





भटनेर पोस्ट ब्यूरो
वर्ष 1989 यानी तब हनुमानगढ़ जिला नहीं बना था। शहर की छात्र राजनीति में एक ऐसा युवा था, जिसकी पहचान किसी पद से नहीं, बल्कि उसके सहज स्वभाव, विनम्र व्यवहार और सामाजिक सक्रियता से होती थी। यह नाम था पवन खुराना। नेहरू मेमोरियल पीजी कॉलेज छात्रसंघ चुनाव में वे महासचिव निर्वाचित हुए, लेकिन उनकी लोकप्रियता केवल इस जीत की वजह से नहीं थी। वे उन चुनिंदा छात्र नेताओं में थे, जो हर वर्ग के विद्यार्थियों के बीच समान रूप से स्वीकार्य थे और जिनकी पहचान संवाद, सहयोग और सामाजिक सरोकारों से बनी।
पवन खुराना ने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से की। छात्र राजनीति में सक्रिय रहते हुए उन्होंने युवाओं के बीच मजबूत पहचान बनाई। बाद में वे भारतीय जनता युवा मोर्चा से जुड़े और संगठन में विभिन्न जिम्मेदारियां निभाईं। राजनीतिक संस्कार उन्हें परिवार से भी मिले। उनकी माता श्रीमती अमर देवी नगर परिषद की पार्षद रहीं। आगे चलकर पवन खुराना को भाजपा मंडल अध्यक्ष का दायित्व मिला, जिसे उन्होंने पूरी निष्ठा और सक्रियता के साथ निभाया।
राजनीति के साथ-साथ वे सामाजिक संगठनों में भी बराबर सक्रिय रहे। यूथ हॉस्टल सोसायटी से जुड़कर उन्होंने युवाओं को सामाजिक गतिविधियों और सकारात्मक आयोजनों से जोड़ने का प्रयास किया। उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता यही रही कि वे केवल राजनीतिक कार्यकर्ता नहीं, बल्कि समाज के बीच रहने वाले ऐसे व्यक्ति थे, जिनसे लोग सहजता से जुड़ जाते थे।
समय के साथ उनकी सक्रिय राजनीति से दूरी जरूर बनी, लेकिन समाज से उनका रिश्ता आज भी कायम है। वर्तमान में वे अपने पुत्र अभिनंदन खुराना के साथ व्यवसाय में हाथ बंटा रहे हैं। सामाजिक कार्यक्रमों में भी उनकी उपस्थिति समय-समय पर देखने को मिल जाती है। राजनीति से भले ही उन्होंने दूरी बना ली हो, लेकिन समाज और शहर के विकास पर उनकी नजर आज भी उतनी ही गंभीर है।
छात्र राजनीति में आए बदलाव को लेकर पवन खुराना की पीड़ा साफ झलकती है। वे ‘भटनेर पोस्ट डॉट कॉम’ से कहते हैं, ‘अब पहले वाली बात कहीं नहीं रही। छात्र राजनीति भी पहले जैसी नहीं रही। अब जातिवाद और आपसी संघर्ष जैसी बुराइयों ने माहौल को प्रभावित कर दिया है। पहले चुनाव के बाद भी दोस्ती बनी रहती थी, आज कई बार दुश्मनी तक हो जाती है।’ उनके अनुसार छात्र राजनीति का उद्देश्य नेतृत्व निर्माण और सामाजिक चेतना होना चाहिए, न कि कटुता और विभाजन।
हनुमानगढ़ को जिला बने 32 वर्ष पूरे होने पर वे विकास यात्रा को संतोषजनक मानते हैं, लेकिन इसे अधूरा भी बताते हैं। उनका कहना है कि जिले को बहुत कुछ मिला है, मगर अभी भी अनेक महत्वपूर्ण आवश्यकताएं पूरी होना बाकी हैं। उनका मानना है कि यदि जनप्रतिनिधि आपसी मतभेद भुलाकर एकजुट होकर सरकार के सामने जिले की मांगें रखें तो हनुमानगढ़ को और अधिक विकास परियोजनाएं मिल सकती हैं। वे स्पष्ट कहते हैं कि आपसी खींचतान के कारण कई महत्वपूर्ण मुद्दे वर्षों तक लंबित रह जाते हैं।
पवन खुराना की नजर में हनुमानगढ़ के भविष्य की सबसे बड़ी जरूरत कृषि आधारित उद्योगों की स्थापना है। उनका मानना है कि कृषि प्रधान जिले में यदि उद्योग नहीं बढ़े तो युवाओं के लिए रोजगार के अवसर सीमित रह जाएंगे और विकास की गति भी प्रभावित होगी। उनके विचारों में अनुभव की गंभीरता है और शहर के प्रति आत्मीय चिंता भी। यही कारण है कि सक्रिय राजनीति से दूर होने के बावजूद पवन खुराना आज भी हनुमानगढ़ के उन चेहरों में शामिल हैं, जिनकी पहचान सेवा, सादगी और सामाजिक प्रतिबद्धता से होती है।








