



डॉ. अर्चना गोदारा
हर युग की अपनी एक पहचान होती है। कभी लोगों को सफलता तक पहुँचने के लिए वर्षों का संघर्ष करना पड़ता था और धैर्य जीवन का स्वाभाविक गुण माना जाता था। आज समय बहुत अधिक बदल चुका है। मोबाइल की स्क्रीन पर एक स्पर्श से बहुत सी जानकारी सरलता से मिल जाती है, भोजन कुछ ही मिनटों में घर पहुँच जाता है और मनोरंजन भी पलभर में उपलब्ध हो जाता है। सुविधा का यह युग निस्संदेह जीवन को सरल बना रहा है, लेकिन इसके साथ एक नई प्रवृत्ति भी जन्म ले रही है। हर उपलब्धि तुरंत प्राप्त करने की इच्छा। यही प्रवृत्ति आज के युवाओं में धैर्य के संकट का प्रमुख कारण बनती दिखाई दे रही है।
भारत आज विश्व के सबसे युवा देशों में गिना जाता है। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (यूएनएफपीए) के अनुसार देश की लगभग 65 प्रतिशत आबादी 35 वर्ष से कम आयु की है। इतनी बड़ी युवा शक्ति किसी भी राष्ट्र के लिए विकास का आधार होती है। किंतु जब यही वर्ग शीघ्र सफलता की अपेक्षा करने लगे और निरंतर प्रयास की अपेक्षा त्वरित परिणाम को अधिक महत्व देने लगे, तब यह केवल व्यक्तिगत नहीं बल्कि सामाजिक चिंता का विषय बन जाता है। आज का युवा पहले से अधिक प्रतिभाशाली, तकनीकी रूप से सक्षम और अवसरों से भरपूर है। दूसरी ओर वह पहले की तुलना में अधिक बेचैन भी दिखाई देता है। प्रतियोगी परीक्षाओं से लेकर रोजगार, व्यवसाय और सामाजिक प्रतिष्ठा तक हर क्षेत्र में वह कम समय में बड़ी उपलब्धि चाहता है। यदि अपेक्षित परिणाम तुरंत नहीं मिलते, तो निराशा और हताशा उसे घेरने लगती है। कई बार यह निराशा आत्मविश्वास को भी प्रभावित करती है। इस बदलती मानसिकता के पीछे अनेक कारण हैं। मोबाइल और सोशल मीडिया ने सफलता का ऐसा चित्र प्रस्तुत किया है, जिसमें उपलब्धियाँ तो दिखाई देती हैं, लेकिन उनके पीछे का वर्षों का संघर्ष नहीं दिखता। कोई युवा उद्यमी करोड़ों का कारोबार खड़ा कर लेता है, किसी कलाकार का एक वीडियो लाखों लोगों तक पहुँच जाता है, तो किसी खिलाड़ी की उपलब्धि कुछ ही क्षणों में देशभर में चर्चा का विषय बन जाती है। इन्हें देखकर अनेक युवा यह मान बैठते हैं कि सफलता का स्वाभाविक रास्ता भी इतना ही छोटा है, जबकि वास्तविकता इससे बिल्कुल भिन्न होती है।

पूर्व में किए गए अनेक शोधों में यह पाया गया है कि जो व्यक्ति धैर्यपूर्वक लक्ष्य की ओर बढ़ता है और असफलताओं से सीखने का साहस रखता है, उसके जीवन में स्थायी सफलता प्राप्त करने की संभावना अधिक होती है। विशेषज्ञों का मानना है कि आत्मसंयम और प्रतीक्षा की क्षमता व्यक्ति के व्यक्तित्व को मजबूत बनाती है। इसके विपरीत जल्दबाज़ी में लिए गए निर्णय कई बार जीवन की दिशा बदल देते हैं। भारतीय समाज में इसका प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। हर वर्ष लाखों विद्यार्थी प्रतियोगी परीक्षाओं में सम्मिलित होते हैं। अधिकांश परीक्षाओं में सफलता का प्रतिशत बहुत कम होता है, फिर भी अनेक विद्यार्थी लगातार प्रयास करके अपने लक्ष्य तक पहुँचते हैं। वहीं कुछ युवा पहली या दूसरी असफलता के बाद स्वयं को अयोग्य समझने लगते हैं। उपलब्ध सरकारी आँकड़े भी बताते हैं कि परीक्षा और करियर से जुड़ा मानसिक दबाव युवाओं के सामने एक गंभीर चुनौती बन चुका है। यह स्थिति केवल शिक्षा व्यवस्था का प्रश्न नहीं, बल्कि समाज की बदलती सोच का भी परिणाम है।

सामाजिक दृष्टि से देखें तो आज तुलना की प्रवृत्ति पहले की अपेक्षा कहीं अधिक बढ़ गई है। पहले व्यक्ति अपने परिवार और आसपास के लोगों से तुलना करता था, जबकि अब वह पूरे देश और दुनिया के लोगों से अपनी तुलना करने लगा है। किसी की नौकरी, किसी की आय, किसी की लोकप्रियता और किसी की जीवनशैली हर समय मोबाइल की स्क्रीन पर दिखाई देती रहती है। लगातार तुलना करने से संतोष की भावना कमजोर पड़ती है और अधीरता बढ़ने लगती है।आर्थिक दृष्टि से भी यह प्रवृत्ति चिंताजनक है। जल्दी अधिक धन कमाने की चाह में कई युवा बिना पूरी जानकारी के जोखिम भरे निवेश, ऑनलाइन ठगी और अवास्तविक कमाई के वादों का शिकार हो जाते हैं। आसान सफलता का आकर्षण कई बार कठिन परिश्रम की महत्ता को कम कर देता है। जबकि अनुभव बताता है कि स्थायी आर्थिक प्रगति हमेशा कौशल, अनुशासन और निरंतर प्रयास से ही प्राप्त होती है। भारतीय संस्कृति ने सदैव धैर्य, संयम और कर्मशीलता को जीवन का आधार माना है। हमारे लोकजीवन में भी कहा जाता है कि ष्धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय।ष् यह केवल एक कहावत नहीं, बल्कि जीवन का गहरा अनुभव है। बीज बोने के बाद किसान भी फसल के लिए समय का इंतजार करता है। यदि वह अधीर होकर अगले ही दिन परिणाम चाहे, तो उसे निराशा ही मिलेगी। जीवन के अधिकांश बड़े लक्ष्य भी इसी नियम का पालन करते हैं।

आज के इस दौर में आवश्यकता इस बात की है कि परिवार बच्चों की तुलना दूसरों से करने के बजाय उनके प्रयासों की सराहना करें। विद्यालय और महाविद्यालय केवल परीक्षा में अंक प्राप्त करने तक सीमित न रहें, बल्कि धैर्य, आत्मविश्वास और असफलता से सीखने की क्षमता का भी विकास करें। समाज और मीडिया को भी ऐसे व्यक्तित्वों को सामने लाना चाहिए जिन्होंने वर्षों के संघर्ष के बाद सफलता प्राप्त की है, क्योंकि वही कहानियाँ युवाओं को वास्तविक प्रेरणा देती हैं। सफलता का कोई छोटा रास्ता नहीं होता। त्वरित उपलब्धियाँ क्षणिक आकर्षण पैदा कर सकती हैं, लेकिन स्थायी सम्मान उसी को मिलता है जो कठिनाइयों के बीच भी अपने लक्ष्य पर विश्वास बनाए रखता है। यदि भारतीय युवा आधुनिक तकनीक की गति को धैर्य, अनुशासन और निरंतर परिश्रम के साथ जोड़ दें, तो वे केवल अपना भविष्य ही नहीं, बल्कि देश के विकास की दिशा भी अधिक मजबूत बना सकते हैं। वास्तव में धैर्य समय की बर्बादी नहीं, बल्कि सफलता तक पहुँचने का सबसे विश्वसनीय मार्ग है।
‘चुटकियों में जो मिल जाए, वह अक्सर पल भर का मान होता है,
धैर्य और परिश्रम से सँवरा हर सपना ही सच्ची पहचान होता है।
समय भले लगे मंज़िल तक, पर वही सफलता सबसे महान होती है।’






