





रजनीश गोदारा.
कुछ यात्राएँ शरीर को थकाती हैं, कुछ मन को ताज़ा करती हैं, और कुछ ऐसी होती हैं जो जीवन भर के लिए आत्मा में बस जाती हैं। राजस्थान सरकार की वरिष्ठ नागरिक तीर्थ यात्रा योजना के तहत 5 फरवरी को आरंभ हुई यह यात्रा ठीक वैसी ही थी, श्रद्धा, सम्मान और सेवा का चलता-फिरता तीर्थ। उस सुबह हनुमानगढ़ जंक्शन किसी साधारण स्टेशन जैसा नहीं लग रहा था। वहां रेल की सीटी से अधिक भक्ति की ध्वनि थी, और प्लेटफॉर्म पर भीड़ से अधिक प्रतीक्षा की शांति।

जब वरिष्ठ नागरिक स्टेशन पर एकत्र हुए, तो उनके चेहरों पर वर्षों की तपस्या-सी प्रतीक्षा झलक रही थी। आंखों में उत्साह था, मन में भक्ति और हृदय में यह भरोसा कि अब वर्षों से संजोया सपना साकार होने जा रहा है, तिरुपति बालाजी के दर्शन। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो पूरा राजस्थान एक साथ ‘गोविंदा’ का नाम लेकर दक्षिण की ओर चल पड़ा हो। राज्य सरकार के निर्देशानुसार देवस्थान विभाग ने सहायक आयुक्त ओमप्रकाश और निरीक्षक सलीम के नेतृत्व में स्टेशन के बाहर भव्य पंडाल सजाया। स्वागत केवल औपचारिक नहीं था, बल्कि आत्मीय था। यात्रियों को माला, दुपट्टा और दैनिक उपयोग की सामग्री भेंट की गई। आईआरसीटीसी की टीम ने चाय-नाश्ते से लेकर समस्त व्यवस्थाओं तक, हर मोर्चे पर सेवा का उदाहरण प्रस्तुत किया।

यात्रा से पहले वाग्भट्ट वैलनेस आयुष हॉस्पिटल की ओर से जड़ी-बूटी युक्त गरम काढ़ा पिलाया गया, मानो परंपरा ने आधुनिक व्यवस्था का हाथ थाम लिया हो। किन्नर समाज द्वारा सरस डेयरी की खीर, सुंदरकांड भजन मंडली द्वारा सुंदरकांड और हनुमान चालीसा, हर भेंट में आशीर्वाद छिपा था। भाजपा नेता देवेंद्र अग्रवाल, किन्नर समाज की नेत्री मैना बाई, समाजसेवी विजय कौशिक और पंडित गिरिराज शर्मा ने हरी झंडी दिखाकर विशेष वातानुकूलित ट्रेन को रवाना किया। रिबन कटा, नारियल फोड़ा गया और ‘जय बालाजी’ के जयकारों के बीच ट्रेन श्रद्धा की पटरी पर आगे बढ़ चली।

इस विशेष एसी ट्रेन में हनुमानगढ़, बीकानेर और भगत की कोठी (जोधपुर) से कुल 949 वरिष्ठ नागरिक सवार हुए। हर कोच में दो अनुदेशक, पूरी तरह सुसज्जित मेडिकल टीम और एक ट्रेन प्रभारी। व्यवस्था ऐसी कि बुजुर्गों को किसी अपने की कमी महसूस न हो। डॉ. यतिन सिंगला के नेतृत्व में मेडिकल टीम हर दिन यात्रियों का हाल-चाल लेती रही। साफ-सुथरे कोच, स्वच्छ शौचालय और मुस्कुराता स्टाफ, यह रेलगाड़ी कम और चलता हुआ परिवार अधिक लगती थी।

यात्रा के दौरान भजन, जयकारे और हंसी-ठिठोली, 55 घंटे का लंबा सफर कब बीत गया, पता ही नहीं चला। 7 फरवरी की शाम ट्रेन आंध्र प्रदेश के रेनीगुंटा स्टेशन पहुँची। वहां यात्रियों की गणना कर उन्हें सुव्यवस्थित समूहों में तिरुचनूर स्थित विश्राम स्थलों पर भेजा गया। ‘गोविंदा-गोविंदा’ के उद्घोष के साथ बसें आगे बढ़ीं, और हर यात्री के चेहरे पर संतोष साफ झलक रहा था।
रात्रि विश्राम और भोजन के बाद सभी यात्री तिरुमला तिरुपति देवस्थानम द्वारा संचालित दर्शन व्यवस्था के अनुसार तिरुमला की ओर रवाना हुए। अगले दिन सात पहाड़ियों पर स्थित श्री वेंकटेश्वर स्वामी मंदिर के दर्शन हुए। वही स्थान जिसे श्रद्धालु ‘कलियुग का वैकुंठ’ कहते हैं। किसी ने केश दान किया, किसी ने पुष्करणी सरोवर में स्नान, हर क्रिया में समर्पण था।

दर्शन के उपरांत यात्री तिरुचनूर लौटे और अगले दिन प्रातः पद्मावती मंदिर में देवी लक्ष्मी के दर्शन किए। मान्यता है कि इनके बिना बालाजी की यात्रा पूर्ण नहीं होती। दर्शन के बाद थोड़ी फोटोग्राफी, थोड़ी शॉपिंग, यह आस्था के साथ जीवन का उत्सव था।
9 फरवरी को वापसी यात्रा शुरू हुई और 11 फरवरी की रात ट्रेन पुनः हनुमानगढ़ जंक्शन पहुँची। वही कोच, वही स्टाफ, लेकिन अब संबंध गहरे हो चुके थे। ऐसा लगता था मानो ये बुजुर्ग हमारे अपने हों, जिनका आशीर्वाद पूरे सफर को आयुष्मान बना गया।
इस दिव्य यात्रा के लिए राजस्थान सरकार, देवस्थान विभाग, आईआरसीटीसी, रेलवे स्टाफ, अनुदेशक, अनुरक्षक, मेडिकल टीम और सफाईकर्मियों का योगदान अमूल्य रहा। यह यात्रा केवल तीर्थ नहीं थी, बल्कि उन लोगों के लिए ईश्वरीय वरदान बनी, जो आर्थिक कारणों से कभी ऐसे दर्शन की कल्पना भी नहीं कर पाते। ‘गोविंदा-गोविंदा’ के उद्घोष के साथ यह यात्रा आस्था, सेवा, संस्कृति और सम्मान का ऐसा संगम बन गई, जो वरिष्ठ नागरिकों के चेहरे पर मुस्कान, आंखों में चमक और मन में नई ऊर्जा छोड़ गई, एक ऐसी स्मृति, जो जीवन भर साथ चलेगी।
-लेखक अतिरिक्त मुख्य ब्लॉक शिक्षा अधिकारी पीलीबंगा में पदस्थापित हैं





