




डॉ. भरत ओला
समाज की स्मृति में महापुरुष केवल इतिहास के पात्र नहीं होते, वे वर्तमान की दिशा और भविष्य की संभावनाओं के मार्गदर्शक होते हैं परंतु यह विडंबना ही है कि जिन महापुरुषों ने पूरी मानवता को एक सूत्र में बांधने, समानता का संदेश देने और अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने का कार्य किया, आज हम उन्हें जाति, वर्ग और सीमित दायरों में बांटने लगे हैं।
11 अप्रैल को महात्मा ज्योतिबा फुले की जयंती मनाई गई और आज 14 अप्रैल को डॉ. भीमराव अंबेडकर की जयंती का आयोजन हो रहा है। यह दोनों ही व्यक्तित्व भारतीय समाज के ऐसे स्तंभ हैं, जिन्होंने सामाजिक विषमताओं, जातिगत भेदभाव और अज्ञानता के विरुद्ध अपने जीवन को समर्पित कर दिया लेकिन आज जो दृश्य उभरकर सामने आता है, वह कहीं न कहीं चिंताजनक है। फुले जयंती सैनी समाज तक सीमित हो जाती है और अंबेडकर जयंती दलित समाज तक।
यह प्रश्न स्वाभाविक है क्या इन महापुरुषों का जीवन केवल किसी एक समाज या जाति के लिए था? क्या उनकी संघर्षगाथा और उनके विचार केवल सीमित समूहों की धरोहर हैं? यदि हम ईमानदारी से इस प्रश्न का उत्तर खोजें, तो पाएंगे कि ऐसा बिल्कुल नहीं है।
महात्मा ज्योतिबा फुले ने स्त्री शिक्षा, शूद्र ,अतिशूद्रों के उत्थान और धार्मिक पाखंडों के विरुद्ध जो आंदोलन चलाया, वह संपूर्ण समाज के लिए था। इसी प्रकार डॉ. भीमराव अंबेडकर ने संविधान के माध्यम से जो समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व के सिद्धांत स्थापित किए, वे हर भारतीय के अधिकार और कर्तव्य का आधार हैं। उनके विचार किसी एक वर्ग की सीमाओं में नहीं समा सकते।
फिर भी आज स्थिति यह है कि इन महापुरुषों की जयंतियां प्रायः उनके अपने-अपने समाजों तक सीमित होकर रह गई हैं। इसमें केवल आयोजकों की ही कमी नहीं, बल्कि पूरे समाज की निष्क्रियता भी उतनी ही जिम्मेदार है। एक ओर जहां संबंधित समाज के लोग इन आयोजनों को व्यापक बनाने का प्रयास नहीं करते, वहीं दूसरी ओर अन्य समाजों के लोग भी इन कार्यक्रमों से दूरी बनाए रखते हैं। कहना न होगा कि यह दूरी केवल भौतिक नहीं, वैचारिक भी है।
सबसे अधिक पीड़ादायक तथ्य यह है कि इन महापुरुषों के नाम पर आयोजित कार्यक्रमों में शामिल होने वाले अनेक लोग स्वयं उनके मूल विचारों से दूर दिखाई देते हैं। महात्मा ज्योतिबा फुले और डॉ. भीमराव अंबेडकर ने जिस धार्मिक आडंबर, अंधविश्वास और जातिवाद का विरोध किया, वही तत्व आज भी समाज में प्रबल रूप से मौजूद हैं और दुर्भाग्य से उनके अनुयायियों के भीतर भी गहरे तक बैठे हैं ।
यह स्थिति केवल फुले और अंबेडकर तक सीमित नहीं है। महात्मा बुद्ध ,महावीर स्वामी, गुरु नानक, कबीर, रविदास, नामदेव जैसे संतों और अन्य दूसरे महापुरुषों की विरासत भी कई बार संकीर्ण पहचान के दायरों में सिमट जाती है। यह प्रवृत्ति न केवल उनके व्यक्तित्व का अपमान है, बल्कि समाज के विकास में भी बाधक है।
हमें यह समझना होगा कि महापुरुष किसी एक जाति, धर्म या वर्ग की बपौती नहीं होते। वे मानवता की साझा धरोहर होते हैं। उन्हें किसी एक दायरे में बांधना, उनके कद को छोटा करना है। यह एक प्रकार का वैचारिक अन्याय है, जो हम अनजाने में ही कर बैठते हैं।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम इन महापुरुषों की जयंतियों को केवल रस्म अदायगी का माध्यम न बनने दें। उनके चित्रों पर माल्यार्पण करना, भाषण देना और औपचारिक कार्यक्रम आयोजित करना पर्याप्त नहीं है। वास्तविक श्रद्धांजलि तभी होगी, जब हम उनके विचारों को अपने जीवन में उतारेंगे।
हमें अपने भीतर झांककर यह प्रश्न करना होगा कि क्या हम वास्तव में समानता, शिक्षा, वैज्ञानिक सोच और सामाजिक न्याय के उन मूल्यों को जी रहे हैं, जिनके लिए इन महापुरुषों ने संघर्ष किया? यदि उत्तर ‘नहीं’ है, तो हमारी सारी श्रद्धा केवल दिखावा है।
समाज को एक नई दिशा देने के लिए जरूरी है कि इन महापुरुषों की जयंतियां सर्वसमाज की सहभागिता से मनाई जाएं। स्कूलों, कॉलेजों, सामाजिक संस्थाओं और आम नागरिकों को मिलकर इन आयोजनों को एक जनांदोलन का रूप देना होगा। जब हर वर्ग, हर जाति और हर समुदाय इन महापुरुषों को अपना मानने लगेगा, तभी उनकी विचारधारा सही मायनों में जीवित रह पाएगी।
हमें इस बात को समझाना पड़ेगा कि यह केवल आयोजन का नहीं, आत्ममंथन का विषय है। महापुरुषों के विचार हमें जोड़ने के लिए हैं, तोड़ने के लिए नहीं। यदि हम उन्हें समझकर अपने जीवन में उतारें, तो वही भारत निर्मित हो सकता है, जिसका सपना उन्होंने देखा था। एक ऐसा भारत जहां समानता हो, न्याय हो और हर व्यक्ति को सम्मान मिले। अन्यथा जयंतियां मनती रहेंगी, मालाएं चढ़ती रहेंगी, और महापुरुष धीरे-धीरे विचारों में नहीं, केवल तस्वीरों में सिमटकर रह जाएंगे।
-लेखक सुविख्यात साहित्यकार हैं








