड हैं, लेकिन दावेदार शायद उससे कई गुना। हर दावेदार को लगता है कि उसके बिना वार्ड अधूरा है और उसके बिना पार्टी की जीत मुश्किल। राजनीति में यह आत्मविश्वास भी बड़ी दिलचस्प चीज है, टिकट मिलने से पहले आदमी खुद को जीतता हुआ देख लेता है और टिकट कटते ही पार्टी को हारता हुआ।
इस बार हनुमानगढ़ का चुनाव इसलिए भी दिलचस्प है कि लोकसभा चुनाव की तरह भाजपा और निर्दलीय विधायक गणेशराज बंसल एक ही खेमे में खड़े दिखाई नहीं दे रहे। बंसल ने साफ कर दिया है कि वे सभी 60 वार्डों में निर्दलीय प्रत्याशी उतारेंगे। उनकी सूची लगभग तैयार बताई जा रही है। यानी विधानसभा में भाजपा सरकार को समर्थन देने का रिश्ता नगरपरिषद की राजनीति में चुनावी साझेदारी में नहीं बदल रहा। यह बात छोटी नहीं है। क्योंकि स्थानीय चुनाव में रिश्ते दलों के नहीं, उम्मीदवारों के बीच बनते हैं और टूटते हैं।
भाजपा के लिए इसमें एक तरह की आजादी है। अब वह किसी समझौते के हिसाब से उम्मीदवार चुनने की मजबूरी में नहीं है। 60 वार्डों में अपना प्रत्याशी उतार सकती है। बीजेपी नेता अमित चौधरी के आवास पर कार्यकर्ताओं की भीड़ इसका संकेत है कि टिकट की मांग में कोई कमी नहीं। जिलाध्यक्ष प्रमोद डेलू के साथ अमित चौधरी प्रत्याशी चयन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
बीजेपी कह रही है कि सर्वे होगा और उसी के आधार पर टिकट मिलेगा। सर्वे की बात सुनने में बड़ी अच्छी लगती है। राजनीति में हर वह बात अच्छी लगती है जिसमें जिम्मेदारी किसी अदृश्य आदमी पर डाल दी जाए। लेकिन वार्ड की राजनीति में सर्वे की असली मशीन मोहल्ले में चलती है। कौन शादी-ब्याह में पहुंचता है, कौन दुख में खड़ा रहता है, किसके घर के बाहर रोज चार लोग बैठे मिलते हैं और किसके फोन पर अफसर काम करते हैं, वार्ड का मतदाता यह सब जानता है। कागज का सर्वे बहुत कुछ बता सकता है, लेकिन मतदाता की स्मृति उससे पुरानी और उसकी समझ उससे तेज होती है।
भाजपा की असली परीक्षा टिकट बांटने में नहीं, टिकट कटने के बाद शुरू होगी। 60 वार्डों में अगर 200 दावेदार हैं तो 140 को निराश होना ही है। निराश दावेदार हमेशा नाराज नहीं होता, लेकिन नाराज दावेदार अक्सर चुनाव में बहुत काम आता है, विपक्ष के लिए। यही वह जगह है जहां संगठन की परीक्षा होगी। पार्टी जिसे टिकट देगी, उसके साथ कितने लोग खड़े रहते हैं और जिसे टिकट नहीं मिलेगा, वह कितनी ईमानदारी से झंडा उठाता है, जीत का गणित यहीं बनेगा।
विधायक गणेशराज बंसल की राजनीति की परीक्षा इससे अलग है। उनके सामने अपनी व्यक्तिगत राजनीतिक ताकत साबित करने की चुनौती है। निर्दलीय प्रत्याशी खड़े करना आसान काम नहीं, लेकिन उन्हें जिताकर बोर्ड तक पहुंचाना उससे भी कठिन है। अगर 60 वार्डों में उनके समर्थक पर्याप्त संख्या में जीतते हैं और बोर्ड बनाने की स्थिति बनती है तो यह बंसल की उस राजनीति की पुष्टि होगी जो पार्टी की सीमा से बाहर अपनी जगह बनाने में माहिर हैं। और यदि वे भाजपा के उम्मीदवारों को कई वार्डों में नुकसान पहुंचाते हैं तो राजनीति में इसे भी परिणाम ही माना जाएगा। चुनाव में हर जीत सीट से नहीं मापी जाती, कई बार किसी दूसरे की हार भी अपनी ताकत का प्रमाण बन जाती है।
भाजपा में अमित चौधरी के लिए भी यह चुनाव मामूली नहीं। विधानसभा चुनाव के बाद नगरपरिषद का मैदान उन्हें अपनी संगठनात्मक क्षमता दिखाने का अवसर देता है। अगर भाजपा बोर्ड बनाती है तो यह केवल कमल की जीत नहीं होगी। अमित चौधरी की स्थानीय पकड़ और संगठन को साथ लेकर चलने की क्षमता का भी प्रमाण माना जाएगा। लेकिन अगर टिकट वितरण में गड़बड़ी हुई, बागी खड़े हुए और भीतर का असंतोष बाहर आ गया तो सवाल भी उन्हीं से पूछे जाएंगे।
कांग्रेस की स्थिति फिलहाल ज्यादा उलझी हुई है। जिस समय भाजपा और बंसल आमने-सामने खड़े होने की तैयारी कर रहे हैं, उस समय कांग्रेस को अपनी जमीन मजबूत करनी चाहिए थी। लेकिन पार्टी में वह उत्साह नहीं दिख रहा जो इतने बड़े स्थानीय चुनाव के लिए जरूरी है। मजबूत उम्मीदवार पार्टी सिंबल से चुनाव लड़ने में हिचक रहे हैं, यह कांग्रेस के लिए सामान्य कमजोरी नहीं, गंभीर चेतावनी है।
कांग्रेस की मुश्किल यह भी है कि उसे भाजपा से लड़ने के साथ-साथ अपने भीतर की लड़ाई भी लड़नी है। पूर्व मंत्री चौधरी विनोद कुमार के सिपहसालारों की भूमिका इस चुनाव में भी महत्वपूर्ण होगी। अगर टिकट वितरण में गुट और व्यक्ति संगठन से ऊपर हो गए तो पार्टी के सामने वही पुरानी कहानी दोहर सकती है, उम्मीदवार अपना, नाराजगी अपनी और नुकसान पार्टी का।
27 से 31 अगस्त तक नामांकन का समय है। पांच दिन बहुत होते हैं, अगर निर्णय पहले हो चुका हो। और बहुत कम होते हैं, अगर हर टिकट पर दस लोग फैसला बदलवाने निकल पड़ें। इन पांच दिनों में केवल नामांकन नहीं होंगे। फोन होंगे, मुलाकातें होंगी, मनुहार होगी, नाराजगी होगी और शायद कुछ बगावतें भी।
इसलिए हनुमानगढ़ का नगरपरिषद चुनाव अभी भाजपा बनाम कांग्रेस नहीं है। यह तीन नेताओं की राजनीतिक परीक्षा भी है। बंसल को अपनी व्यक्तिगत ताकत साबित करनी है, अमित चौधरी को संगठन और लोकप्रियता, जबकि चौधरी विनोद कुमार को कांग्रेस की वापसी का रास्ता दिखाना है।
बहरहाल, यही हनुमानगढ़ के इस चुनाव की असली कहानी है। 60 वार्डों में 60 चुनाव होंगे। और हर चुनाव में पार्टी से बड़ा उम्मीदवार, उम्मीदवार से बड़ा मोहल्ला और मोहल्ले से बड़ा मतदाता होगा। बाकी नेता चाहे जितना हिसाब लगा लें, आखिरी हिसाब वही करेगा जिसके हाथ में वोट है।
-लेखक भटनेर पोस्ट मीडिया ग्रुप के चीफ एडिटर हैं








