




भटनेर पोस्ट चुनाव डेस्क
राजस्थान में निकाय और पंचायतीराज चुनाव की प्रक्रिया शुरू होने के साथ ही सरकार ने अधिकारियों के तबादलों की कवायद तेज कर दी है। राज्य निर्वाचन आयोग के निर्देशों के तहत चुनाव से पहले संबंधित विभागों में तबादला सूचियां तैयार की जा रही हैं। माना जा रहा है कि आचार संहिता लागू होने से पहले ही बड़े स्तर पर अधिकारियों के तबादले कर दिए जाएंगे।
आयोग ने निर्देश दिए हैं कि किसी जिले, शहर या पंचायत में एक ही पद या क्षेत्र में तीन वर्ष से अधिक समय से कार्यरत अधिकारियों को बदला जाए। इसके साथ ही अधिकारियों को उनके गृह जिले, शहर अथवा संबंधित पालिका क्षेत्र में पदस्थ नहीं रखने के निर्देश भी दिए गए हैं। इन्हीं निर्देशों की पालना में विभागवार अधिकारियों की सूची तैयार की जा रही है।
पंचायतीराज संस्थाओं और नगरीय निकायों के चुनाव को देखते हुए राज्य निर्वाचन आयोग ने संबंधित अधिकारियों के तबादले और पदस्थापन 15 अगस्त तक करने के निर्देश दिए हैं। आयोग के अनुसार संभागीय आयुक्त, रेंज के आईजी/डीआईजी और जिला कलेक्टर जैसे महत्वपूर्ण अधिकारियों को चुनाव कार्यक्रम घोषित होने से लेकर निर्वाचन प्रक्रिया पूरी होने तक उनके गृह जिले में पदस्थ नहीं रखा जाएगा।
इन निर्देशों के बाद प्रशासनिक महकमे में तबादलों को लेकर हलचल बढ़ गई है। अलग-अलग विभाग अपने यहां तीन वर्ष या उससे अधिक समय से पदस्थ अधिकारियों की सूची तैयार कर रहे हैं।
तबादलों को लेकर प्रशासनिक हलकों में सबसे बड़ा सवाल समय को लेकर उठ रहा है। यदि चुनाव से ठीक पहले एसडीएम और कलेक्टर स्तर के अधिकारियों के तबादले होते हैं तो नए अधिकारियों को संबंधित क्षेत्र की राजनीतिक, भौगोलिक और प्रशासनिक परिस्थितियों को समझने में समय लगेगा।

नए अधिकारियों के लिए स्थानीय जनप्रतिनिधियों, प्रशासनिक टीम और स्थानीय परिस्थितियों के साथ सामंजस्य स्थापित करना भी चुनौतीपूर्ण हो सकता है। ऐसे में चुनाव जैसी संवेदनशील और व्यापक प्रक्रिया को सुचारु रूप से संचालित करने में शुरुआती दिक्कतें आ सकती हैं।
वरिष्ठ पत्रकार विमल चौहान का कहना है कि अधिकारियों के तबादलों की प्रक्रिया कम से कम एक महीने पहले पूरी हो जानी चाहिए थी। उनका मानना है कि चुनाव से ठीक पहले अधिकारियों को बदलने से प्रशासनिक व्यवस्था पर असर पड़ सकता है।
तबादला सूची तैयार करने में सबसे बड़ी तकनीकी परेशानी तीन वर्ष की अवधि की गणना को लेकर सामने आ रही है। राजस्थान में पहले 50 जिले थे, लेकिन सरकार ने बाद में इनमें से 9 जिलों को समाप्त कर दिया। इस वजह से विभागों के सामने यह सवाल खड़ा हो गया है कि उस अवधि को किस तरह गिना जाए, जब अधिकारी अलग जिले में पदस्थ थे।
एक पक्ष का तर्क है कि जिस समय अलग जिला अस्तित्व में था, उस दौरान वहां पदस्थ अधिकारी को अलग जिले में ही कार्यरत माना जाना चाहिए। वहीं कुछ विभाग अब पुनर्गठन के बाद की वर्तमान स्थिति के आधार पर तीन वर्ष की अवधि की गणना कर रहे हैं।

मसलन, जब जयपुर और दूदू अलग-अलग जिले थे, उस अवधि में जयपुर से दूदू स्थानांतरित होकर गए अधिकारी को तकनीकी रूप से अलग जिले में पदस्थ माना जाना चाहिए। लेकिन अब दूदू को फिर से जयपुर में शामिल किए जाने के बाद कुछ विभाग दोनों स्थानों को एक ही जिला मानकर अधिकारी की कुल पदस्थापना अवधि की गणना कर रहे हैं।
इस तकनीकी पेच के कारण तबादला सूची को अंतिम रूप देने में विभागों को परेशानी हो रही है। हालांकि चुनाव आयोग के निर्देश स्पष्ट हैं और सरकार को तय समयसीमा में प्रक्रिया पूरी करनी है। ऐसे में आने वाले दिनों में जारी होने वाली तबादला सूची पर अधिकारियों के साथ-साथ राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों की भी नजर रहेगी।






