



डॉ. अर्चना गोदारा
हम जिस समाज में रहते हैं, वहाँ नाम केवल पहचान नहीं होता, वह एक तरह का परिचय-पत्र भी बन चुका है। और इसी परिचय-पत्र को ‘थोड़ा बड़ा’ दिखाने की कोशिश में आजकल लोग अपने नाम के साथ ऐसे शब्द जोड़ रहे हैं, जिनका अर्थ और वजन शायद वे खुद भी पूरी तरह नहीं समझते। ‘डॉ.’, ‘एडवोकेट’ और ‘प्रोफेसर’ ये तीनों शब्द आजकल सबसे ज़्यादा इस्तेमाल में हैं, लेकिन दुर्भाग्य यह है कि इनका इस्तेमाल अक्सर सही समझ के बिना किया जा रहा है।
‘डॉ.’ से शुरुआत करें तो यह कोई सामान्य संबोधन नहीं है। यह एक डॉक्टरेट उपाधि है, जो पीएच.डी. जैसी लंबी और गंभीर शैक्षणिक यात्रा के बाद मिलती है। इसमें सालों का अध्ययन, शोध, धैर्य और बौद्धिक अनुशासन शामिल होता है। इसलिए जब कोई अपने नाम के आगे ‘डॉ.’ लगाता है, तो वह केवल एक शब्द नहीं जोड़ रहा होता, बल्कि अपने ज्ञान और परिश्रम की पहचान सामने रख रहा होता है। यही कारण है कि इसे शौक या दिखावे के लिए इस्तेमाल करना उस उपाधि के महत्व को कम करना है। चिकित्सा क्षेत्र में भी ‘डॉ.’ का प्रयोग मान्य है, क्योंकि वहाँ यह प्रशिक्षण और जिम्मेदारी से जुड़ा हुआ है। लेकिन दोनों ही स्थितियों में एक बात साफ़ है, ‘डॉ.’ वही लगाएगा, जिसने वास्तव में उसे अर्जित किया है।

‘एडवोकेट’ की बात करें तो यह एक पेशे की पहचान है, कोई शैक्षणिक उपाधि नहीं। इसका अर्थ है कि व्यक्ति विधि के क्षेत्र में पंजीकृत होकर वकालत कर रहा है। लेकिन आजकल इसे भी नाम के आगे ऐसे लगाया जा रहा है, जैसे यह कोई डिग्री हो। ‘एडवोकेट मोहित’, ‘एडवोकेट नेहा’ -ये प्रयोग आम हो गए हैं। जबकि अधिक स्पष्ट और संतुलित तरीका यह है कि इसे नाम के बाद लिखा जाए-जैसे ‘मोहित वर्मा, अधिवक्ता’। इससे यह साफ़ रहता है कि यह व्यक्ति का पेशा है, न कि कोई उपाधि।
सबसे दिलचस्प और चिंताजनक स्थिति ‘प्रोफेसर’ शब्द के साथ देखने को मिलती है। बहुत से लोग जो कॉलेज या विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं, वे अपने नाम के आगे ‘प्रोफेसर’ जोड़ लेते हैं, जबकि न तो उनके पास उस पद की औपचारिक नियुक्ति होती है और न ही उन्होंने पीएच.डी. जैसी आवश्यक योग्यता पूरी की होती है। केवल पढ़ाने का कार्य करना और ‘प्रोफेसर’ होना, दोनों एक जैसी बातें नहीं हैं द्यविश्वविद्यालयों में ‘प्रोफेसर’ एक विशिष्ट पद है, जो अनुभव, योग्यता और चयन प्रक्रिया के आधार पर दिया जाता है। हर शिक्षक प्रोफेसर नहीं होता, जैसे हर छात्र शोधकर्ता नहीं होता।

फिर भी यह शब्द बड़े सहज तरीके से नाम के आगे जोड़ लिया जाता है-जैसे यह कोई सम्मानसूचक उपाधि हो। यह केवल तकनीकी गलती नहीं है, बल्कि यह एक तरह से उस व्यवस्था और उन लोगों के प्रति अन्याय भी है, जिन्होंने वास्तव में उस पद को प्राप्त करने के लिए वर्षों की मेहनत की है। बिना उस पद के “प्रोफेसर” लिखना वैसा ही है जैसे बिना डिग्री के “डॉ.” लिख देना – दोनों ही स्थितियों में सच्चाई से दूरी साफ़ दिखाई देती है।

यह पूरा मुद्दा केवल भाषा का नहीं, बल्कि एक गहरे मनोवैज्ञानिक और सामाजिक व्यवहार का है। आज का व्यक्ति जल्दी पहचान चाहता है, जल्दी सम्मान चाहता है। और जब यह सम्मान वास्तविक उपलब्धियों से नहीं मिल पाता, तो वह शब्दों के सहारे उसे हासिल करने की कोशिश करता है। नाम के आगे लगे ये शब्द एक तरह से “पहचान” बनाने का साधन बन जाते हैं। लेकिन यही वह जगह है जहाँ व्यक्ति अनजाने में अपनी विश्वसनीयता को खोने लगता है।

समाज भी इसमें अपनी भूमिका निभाता है। लोग वही मानते हैं जो बार-बार देखते हैं। अगर हर जगह गलत प्रयोग दिखेगा, तो वह सामान्य लगने लगेगा। लेकिन सच्चाई यह है कि पहचान शब्दों की संख्या से नहीं, उनकी सटीकता से बनती है। एक सीधा और सही लिखा हुआ नाम कहीं अधिक प्रभावशाली होता है, बनिस्बत उस नाम के जिसमें अनावश्यक विशेषण जोड़ दिए गए हों।
स्पष्ट शब्दों में समझे तो “डॉ.” एक अर्जित उपाधि है, इसे वही लगाए जो उसका अधिकारी है। “एडवोकेट” एक पेशा है, इसे स्पष्ट रूप से नाम के बाद लिखना अधिक उचित है और “प्रोफेसर” एक पद है, जिसे बिना प्राप्त किए नाम के साथ जोड़ना न तो सही है, न ही ईमानदार। पहचान की सच्ची मजबूती दिखावे में नहीं, सच्चाई में होती है। और जब हम अपने नाम के साथ सच्चाई जोड़ते हैं, तभी वह नाम सम्मान के साथ लिया जाता है।




