




गोपाल झा
लंबे इंतजार के बाद आखिरकार राजस्थान के शहरों और कस्बों में चुनावी ढोल बज ही गया। लोकतंत्र का यह जमीनी जलसा जब भी लौटता है, अपने साथ एक अलग ही रंगत लाता है। प्रदेश की 309 शहरी निकायों की 10,245 पार्षद सीटों पर इस वक्त जो घमासान छिड़ा है, वह केवल गली-मोहल्ले की नालियों या स्ट्रीट लाइटों तक सीमित नहीं है। 10 नगर निगम, 51 नगर परिषद और 248 नगरपालिकाओं की यह बिसात सीधे तौर पर जयपुर और दिल्ली के सियासी समीकरणों की धड़कनें तेज कर रही है। राजधानी जयपुर में ही 24 लाख से ज्यादा मतदाता हैं और कुल मिलाकर प्रदेश के 1.44 करोड़ शहरी नागरिक यह तय करेंगे कि शहरों की बागडोर किसके हाथ जाएगी।
आमतौर पर स्थानीय निकायों के चुनावों को स्थानीय मुद्दों पर लड़ा जाने वाला मुकाबला माना जाता है, लेकिन इस बार हवा का रुख कुछ अलग है। राज्य में भारतीय जनता पार्टी सत्ता में है और विपक्ष (कांग्रेस) लगातार यह दावा कर रहा है कि जमीन पर सरकार के खिलाफ नाराजगी का माहौल है। ऐसे में सत्तापक्ष के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह साबित करने की है कि जनता का भरोसा अब भी उसी के साथ है। अगर भाजपा अधिकांश बोर्ड बनाने में कामयाब नहीं होती, तो विपक्ष के ‘एंटी-इंकंबेंसी’ के नैरेटिव को हवा मिलेगी। वहीं विपक्ष के लिए भी यह महज एक चुनाव नहीं, बल्कि अपनी जमीन वापस पाने का ‘लिटमस टेस्ट’ है। सत्ता की इस चौसर पर केवल बयानों की गुंजाइश नहीं होती; अंत में आंकड़े ही बताते हैं कि किसकी रणनीति सटीक बैठी और कौन मात खा गया।
रणनीति और सक्रियता के मोर्चे पर दोनों खेमों में फर्क साफ दिखाई दे रहा है। सत्तापक्ष ने इस चुनावी रण में अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। संगठन का पहिया पूरी रफ्तार से घूम रहा है और सरकार भी कोई कसर नहीं छोड़ रही। मुख्यमंत्री से लेकर केंद्रीय मंत्रियों तक की फौज वार्ड-वार्ड घूमकर एक-एक वोट सहेजने में जुटी है। इस सक्रियता ने मुकाबले को बेहद आक्रामक बना दिया है। इसके विपरीत, विपक्ष की ओर से वह आक्रामकता फिलहाल नदारद दिखती है जिसकी दरकार इतने बड़े दंगल में होती है। बड़े नेता अपनी आलीशान कोठियों और दफ्तरों से बाहर निकलकर पसीना बहाने में झिझकते दिख रहे हैं और पूरा दारोमदार स्थानीय क्षत्रपों व प्रत्याशियों के कंधों पर ही छोड़ दिया गया है। जमीनी लड़ाई में सेनापति की मौजूदगी हमेशा सैनिकों का हौसला बढ़ाती है, और यहीं विपक्ष थोड़ा सुस्त नजर आता है।
इन सब सियासी दांव-पेंचों के बीच अगर कोई सबसे ज्यादा सुकून में है, तो वह है आम मतदाता। पांच साल तक शिकायतों की फाइलें लेकर दफ्तरों के चक्कर काटने वाली जनता के लिए चुनाव का यह दौर किसी उत्सव से कम नहीं होता। वार्डों में दावतों का दौर जारी है। कहीं मुफ्त का लजीज खाना चल रहा है, तो कहीं जाम छलक रहे हैं। मतदाताओं की यह मौज-मस्ती और प्रत्याशियों के आगे-पीछे हाथ जोड़े घूमने की लाचारी बताती है कि लोकतंत्र में असली ताकत किसके पास है। मतदाता इस सियासी आवभगत का पूरा आनंद ले रहे हैं, जबकि प्रत्याशी उनके इस सुरूर को अपना गुरूर समझकर जीत के झूठे दिवास्वप्नों में खोए हुए हैं।
फैसले की घड़ी 14 सितंबर को तय है। उस दिन गणेश चतुर्थी का पावन पर्व है। विघ्नहर्ता गजानन किसके विघ्न हरेंगे और किसके सियासी रास्ते में विघ्न डालेंगे, यह तो ईवीएम से पर्दा उठने के बाद ही साफ होगा। लेकिन इसमें कोई दोराय नहीं कि यह परिणाम महज कुछ सौ या हजार पार्षदों की जीत-हार नहीं होगा। यह चुनाव भाजपा के लिए अपनी लोकप्रियता की निरंतरता पर मुहर लगवाने की परीक्षा है, तो कांग्रेस के लिए जनता के बीच अपनी प्रासंगिकता और स्वीकार्यता को साबित करने की अंतिम ढाल। 14 सितंबर का नतीजा सूबे की दोनों प्रमुख पार्टियों के नेतृत्व का भविष्य और आने वाले दिनों की सियासी दिशा तय करेगा। गेंद अब जनता के पाले में है।

