



डॉ. विजय कुमार ऐरी.
भीड़ में एक 6 फीट के व्यक्ति को लोगों की टोपी और बाल दिखाई देंगे, एक 4 फीट के बच्चे को हाथ दस्ताने पर्स या कोट दिखाई देंगे तो एक छोटे बच्चों को पांव और जूते, जबकि यह तीनों एक ही समय पर एक ही भीड़ को देख रहे हैं। तीनों का दृश्य संसार भिन्न-भिन्न है क्योंकि तीनों के लिए आंख का स्तर भिन्न है। अतः किसी यथार्थ, दृश्य या दृष्टिकोण के निर्माण के लिए दृष्टि या दृष्टिकोण का बड़ा महत्व है। दुनिया को देखने के लिए एक पक्षी की आंख का दृश्य और एक कीट की आंख का दृश्य भिन्न-भिन्न होगा।
हम सुदूर आकाश और धरती को अनंत में मिलते हुए देखते हैं वह हमारी दृष्टि की सीमा है हमारा क्षितिज। क्षितिज सतत है और जहां क्षितिज का लोप होता है वह हमारा दृष्टि का स्तर है हमारा दृष्टिकोण। दृष्टि के भिन्न-भिन्न स्तर से भिन्न-भिन्न यथार्थ दृष्टिगोचर होते हैं। दृष्टि का स्तर बदलने से हमारा दृष्टिकोण भी बदलता है। यदि दृष्टि का स्तर ऊंचा है तो दृष्टिकोण भी ऊंचा होगा। इसलिए उच्च दृष्टिकोण के लिए दृष्टि के स्तर में परिवर्तन करना आवश्यक है। स्पष्ट है कि दृष्टिकोण के लिए दृष्टि का अत्यंत महत्व है।
हमारी आंखें एक ही दृश्य देखने की आदी हो जाती हैं। यदि हमें दृश्य बदलना है तो दृष्टिकोण भी बदलना पड़ेगा, वरना हमारी स्थिति सावन के अंधे जैसी हो जाएगी और हम एक ही दृष्टि के अधीन नजर बंद हो जाएंगे।
जब दो या दो से अधिक दृष्टिकोण एक दूसरे के समानांतर चलते हुए आगे बढ़ते हैं तो वह कभी लोप बिंदु पर हमारे दृष्टि के स्तर पर क्षितिज में विलीन होते प्रतीत होते हैं, जैसे रेल की पटरियों के समानांतर चलती हुई पेड़ों की श्रृंखला, विद्युत या टेलीफोन के पोल या पटरियों के समांतर चल रहे खेतों की मेड। स्पष्ट है कि सभी दृष्टिकोण भी किसी न किसी बिंदु पर अपने आप में विलीन होते प्रतीत होते हैं जबकि वे सदैव एक दूसरे के समांतर ही रहते हैं।
ऐसा नहीं है कि हमारा यथार्थ शाश्वत या सनातन है कभी न बदलने वाला। जब हमारी दृष्टि के स्तर में परिवर्तन होता है तो क्षितिज पर विलोपन बिंदु भी बदलते हैं और विलोपन बिंदु जितने अलग-अलग जितने दूर-दूर होंगे उतना ही हमारे यथार्थ का चित्रण अधिक स्पष्ट होगा। अर्थात यथार्थ के समुचित चित्रण के लिए हमें अपने दृष्टिकोण का विस्तार करना होगा।
दृष्टिकोण के स्तर में परिवर्तन के लिए हमें अपने स्तर में परिवर्तन करना पड़ेगा वैसे ही जैसे बगिया में खड़े हम पेड़ों पर लगे फूलों को निहार सकते हैं तो नीचे बैठकर छोटे मौसमी फूलों और झाड़ियों का आनंद ले सकते हैं। अधिक व्यापक देखने के लिए हमें ऊंची जगह पर या फिर स्टूल पर खड़े होना होता है, उसी प्रकार दृष्टिकोण बदलने के लिए हमें अध्ययन और अनुभव दोनों की आवश्यकता होती है। पुस्तकों की पीठ पर बैठकर और अनुभव के रथ पर सवार हो कर हम अपने नजर के स्तर को ऊंचा उठा सकते हैं।
विडंबना यह है कि हमने अपने विलोपन बिंदु और अपने क्षितिज और अपनी नजर के स्तर, तीनों तय कर दिए हैं। हम यह मान कर चलते हैं कि जो मेरा सत्य है वही श्रेष्ठ है और उसके लिए हम अडिग बने रहते हैं जबकि वह केवल एक स्तर मात्र है। जब कभी आपकी आंख का स्तर बदलेगा तो आप अपने आप को ठगा सा महसूस करेंगे। तब आप महसूस करेंगे कि हमने वह सब खो दिया जो हम अपनी नजर के स्तर को बदल कर पा सकते थे। इसलिए कहते है कि यथार्थ अनंत है। सबके अपने-अपने यथार्थ हैं और उन यथार्थों के चित्रण के लिए अपने-अपने दृष्टिकोण। फिर भी अन्यों के यथार्थ को नकारा नहीं जाना चाहिए वरन् प्रयास किया जाना चाहिए कि दूसरे के लोप बिंदु पर नजर टीका अपने यथार्थ का मूल्यांकन हो। हो सकता है नजरिया बदले और हम क्षितिज पर और करीब आ जाए। हमारा यथार्थ जाँचा परखा जाए और,और अधिक स्पष्ट हो जाए। बस नजर बदलिए नजरिया बदलेगा और यथार्थ भी। दृष्टि बदलिए दृष्टिकोण भी बदल जाएगा।
-लेेखक सामाजिक और राजनीतिक चिंतक हैं









