


भटनेर पोस्ट ब्यूरो.
राजस्थान में सरकार के कामकाज को लेकर विपक्ष के सवाल अक्सर सियासी बहस का हिस्सा रहते हैं, लेकिन कभी-कभी खुद व्यवस्था ऐसी बानगी पेश कर देती है कि सवाल अपने-आप खड़े हो जाते हैं। हनुमानगढ़ से जुड़ा एक ताजा मामला ऐसा ही है, जहां मुख्यमंत्री को शहीद स्मारक आने का भेजा गया एक सम्मानजनक निमंत्रण, मुख्यमंत्री कार्यालय (सीएमओ) की नजर में ‘शिकायत/मांग’ बन गया। इस एक ई-मेल जवाब ने सरकारी सिस्टम की कार्यप्रणाली और संवेदनशीलता पर कई सवालिया निशान छोड़ दिए हैं।
महिला दिवस के अवसर पर मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा राज्य स्तरीय समारोह में भाग लेने के लिए हनुमानगढ़ पहुंचे थे। प्रशासनिक तैयारियां मुकम्मल थीं, कार्यक्रम अपने तय समय पर हुआ और मुख्यमंत्री उसी दिन वापस लौट गए। लेकिन इस दौरे के दौरान वह स्थान छूट गया, जिसे लेकर अब चर्चाओं का बाजार गर्म है, हनुमानगढ़ का शहीद स्मारक।
हनुमानगढ़ शहीद स्मारक के संस्थापक और संयोजक एडवोकेट शंकर सोनी ने 7 मार्च को मुख्यमंत्री के विशेष सचिव, सीएमओ सचिवालय जयपुर को ई-मेल भेजा था। ई-मेल में मुख्यमंत्री से विनम्र निवेदन किया गया था कि हनुमानगढ़ आगमन के अवसर पर वे टाउन स्थित शहीद मंदिर में आकर भारतीय सशस्त्र क्रांति के शहीदों और क्रांतिकारियों को नमन करें। पत्र में यह भी उल्लेख किया गया था कि मुख्यमंत्री देशभक्तों को औपचारिक रूप से स्मरण करते रहे हैं।
दरअसल, यह कोई फरियाद, कोई मांग या कोई शिकायत नहीं था। यह एक तहजीब भरा निमंत्रण था, जिसमें सम्मान भी था और उम्मीद भी। लेकिन लगता है कि सिस्टम ने इसे पढ़ने की जहमत नहीं उठाई।
8 मार्च को मुख्यमंत्री हनुमानगढ़ आए और कार्यक्रम में भाग लेकर चले गए। वे शहीद स्मारक नहीं पहुंचे। इसके एक दिन बाद, 9 मार्च को शहीद स्मारक की ओर से भेजे गए ई-मेल का सीएमओ से जवाब आया। जवाब पढ़कर स्मारक प्रबंधन हैरान रह गया।
सीएमओ की ओर से लिखा गया कि ‘हमसे संपर्क करने के लिए धन्यवाद, आपको हुई असुविधा के लिए खेद है। शिकायत/मांग दर्ज करने की प्रक्रिया के अनुसार कृपया नाम, शिकायत का विवरण, क्षेत्र और संलग्नक भेजें, ताकि आपकी शिकायत/मांग को पंजीकृत किया जा सके।’ यानी शहीदों को नमन का न्यौता, सरकारी भाषा में एक शिकायत बन गया।
जब यह जवाब सामने आया, तो यही सवाल उठा कि क्या मुख्यमंत्री को आमंत्रित करना अब सरकारी रिकॉर्ड में ‘शिकायत’ की श्रेणी में आता है? जानकारों का कहना है कि यह मामला प्रशासनिक लापरवाही और प्रतिलिपि-चिपकाओ संस्कृति का उदाहरण है। सीएमओ जैसे अहम कार्यालय में आने वाले हर ई-मेल को बिना पढ़े एक तयशुदा प्रारूप में निपटा देना, व्यवस्था की गंभीरता पर सवाल खड़े करता है।
प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार, सीएमओ में आने वाले अधिकतर ई-मेलों को एक मानक जवाब भेज दिया जाता है। ई-मेल की प्रकृति क्या है, सुझाव, निमंत्रण या शिकायत। इस फर्क को समझने की मशक्कत शायद अब कम होती जा रही है। नतीजा यह कि शहीदों से जुड़ा मामला भी नियमित जवाब की भेंट चढ़ गया।
वरिष्ठ पत्रकार विमल चौहान का मानना है कि ऐसे छोटे लेकिन प्रतीकात्मक मामले सरकार की छवि को चुपचाप नुकसान पहुंचाते हैं। यह कोई बड़ा नीतिगत मुद्दा नहीं है, लेकिन यह बताता है कि शासन और समाज के बीच संवाद कितना यांत्रिक और बेपरवाह हो गया है। शहीद स्मारक न जाना एक अलग बात हो सकती है, मगर उसे शिकायत समझ लेना, यह सिस्टम के लिए एक चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है।
चौहान कहते हैं कि यह पूरा मामला यही सोचने पर मजबूर करता है कि कहीं प्रशासन की तेजी, उसकी संवेदनशीलता को पीछे तो नहीं छोड़ रही। क्योंकि हर ई-मेल कोई शिकायत नहीं होता, कभी-कभी वह सिर्फ इज्जत और याददाश्त का तकाजा भी होता है।









