



गोपाल झा
हनुमानगढ़ में शहर की सरकार किसकी बनेगी, यह अभी कहना वैसा ही है जैसे बरसात से पहले बादल देखकर यह बता देना कि खेत में कितना पानी उतरेगा। चुनाव सामने है, दावेदारों की भीड़ है, पोस्टर हैं, दावे हैं और सबसे ऊपर वह भरोसा जो हर चुनाव में थोड़ा-थोड़ा कम होता जाता है। इस बार कांग्रेस और भाजपा दोनों के सामने असली सवाल विरोधी से लड़ने का नहीं, अपने ही कार्यकर्ताओं पर भरोसा करने का है।
पिछला चुनाव इसका सबसे बड़ा सबक है। कांग्रेस ने 60 में से 35 सीटें जीतीं। भाजपा 18 पर रही। कागज पर कांग्रेस के पास प्रचंड बहुमत था। लेकिन राजनीति आदमी के साथ चलती है। समय बीता तो कांग्रेस के पास तीन पार्षद रह गए और भाजपा के पास चार। बाकी सब निर्दलीय विधायक गणेशराज बंसल के साथ हो लिए। यानी जनता ने जिनको कांग्रेस-भाजपा के टिकट पर भेजा था, उन्होंने राजनीति में अपना ‘नया घर’ खोज लिया। लोकतंत्र में यह अपराध नहीं, मगर दलों के लिए यह राजनीतिक तमाचा जरूर था।

इसीलिए इस बार दोनों पार्टियां फूंक-फूंककर कदम रख रही हैं। कांग्रेस कह रही है कि टिकट चाहिए तो बूथ अध्यक्ष, वार्ड अध्यक्ष और वरिष्ठ कार्यकर्ताओं को साथ लेकर आइए। विधानसभा और लोकसभा चुनाव में पार्टी विरोधी गतिविधियों का रिकॉर्ड भी देखा जाएगा। पचास प्रतिशत टिकट युवाओं को देने की बात है। यानी पार्टी इस बार चेहरे ही नहीं, चरित्र भी तलाश रही है। यह अच्छी बात है। मगर सवाल यह है कि चरित्र की जांच केवल पुराने हिसाब-किताब से होगी या नए रिश्तों की भी पड़ताल होगी?
कांग्रेस के भीतर ‘गद्दार’ शब्द का इस्तेमाल जिस तेजी से हो रहा है, उससे लगता है कि पार्टी ने बागियों के लिए दरवाजा बंद कर दिया है। राजनीति में दरवाजा बंद करना आसान होता है, लेकिन उसके बाहर खड़े आदमी की कहानी सुनना मुश्किल। जिन निवर्तमान पार्षदों ने पार्टी से दूरी बनाई, उनमें से अधिकांश का कहना है कि वे पार्टी-विरोधी नहीं थे; वे नेतृत्व की बेरुखी से नाराज थे। अविश्वास प्रस्ताव में वे निर्दलीय विधायक गुट के साथ क्यों गए, यह पूछने की जहमत नेतृत्व ने नहीं उठाई। न समझाइश, न संवाद और न आत्ममंथन। फिर सीधे फैसला, गद्दार।

राजनीति में संवाद बंद हो जाए तो गलतफहमी को पैर लग जाते हैं। और जब गलतफहमी चलकर बहुत दूर निकल जाए तो वह खाई बन जाती है।
भाजपा की हालत भी इससे बहुत अलग नहीं है। पार्टी ने टिकट के दावेदारों से कहा है कि अपने अलावा तीन और नाम लेकर आइए। यानी टिकट एक का होगा, मगर जिम्मेदारी चार की। फार्मूला सुनने में अच्छा है। इससे टिकट की छीना-झपटी कुछ कम हो सकती है। मगर चुनाव गणित से कम और मन से ज्यादा जीता जाता है। जिसे टिकट नहीं मिला, वह दूसरे को जिताने के लिए उतनी ही मेहनत करेगा, यह भरोसा मौखिक हो सकता है, वास्तविक नहीं।

दिलचस्प बात यह है कि कई वार्डों में कांग्रेस और भाजपा के कार्यकर्ताओं ने खुद को निर्दलीय विधायक गुट में मर्ज कर लिया है। सोशल मीडिया के पोस्टर इस नई सियासी जमावट की चुगली कर रहे हैं। इससे दोनों दलों का सिरदर्द एक तरह से कम हुआ है। अब पुराने दावेदारों की जगह नए चेहरों को मौका दिया जा सकता है। लेकिन नया चेहरा नया वोट लेकर आएगा, इसकी कोई गारंटी नहीं।
दरअसल, दोनों पार्टियां एक पुरानी गलती फिर करती दिखाई दे रही हैं। चुनाव के समय आदमी की निष्ठा नापने बैठ जाती हैं, मगर चुनाव के बाद उसी आदमी की नाराजगी सुनने का वक्त नहीं निकालतीं। कांग्रेस के कुछ निवर्तमान पार्षद चौधरी विनोद कुमार के आसपास के लोगों पर चाटुकारिता का आरोप लगाते हैं। भाजपा के कुछ पार्षद पूछते हैं कि जब गणेशराज बंसल ने भाजपा सरकार को समर्थन दिया और कांग्रेस के टिकट पर जीते सुमित रणवां को चेयरमैन बनवाया, तब पार्टी नेतृत्व ने क्या किया?

इन सवालों के जवाब शायद किसी के पास नहीं हैं। या हैं तो कोई देना नहीं चाहता।
यही राजनीति की विडंबना है। आलाकमान को कार्यकर्ता चुनाव के समय याद आता है और कार्यकर्ता को आलाकमान तब याद आता है जब उसकी टिकट कटती है। बीच के पांच साल में दोनों के बीच अक्सर वही रिश्ता रहता है जो सरकारी फाइल और बाबू के बीच होता है, काम पड़े तो पहचान, वरना सलाम भी दूर से।
हनुमानगढ़ में इस बार कांग्रेस और भाजपा के सामने केवल जिताऊ उम्मीदवार खोजने की चुनौती नहीं है। असली चुनौती टिकाऊ उम्मीदवार खोजने की है। ऐसा आदमी जो जीतने के बाद जीतने वाले के साथ नहीं, अपनी पार्टी के साथ खड़ा रहे। मगर इसके लिए टिकट देने से पहले एक और काम करना पड़ेगा, पार्टी को अपने भीतर झांकना होगा।
क्योंकि बगावत हमेशा बागी की गलती नहीं होती। कभी-कभी बगावत उस दरवाजे की भी देन होती है, जिसे समय पर खोला नहीं गया।
शहर की सरकार कौन बनाएगा, इसका फैसला मतदाता करेंगे। लेकिन कांग्रेस और भाजपा अगर सचमुच शहर पर राज करना चाहती हैं तो पहले उन्हें अपने-अपने घर में भरोसे की सरकार बनानी होगी। वरना फिर वही होगा, टिकट पार्टी का, जीत पार्टी की और सरकार किसी तीसरे की।
-लेखक भटनेर पोस्ट मीडिया ग्रुप के चीफ एडिटर हैं







