




भटनेर पोस्ट पॉलिटिकल डेस्क
शहरी निकाय और पंचायतीराज चुनाव का काउंटडाउन शुरू होते ही हनुमानगढ़ की राजनीति अचानक गर्मा गई है। अभी चुनाव कार्यक्रम का औपचारिक ऐलान नहीं हुआ है, लेकिन टिकट के दावेदारों की सक्रियता यह संकेत दे रही है कि चुनावी मैदान सज चुका है। राजनीतिक दल संगठन को मजबूत करने में जुट गए हैं, जबकि संभावित उम्मीदवार क्षेत्रीय नेताओं और संगठन पदाधिकारियों के यहां लगातार संपर्क साध रहे हैं। सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर टिकट का अंतिम फैसला किसके हाथ में होगा।
भारतीय जनता पार्टी ने संभाग प्रभारियों की नियुक्ति कर चुनावी तैयारियों को गति दे दी है। बूथ स्तर पर संगठन को मजबूत करने पर विशेष जोर दिया जा रहा है और पार्टी कार्यालय में लगातार बैठकों का दौर चल रहा है। दूसरी ओर कांग्रेस कार्यालय में भी कार्यकर्ताओं की आवाजाही बढ़ गई है। लंबे समय से संगठन से दूरी बनाए रखने वाले नेता भी अब जिला कांग्रेस कार्यालय जाकर ‘हाजिरी’ लगाने लगे हैं। इसकी वजह साफ है, स्थानीय राजनीति में यह धारणा मजबूत है कि टिकट की पहली सीढ़ी संगठन से होकर गुजरती है।

हालांकि इस बार हनुमानगढ़ नगरपरिषद चुनाव केवल कांग्रेस और भाजपा की पारंपरिक लड़ाई नहीं रहने वाला। पिछले विधानसभा चुनाव के बाद शहर की राजनीति का समीकरण पूरी तरह बदल चुका है। कांग्रेस के टिकट पर नगरपरिषद चेयरमैन रहे गणेशराज बंसल निर्दलीय विधायक बने और चुनाव जीतने के बाद उन्होंने भाजपा सरकार को समर्थन दे दिया। इससे राजनीतिक स्थिति पहले की तुलना में कहीं अधिक जटिल हो गई है।

दिलचस्प यह भी है कि सरकार स्तर पर बंसल को भाजपा विधायक दल का सहयोगी माना जाता है, लेकिन स्थानीय भाजपा का एक बड़ा वर्ग अब भी उन्हें पूरी तरह ‘अपना’ मानने से इनकार कर रहा है। दूसरी ओर कांग्रेस भी उस राजनीतिक खालीपन से पूरी तरह बाहर नहीं निकल सकी है, जो बंसल के पार्टी छोड़ने के बाद बना। यही कारण है कि निकाय चुनाव में दोनों दलों को उम्मीदवार चयन के दौरान कई स्तरों पर संतुलन साधना पड़ेगा।

पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और भाजपा के अनेक वरिष्ठ कार्यकर्ता प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से गणेशराज बंसल के साथ दिखाई दिए थे। अब वही नेता और पार्षद फिर अपने-अपने पुराने दलों से टिकट की उम्मीद लगाए बैठे हैं। इससे दोनों दलों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि संगठन के पुराने कार्यकर्ताओं, नए दावेदारों और प्रभावशाली नेताओं के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
राजनीतिक गलियारों में एक और चर्चा जोरों पर है कि टिकट का अंतिम निर्णय किसके प्रभाव से होगा। क्या संगठन की राय निर्णायक होगी, या विधानसभा चुनाव लड़ चुके प्रत्याशी, वर्तमान विधायक अथवा अन्य वरिष्ठ नेता टिकट वितरण में प्रभावी भूमिका निभाएंगे? इस असमंजस ने दावेदारों की बेचैनी और बढ़ा दी है।

स्थानीय राजनीति के जानकार मानते हैं कि नगरपरिषद चुनाव में दल से अधिक व्यक्ति का प्रभाव दिखाई देता है। वार्ड स्तर पर मतदाता अक्सर उस उम्मीदवार को प्राथमिकता देते हैं, जो व्यक्तिगत रूप से उपलब्ध रहता है और स्थानीय समस्याओं के समाधान में सक्रिय भूमिका निभाता है। यही कारण है कि अनेक निवर्तमान पार्षद अपने निजी वोट बैंक के भरोसे दोबारा मैदान में उतरने की तैयारी कर रहे हैं, चाहे उन्हें किसी भी दल का टिकट मिले या न मिले।
ऐसे में कांग्रेस और भाजपा दोनों के लिए टिकट वितरण आसान नहीं होगा। नेतृत्व को लेकर आंतरिक ध्रुवीकरण, गुटबाजी और स्थानीय समीकरण उम्मीदवार चयन को प्रभावित कर सकते हैं। यही स्थिति पंचायत चुनाव में भी देखने को मिल सकती है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 15 अगस्त तक पंचायतवार आरक्षण की लॉटरी घोषित होने के बाद चुनावी तस्वीर और स्पष्ट होगी। आरक्षण के साथ कई वार्डों और पंचायतों का सामाजिक तथा राजनीतिक समीकरण बदलेगा और उसी के अनुरूप दलों की रणनीति भी नए सिरे से तय होगी।
स्पष्ट है कि इस बार हनुमानगढ़ के निकाय और पंचायतीराज चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन की लड़ाई नहीं होंगे, बल्कि बदले हुए राजनीतिक गठजोड़, व्यक्तिगत जनाधार और संगठनात्मक शक्ति की भी वास्तविक परीक्षा साबित होंगे। यही वजह है कि चुनावी मुकाबला पहले की तुलना में कहीं अधिक रोचक और अप्रत्याशित दिखाई दे रहा है।





