



डॉ. संतोष राजपुरोहित
वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में अर्थव्यवस्था का स्वरूप तेज़ी से बदल रहा है। कृषि, उद्योग और सेवाओं जैसे पारंपरिक क्षेत्रों के साथ-साथ अब एक नया और सशक्त क्षेत्र ‘ऑरेंज इकोनॉमी’ अपनी स्पष्ट पहचान बना चुका है। यह अर्थव्यवस्था मानव की रचनात्मकता, कला, संस्कृति, ज्ञान, नवाचार और बौद्धिक संपदा पर आधारित है। केवल आय और रोजगार तक सीमित न रहकर, ऑरेंज इकोनॉमी सांस्कृतिक अभिव्यक्ति और सामाजिक पहचान को भी मजबूती देती है। सरल शब्दों में कहें तो यह ‘विचारों को आय’ में बदलने की आधुनिक प्रक्रिया है, जहाँ हुनर ही पूंजी है और कल्पना ही उद्योग।

ऑरेंज इकोनॉमी के अंतर्गत कला, संगीत, फिल्म, नृत्य, नाटक, साहित्य, फैशन, डिजाइन, विज्ञापन, मीडिया, एनीमेशन, गेमिंग, डिजिटल कंटेंट निर्माण और हस्तशिल्प जैसे अनेक क्षेत्र सम्मिलित होते हैं। इन सभी क्षेत्रों में भौतिक संसाधनों की अपेक्षा सृजनात्मकता और मौलिक विचार अधिक महत्वपूर्ण होते हैं। उदाहरण के लिए, एक गीत, फिल्म या पेंटिंग केवल मनोरंजन का साधन नहीं होते, बल्कि वे समाज के विचारों, भावनाओं और संस्कृति को अभिव्यक्त करते हुए आर्थिक मूल्य भी उत्पन्न करते हैं। इस प्रकार, ऑरेंज इकोनॉमी ‘विचारों को आय’ में बदलने की प्रक्रिया है।
वैश्विक स्तर पर ऑरेंज इकोनॉमी का विस्तार अत्यंत तीव्र गति से हो रहा है। संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के अनुसार, यह क्षेत्र विश्व अर्थव्यवस्था में अरबों डॉलर का योगदान दे रहा है और करोड़ों लोगों को रोजगार प्रदान कर रहा है। विशेष रूप से डिजिटल क्रांति और इंटरनेट के प्रसार ने इस क्षेत्र को नई ऊर्जा प्रदान की है। आज यूट्यूब, इंस्टाग्राम, ओटीटी प्लेटफॉर्म्स और ई-कॉमर्स वेबसाइट्स के माध्यम से कोई भी व्यक्ति अपनी रचनात्मक प्रतिभा को वैश्विक स्तर पर प्रस्तुत कर सकता है। इससे छोटे कलाकारों और नवोदित उद्यमियों को भी अंतरराष्ट्रीय पहचान मिल रही है।

भारत के संदर्भ में ऑरेंज इकोनॉमी की संभावनाएं अत्यंत व्यापक हैं। भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, विविधता, लोककला, संगीत, नृत्य और पारंपरिक हस्तशिल्प इस क्षेत्र की मजबूत नींव हैं। राजस्थान की ब्लू पॉटरी, बनारसी साड़ी, मधुबनी पेंटिंग, कथक और भरतनाट्यम जैसे शास्त्रीय नृत्य, भारतीय संगीत परंपरा और बॉलीवुड फिल्म उद्योग, ये सभी ऑरेंज इकोनॉमी के सशक्त उदाहरण हैं। भारतीय फिल्म उद्योग विश्व में सबसे बड़े फिल्म निर्माण उद्योगों में से एक है, जो न केवल मनोरंजन प्रदान करता है बल्कि रोजगार और विदेशी मुद्रा अर्जन में भी योगदान देता है।
सरकार द्वारा ‘मेक इन इंडिया’, ‘डिजिटल इंडिया’ और ‘स्टार्टअप इंडिया’ जैसी योजनाओं के माध्यम से रचनात्मक उद्योगों को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसके अलावा, ‘एक जिला एक उत्पाद’ जैसी पहलें स्थानीय हस्तशिल्प और परंपरागत कला को प्रोत्साहित कर रही हैं। डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के विस्तार से ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों के कलाकार भी अब अपने उत्पादों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेच पा रहे हैं।

ऑरेंज इकोनॉमी का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि यह युवाओं के लिए नए अवसरों का द्वार खोलती है। आज का युवा पारंपरिक नौकरी के बजाय अपने हुनर और रचनात्मकता के आधार पर स्वयं का व्यवसाय स्थापित कर रहा है। यूट्यूब क्रिएटर, सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर, ग्राफिक डिजाइनर, फोटोग्राफर, ऐप डेवलपर और कंटेंट राइटर जैसे नए पेशे तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं। इससे आत्मनिर्भरता और उद्यमिता की भावना को भी बल मिल रहा है।
हालांकि, इस क्षेत्र के समक्ष कई चुनौतियाँ भी मौजूद हैं। बौद्धिक संपदा अधिकारों का पर्याप्त संरक्षण न होना एक बड़ी समस्या है, जिससे रचनाकारों को उनके कार्य का उचित प्रतिफल नहीं मिल पाता। इसके अतिरिक्त, वित्तीय संसाधनों की कमी, तकनीकी कौशल का अभाव, बाजार तक सीमित पहुंच और असंगठित संरचना भी विकास में बाधा उत्पन्न करती है। कई बार कलाकारों को उचित प्रशिक्षण और मार्गदर्शन नहीं मिल पाता, जिससे उनकी प्रतिभा पूर्ण रूप से विकसित नहीं हो पाती।
इन चुनौतियों के समाधान हेतु सरकार, निजी क्षेत्र और शैक्षणिक संस्थानों को मिलकर प्रयास करने की आवश्यकता है। बौद्धिक संपदा अधिकारों को सशक्त बनाना, रचनात्मक उद्योगों को वित्तीय सहायता देना, कौशल विकास कार्यक्रमों का विस्तार करना तथा डिजिटल अवसंरचना को सुदृढ़ करना अत्यंत आवश्यक है। साथ ही, शिक्षा प्रणाली में भी रचनात्मकता और नवाचार को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, ताकि भावी पीढ़ी इस क्षेत्र में सक्रिय योगदान दे सके।
ऑरेंज इकोनॉमी 21वीं सदी की अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण स्तंभ बनकर उभर रही है। यह न केवल आर्थिक विकास को गति देती है, बल्कि समाज की सांस्कृतिक पहचान को भी संरक्षित और समृद्ध करती है। यदि इसे उचित नीति समर्थन, निवेश और प्रोत्साहन प्राप्त हो, तो भारत विश्व स्तर पर एक प्रमुख रचनात्मक शक्ति के रूप में स्थापित हो सकता है। ऑरेंज इकोनॉमी वास्तव में वह सेतु है, जो परंपरा और आधुनिकता, संस्कृति और तकनीक, तथा सृजनात्मकता और समृद्धि को एक साथ जोड़ता है।
-लेखक भारतीय आर्थिक परिषद के सदस्य हैं






