





गोपाल झा
मैथिली में एक कहावत है, ‘चोर बाजय जोर स।’ अर्थात दोषी व्यक्ति कई बार अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए सबसे अधिक शोर मचाता है। हालांकि, किसी के ऊंची आवाज में बोलने भर से उसे दोषी नहीं ठहराया जा सकता। लोकतंत्र में आरोपों का मूल्यांकन तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर होना चाहिए, न कि आवाज की ऊंचाई से। लेकिन जब राजनीतिक बहस में तर्क की जगह आरोप, संवाद की जगह कटुता और असहमति की जगह विरोधियों को बदनाम करने की प्रवृत्ति हावी होने लगे, तब लोकतांत्रिक व्यवस्था की सेहत पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। इसकी मजबूती केवल चुनाव कराने, सरकारें बनाने और बहुमत के आधार पर निर्णय लेने में नहीं, बल्कि असहमत विचारों को जगह देने में भी निहित है। बहुमत सरकार बनाने का अधिकार देता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि अल्पमत की आवाज अप्रासंगिक हो जाती है। सरकार की नीतियों पर सवाल उठाना, उसके निर्णयों का विरोध करना और अपनी मांगों के लिए शांतिपूर्ण आंदोलन करना नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकार हैं। इन अधिकारों को सत्ता के प्रति निष्ठा की कसौटी पर परखना लोकतंत्र की मूल भावना के विपरीत है।
भारतीय राजनीति में असहमति के प्रति सम्मान की चर्चा करते समय भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी का वह विचार याद आता है, जिसमें उन्होंने लोकतांत्रिक व्यवस्था में असहमति के प्रति सहिष्णुता से आगे बढ़कर सम्मान की आवश्यकता पर बल दिया था। यह विचार किसी एक राजनीतिक दल की विरासत नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की साझा पूंजी है। सवाल यह है कि क्या आज राजनीतिक दल इस कसौटी पर खरे उतर रहे हैं? क्या सत्ता में बैठे लोगों के लिए विरोधी विचारों को सुनना उतना ही सहज है, जितना चुनाव के समय जनता से समर्थन मांगना?
पिछले एक दशक से अधिक समय में राजनीतिक विमर्श की भाषा में आए बदलाव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा किसान आंदोलन के संदर्भ में ‘आंदोलनजीवी’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल और राजनीतिक विरोधियों पर तीखे प्रहार इसके उदाहरण हैं। दूसरी ओर, विपक्षी दल भी कई बार व्यक्तिगत आरोपों और कटु भाषा का सहारा लेते हैं। इसलिए समस्या को केवल एक दल तक सीमित करना उचित नहीं होगा। फिर भी, लोकतंत्र में सत्ता की जवाबदेही अधिक होती है, क्योंकि उसके पास प्रशासनिक संसाधन, संस्थागत अधिकार और निर्णय लेने की शक्ति होती है। इसीलिए सत्तापक्ष से संयम और उदारता की अपेक्षा भी अधिक की जाती है।
मीडिया की भूमिका इस बहस को और महत्वपूर्ण बनाती है। पत्रकारिता का दायित्व सरकार की उपलब्धियों का प्रचार करना नहीं, बल्कि उसके निर्णयों की पड़ताल करना, जनता के सवाल उठाना और सत्ता को जवाबदेह बनाना है। जब समाचार माध्यम राजनीतिक पक्षधरता के कारण सवाल पूछने के बजाय विपक्ष को कठघरे में खड़ा करने लगें, तब उनकी विश्वसनीयता प्रभावित होती है। हालांकि, सभी पत्रकारों और समाचार चैनलों को एक ही तराजू में तौलना भी न्यायसंगत नहीं होगा। आज भी अनेक पत्रकार कठिन परिस्थितियों में तथ्य सामने लाने और जनहित के मुद्दों को उठाने का काम कर रहे हैं।
शांतिपूर्ण आंदोलनों के दौरान उपद्रव, हिंसा या प्रदर्शनकारियों को उकसाने की आशंका से जुड़े आरोप भी गंभीरता से जांचे जाने चाहिए। यदि किसी आंदोलन में बाहरी तत्वों ने तनाव बढ़ाने, हिंसा भड़काने या पत्रकारों और प्रदर्शनकारियों को डराने का प्रयास किया है, तो उनकी पहचान और भूमिका का निष्पक्ष निर्धारण जरूरी है।
दरअसल, भारत इस समय राजनीतिक ध्रुवीकरण, सोशल मीडिया पर दुष्प्रचार, संस्थाओं की निष्पक्षता को लेकर उठते सवालों और सार्वजनिक संवाद में बढ़ती कटुता जैसी चुनौतियों का सामना कर रहा है। इन परिस्थितियों को लोकतंत्र का अंत मान लेना अतिशयोक्ति होगी, लेकिन इन्हें सामान्य राजनीतिक प्रतिस्पर्धा कहकर टाल देना भी उचित नहीं है। लोकतांत्रिक संस्थाएं तभी मजबूत रहती हैं, जब सरकार, विपक्ष, मीडिया और नागरिक समाज अपनी-अपनी सीमाओं तथा जिम्मेदारियों को समझते हैं।
अंततः सवाल यह नहीं है कि चोर कौन है और साहूकार कौन। असली सवाल यह है कि आरोप लगाने वाले और आरोपों का सामना करने वाले, दोनों के लिए जवाबदेही के समान मानदंड हैं या नहीं। सरकार को आलोचना से घबराने के बजाय तथ्यों के साथ जवाब देना चाहिए, विपक्ष को विरोध के साथ वैकल्पिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करना चाहिए और मीडिया को किसी भी पक्ष का प्रचार माध्यम बनने से बचना चाहिए।
लोकतंत्र की मरम्मत केवल जनता के भरोसे नहीं छोड़ी जा सकती; इसके लिए सत्ता और समाज, दोनों को अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी। असहमति को ‘देशविरोध’ या ‘अराजकता’ का पर्याय मानने के बजाय उसे व्यवस्था सुधारने का अवसर समझना होगा। क्योंकि जिस लोकतंत्र में सवाल पूछने वालों की आवाज दबने लगे, वहां समस्या केवल विरोध करने वालों की नहीं रहती, वह पूरे लोकतंत्र की समस्या बन जाती है।






