



भटनेर पोस्ट डेस्क
सामाजिक कार्यकर्ता एवं सशक्त नारी संस्थान हनुमानगढ़ की संस्थापक मिताली अग्रवाल को टांटिया विश्वविद्यालय, श्रीगंगानगर द्वारा डॉक्टर ऑफ फिलॉसफी (पीएचडी) की उपाधि प्रदान की गई है। उन्होंने ‘एलजीबीटी समुदाय के व्यक्तियों के अधिकारों और गरिमा का विधिक परिप्रेक्ष्य में व्यापक विश्लेषण’ विषय पर अपना शोध कार्य सफलतापूर्वक पूर्ण किया। यह शोध न केवल अकादमिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है, बल्कि सामाजिक सरोकारों से जुड़ा एक सशक्त दस्तावेज भी है।
अपने शोध में डॉ. मिताली अग्रवाल ने एलजीबीटी समुदाय से जुड़े मानवाधिकारों, संवैधानिक संरक्षण, न्यायालयों के निर्णयों, विधायी प्रावधानों तथा समाज में उनकी स्वीकार्यता जैसे पहलुओं का विस्तृत और तथ्यात्मक अध्ययन किया है। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि कानून और समाज के बीच की दूरी को पाटे बिना समानता और गरिमा का सपना अधूरा रहेगा। शोध में भारतीय संविधान की मूल भावना, न्यायपालिका की भूमिका और बदलते सामाजिक दृष्टिकोण को उदाहरणों सहित प्रस्तुत किया गया है।
पीएचडी की उपाधि प्राप्त होने पर मिताली अग्रवाल के परिवारजनों, शिक्षाविदों, सामाजिक संगठनों एवं शुभचिंतकों में हर्ष का माहौल है। सभी ने उन्हें इस महत्वपूर्ण उपलब्धि के लिए बधाई एवं शुभकामनाएं दी हैं। हनुमानगढ़ सहित आसपास के क्षेत्रों में सामाजिक क्षेत्र से जुड़े लोगों ने इसे पूरे जिले के लिए गौरव का विषय बताया है। कार्यक्रम के दौरान शिक्षाविदों ने कहा कि इस तरह का शोध समाज में जागरूकता बढ़ाने और नीति-निर्माण को दिशा देने में सहायक सिद्ध होगा।

डॉ. मिताली अग्रवाल ने अपनी इस उपलब्धि का श्रेय अपने गुरुजनों, परिवार और सहयोगियों को दिया। उन्होंने कहा कि बिना उनके मार्गदर्शन और सहयोग के यह शोध संभव नहीं हो पाता। उन्होंने विनम्रता के साथ यह भी कहा कि पीएचडी की उपाधि केवल एक डिग्री नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी का बोध कराती है। ‘ज्ञान का वास्तविक उद्देश्य यही है कि वह समाज और देश को सही दिशा देने में उपयोगी बने।’

काबिलेगौर है कि मिताली अग्रवाल लॉ ग्रेजुएट भी हैं और लंबे समय से सामाजिक कार्यों में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। सशक्त नारी संस्थान के माध्यम से वे महिला सशक्तिकरण, कानूनी जागरूकता और सामाजिक समानता के लिए निरंतर प्रयासरत हैं। उनका मानना है कि जब तक शिक्षा को समाज सेवा से नहीं जोड़ा जाएगा, तब तक उसका वास्तविक लाभ आमजन तक नहीं पहुंचेगा। उन्होंने यह भी कहा कि एलजीबीटी समुदाय के अधिकारों को लेकर अभी समाज में बहुत काम किया जाना बाकी है। कानून के साथ-साथ सामाजिक सोच में बदलाव जरूरी है। उनका यह शोध आने वाले समय में शोधार्थियों, विधि विशेषज्ञों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए एक महत्वपूर्ण संदर्भ ग्रंथ साबित हो सकता है।









