



भटनेर पोस्ट डेस्क
हनुमानगढ़ नगर परिषद के सभापति पद की आरक्षण तस्वीर साफ होने के साथ ही शहर की राजनीति में हलचल जरूर तेज हो गई है, लेकिन इसे चुनावी समीकरणों की अंतिम तस्वीर मानना जल्दबाजी होगी। इस बार सभापति पद सामान्य महिला के लिए आरक्षित किया गया है। पिछली बार सामान्य सीट होने पर कांग्रेस का बोर्ड बना था। ऐसे में पिछले करीब छह माह से सभापति पद की दौड़ में खुद को संभावित दावेदार मानकर चल रहे पुरुष नेताओं के सामने अब रणनीति बदलने की चुनौती खड़ी हो गई है।
कई संभावित दावेदारों के चुनावी गतिविधियों से पीछे हटने की चर्चा है, जबकि कुछ नेता अपनी पत्नी, मां या बेटी को चुनाव मैदान में उतारकर सभापति की कुर्सी तक पहुंचने की कोशिश कर सकते हैं। यानी आरक्षण ने दावेदारों के चेहरे जरूर बदल दिए हैं, लेकिन सत्ता का रास्ता अभी भी पूरी तरह खुला नहीं है।
सभापति पद का आरक्षण तय हो गया है, लेकिन नगर परिषद के 60 वार्डों का आरक्षण अभी बाकी है। यही वह चरण है, जो आने वाले चुनाव की वास्तविक राजनीतिक दिशा तय करेगा।

मसलन, कोई संभावित दावेदार अपनी पत्नी या परिवार की किसी महिला को चुनाव मैदान में उतारना चाहता है, लेकिन उसका पसंदीदा वार्ड यदि किसी ऐसे वर्ग के लिए आरक्षित हो जाता है, जिसके लिए वह उम्मीदवार पात्र नहीं है, तो पूरी रणनीति धरी रह जाएगी। इसी तरह जिस वार्ड में मजबूत राजनीतिक पकड़ है, वहां आरक्षण बदलने से वर्षों की राजनीतिक तैयारी पर असर पड़ सकता है। इसलिए फिलहाल सभापति पद की सामान्य महिला सीट को देखकर किसी दल या उम्मीदवार की जीत-हार का अनुमान लगाना राजनीतिक रूप से जोखिम भरा होगा।

महिला आरक्षण के बाद शहर में महिला चेहरों की राजनीतिक सक्रियता बढ़ने की संभावना है। लंबे समय से सभापति बनने की तैयारी कर रहे कुछ पुरुष नेता अब अपनी पत्नी, मां या बेटी को राजनीति में आगे कर सकते हैं। लेकिन यहां भी एक बड़ा सवाल है, क्या वह महिला अपने वार्ड से चुनाव लड़ पाएगी? इसका जवाब वार्डों की आरक्षण लॉटरी के बाद ही मिलेगा। इसके बाद ही यह तय होगा कि कौन-कौन से परिवार चुनावी मैदान में उतरने की स्थिति में हैं।
उधर, विधायक गणेशराज बंसल ने महिला सीट आरक्षित होने पर शहर की मातृशक्ति को बधाई देते हुए महिलाओं से राजनीति में बढ़-चढ़कर भाग लेने का आग्रह किया है। उनका संदेश ऐसे समय आया है जब महिला आरक्षण के कारण कई नए राजनीतिक चेहरों के सामने आने की संभावना है।

पिछली बार सभापति की सीट सामान्य थी और कांग्रेस का बोर्ड बना था। इस बार सामान्य महिला सीट होने से दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों के सामने उम्मीदवार चयन का समीकरण बदल गया है। अब केवल यह महत्वपूर्ण नहीं होगा कि किस नेता की शहर में पकड़ मजबूत है, बल्कि यह भी देखना होगा कि उसकी राजनीतिक टीम में ऐसा महिला चेहरा कौन है, जो अपने वार्ड से चुनाव लड़ सके और जीतने की स्थिति में हो। यही कारण है कि अभी से किसी एक दल या गुट को बढ़त देना जल्दबाजी होगी। वार्ड आरक्षण के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि पुराने दावेदारों में से कितने मैदान में रहते हैं और कितने नए महिला चेहरे सामने आते हैं।

हनुमानगढ़ नगर परिषद में 60 वार्ड और 1.31 लाख से अधिक मतदाता हैं। अब जिला कलेक्टर के स्तर पर वार्डों के आरक्षण की लॉटरी निकाली जानी है। इसके बाद राज्य निर्वाचन आयोग चुनाव कार्यक्रम घोषित करेगा और आदर्श आचार संहिता लागू होगी। इसलिए फिलहाल सभापति पद का आरक्षण सिर्फ चुनावी तस्वीर का पहला हिस्सा है। असली राजनीतिक गणित वार्डों के आरक्षण के बाद सामने आएगा। किस नेता का वार्ड सुरक्षित रहता है, किसका आरक्षित हो जाता है, कौन अपनी महिला उम्मीदवार को मैदान में उतार पाता है और किस दल को कितने मजबूत वार्ड मिलते हैं, इन सवालों के जवाब अभी बाकी हैं।




