


डॉ. अर्चना गोदारा
तेज़ रफ्तार आधुनिक जीवन में एक नया शब्द तेजी से चर्चा में आया है, ‘स्लीप डिवोर्स’। सुनने में यह शब्द रिश्तों के टूटने का संकेत देता है, लेकिन वास्तविकता इससे बिल्कुल अलग है। स्लीप डिवोर्स का अर्थ है कि पति-पत्नी आपसी सहमति से बेहतर नींद के लिए अलग-अलग बिस्तर या कमरों में सोने का निर्णय लेते हैं। मनोविज्ञान और नींद विज्ञान के शोध बताते हैं कि यह व्यवस्था कई दंपतियों के लिए तनाव कम करने और मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने का एक व्यावहारिक तरीका बन रही है।
मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो नींद की कमी व्यक्ति के भावनात्मक नियंत्रण, सहनशीलता और निर्णय क्षमता को प्रभावित करती है। विभिन्न शोध बताते हैं कि जब किसी व्यक्ति की नींद बार-बार टूटती है तो उसमें चिड़चिड़ापन, तनाव, असहनशील और सहानुभूति की कमी बढ़ जाती है, जिससे दांपत्य संबंधों में अनावश्यक टकराव पैदा हो सकता है। अमेरिकन अकेडमी ऑफ स्लीप मेडिसिन के एक सर्वेक्षण के अनुसार लगभग 31 फीसद वयस्क कभी-न-कभी “स्लीप डिवोर्स” का विकल्प अपनाते हैं, ताकि साथी की नींद की आदतों के कारण होने वाली परेशानी से बचा जा सके। यह प्रवृत्ति केवल पश्चिमी देशों तक सीमित नहीं रही। 2025 की एक वैश्विक नींद सर्वे रिपोर्ट के अनुसार भारत में लगभग 78 फीसद दंपति कभी-कभी अलग सोने का विकल्प अपनाते हैं, जो विश्व में सबसे अधिक है। अभी हाल ही में कलाकारा अर्चना पूरनसिंह ने स्वयं के लिए इस शब्द का प्रयोग कर चर्चा में आयी।

इसके प्रमुख कारणों में साथी का खर्राटे लेना (लगभग 32ः), बार-बार करवट बदलना, अलग-अलग सोने-जागने का समय और मोबाइल या स्क्रीन का देर रात तक उपयोग शामिल हैं। कई मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि यदि लगातार खराब नींद बनी रहे तो इससे वैवाहिक असंतोष और भावनात्मक दूरी भी बढ़ सकती है; इसलिए कुछ दंपति इसे एक व्यावहारिक समाधान के रूप में अपनाते हैं।

हालाँकि, स्लीप डिवोर्स पूरी तरह सकारात्मक ही हो ऐसा भी नहीं है। कुछ अध्ययनों में पाया गया है कि साथ सोना दंपतियों के बीच भावनात्मक निकटता और सुरक्षा की भावना को बढ़ाता है, इसलिए लंबे समय तक अलग सोना कभी-कभी भावनात्मक दूरी भी पैदा कर सकता है। फिर भी अधिकांश मनोवैज्ञानिक इस बात पर सहमत हैं कि यदि यह निर्णय आपसी समझ और संवाद के साथ लिया जाए तो यह रिश्ते को कमजोर करने के बजाय मजबूत भी बना सकता है।
‘अच्छी नींद एक स्वस्थ रिश्ते की अनदेखी की जाने वाली बुनियाद है। यदि दोनों साथियों की नींद लगातार खराब हो रही है, तो अलग सोना कभी-कभी रिश्ते को बेहतर बना सकता है।’
इस प्रकार ‘स्लीप डिवोर्स’ आधुनिक जीवन की एक ऐसी मनोवैज्ञानिक रणनीति के रूप में उभर रहा है, जो यह दर्शाता है कि स्वस्थ संबंध केवल साथ सोने से नहीं, बल्कि एक-दूसरे की शारीरिक और मानसिक आवश्यकताओं को समझने से बनते हैं। अंततः यह कहना गलत नहीं होगा कि स्लीप डिवोर्स विवाह की परिभाषा को बदलने की कोशिश नहीं, बल्कि उसे व्यावहारिक बनाने की दिशा में एक छोटा-सा कदम है। यदि यह निर्णय आपसी विश्वास और संवाद के साथ लिया जाए, तो यह दूरी नहीं बल्कि रिश्ते में एक नई समझ का पुल भी बन सकता है, जहाँ दो लोग अलग-अलग सोते हुए भी एक-दूसरे के अधिक करीब आ सकते हैं।
‘अच्छा रिश्ता वह नहीं जिसमें पति-पत्नी हर समय साथ रहें, बल्कि वह है जिसमें दोनों एक-दूसरे की जरूरतों को समझें और उनका सम्मान करें।’
-लेखिका राजकीय एनएमपीजी कॉलेज में सहायक आचार्य हैं




