



ओम पारीक
वो दौर द्वितीय महायुद्ध का था। देश गुलामी की जंजीरों में जकड़ा हुआ था, और दुनिया बारूद की गंध से भरी पड़ी थी। उसी वक्त हमारे इलाके के कुछ नौजवान फौज में भर्ती होने निकल पड़े। न कोई बड़ा सपना, न कोई भाषण, बस रोज़ी और हालात की मजबूरी। हरियाणा की तरफ किसी फौजी छावनी में पहुंचे। उनमें एक खेतवाली ढाणी का था, दूसरा रावतसर का मेहरदीन, तीसरा पतराम लुहार और चौथा उनका साथी, किशनपुरा कोहला का। नाम आज धुंधला गया है, मगर जिंदगी की लकीरें अब भी साफ दिखती हैं।
फौज में भर्ती होने के बाद उनकी तैनाती तुर्की साइड हुई। वहां से जहां ज़रूरत पड़ी, तब्दीली मिलती रही, कभी सिंगापुर, कभी रंगून। हालात ऐसे थे कि इंसान अपनी ज़मीन से कटता चला जाता है, और फिर एक दिन दुश्मन की गिरफ्त में आ जाता है। जर्मन और जापानी फौज के हत्थे वे तीन जवान चढ़े, मेहरदीन, पतराम और किशनपुरा वाला साथी। कुछ समय बाद उन्हें आज़ाद हिंद फौज के हवाले कर दिया गया। यह किस्मत का अजीब मोड़ था, एक गुलाम देश का सिपाही, आज़ादी की फौज के नाम पर एक और मोर्चे में धकेल दिया गया।
लेकिन किस्मत ने यहां भी चैन नहीं लेने दिया। रंगून में वे फिर ब्रिटिश फौज के कब्जे में आ गए। 1947 तक उसी इलाके में रेल मार्ग निर्माण में कैदी के तौर पर काम करते रहे। हथकड़ियां, पहरा, हुक्म, सब कुछ था, बस एक चीज़ नहीं थी, पहचान। उनके पास कोई स्थायी सर्टिफिकेट नहीं बचा, न कोई काग़ज़ जो यह साबित करे कि उन्होंने क्या-क्या झेला।
देश आज़ाद हुआ तो उन्हें रिहाई मिली। दिल्ली पहुंचे, वहां से अपने गांव रावतसर लौटे। न कोई स्वागत, न कोई माला। बाद के वर्षों में उन्होंने अपनी गृहस्थी बसाई। निजी वाहन चलाए, ड्राइवरी की तकनीक ने उन्हें जिंदा रखा। पूरी उम्र मेहनत में गुज़री और फिर चुपचाप परलोक सिधार गए। न पेंशन मिली, न देशभक्ति का कोई तमगा। उनकी जिंदगी वीरानी के फलसफे की तरह थी, बिना शोर, बिना दावे, मगर पूरी सच्चाई के साथ।
ऐसे लोग मैंने न जाने कितने देखे हैं। कितने स्वतंत्रता सेनानी कहलाए, कितनों ने यातनाएं सही, और कितने ऐसे रहे जो गुमनाम ही रह गए। इस इलाके में भादरा साइड के असर से लोगों के मन में आज़ादी की हलचल तो थी, मगर उसकी कीमत भी चुकानी पड़ी। जागीरदारों के खिलाफ बोलने का मतलब था निर्वासन, जिल्लत और डर।
एक बार बीकानेर में स्वतंत्रता सेनानी और ‘लोकमत’ अख़बार के संपादक स्वर्गीय अशोक जी माथुर के पिताजी, स्वर्गीय अंबालाल जी से मुलाकात हुई। उन्होंने बताया कि 1946 में वे प्रजा परिषद के बैनर तले आज़ादी की अलख जगाने रावतसर गए थे। ढाब पर जलसा किया गया, मगर बहुत कम लोग जुटे। वजह साफ थीकृजागीरदार का गढ़ था, खबर फैल चुकी थी। फिर भी ज्यानुसिंह राजपूत नाम का एक आदमी प्रजा परिषद का सदस्य बना। यही बात हजम नहीं हुई। गढ़ से आए लोगों ने सबको हिरासत में लिया और नोहर छोड़ आए। उस वक्त उनके साथ भादरा के हरदत्त सिंह, पंडित कन्हैयालाल और बुद्धवालिया के मोटाराम भिड़ासरा थे।
यहां के जो लोग जागीरदारों का विरोध करते थे, वे अक्सर हरियाणा या बहावलपुरी की तरफ निकल जाते थे। पुराने लोग आज भी बताते हैं कि भींयाराम मटोरिया, मालूराम बिजारणियां, मोटाराम कस्बा और मोटाराम भिड़ासरा जैसे लोगों ने कितनी परेशानियां झेलीं।
आज जब आज़ादी का जश्न बड़े मंचों और नारों में सिमट गया है, तब इन गुमनाम लोगों की याद और भी ज़रूरी हो जाती है। क्योंकि असली आज़ादी सिर्फ़ किताबों और भाषणों से नहीं आई, वह उन बेनाम ज़िंदगियों से आई, जो बिना कुछ मांगे सब कुछ दे गईं।
-लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं





