



भटनेर पोस्ट डेस्क
हनुमानगढ़ जंक्शन में दुर्गा मंदिर स्थित कागद पुस्तकालय विचार, संवेदना और संस्कारों का जीवंत तीर्थ जैसा नजर आया। अवसर था नव संवत्सर स्वागत एवं साहित्यिक गोष्ठी का, जहां शब्दों ने ऋतु बदली और विचारों ने चेतना को आलोकित किया। अखिल भारतीय साहित्य परिषद के तत्वावधान में आयोजित साहित्यिक गोष्ठी की अध्यक्षता भवानी शंकर शर्मा ने की। उनके सान्निध्य में क्षेत्र के अनेक कवियों और साहित्यकारों ने काव्य-पाठ के माध्यम से नव वर्ष का स्वागत किया और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों को स्वर दिए। वातावरण में उल्लास था, संयमित, सधे हुए संस्कारों से भरा।
कवि उदयपाल ने गांव से बिछड़ने के दर्द को अपनी भावना-प्रधान कविता में इस तरह उकेरा कि श्रोताओं की आंखों में स्मृतियों की नमी उतर आई। उनकी पंक्तियों में मिट्टी की गंध थी और जड़ों से कटने की टीस भी। रजनी शर्मा ने सनातन परंपरा के अनुरूप बच्चों को सांस्कृतिक मूल्यों से जोड़ने का आग्रह करते हुए कहा कि संस्कार केवल विरासत नहीं, जिम्मेदारी भी हैं।
एक लघु कविता के माध्यम से मन-संवाद की प्रस्तुति ने मानवीय संबंधों की गहराई को सहजता से खोल दिया। बिना शोर, बिना भारी शब्दों के, सीधे हृदय तक पहुंचने वाली अभिव्यक्ति। आदित्य सिंह राठौड़ ने भारतीय नव वर्ष के महत्व पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए बताया कि यह केवल कैलेंडर का परिवर्तन नहीं, बल्कि प्रकृति और जीवन के नव आरंभ का उत्सव है।
अनिल महर्षि ने वसंत ऋतु के रंगों और नव संवत्सर के आपसी संबंध पर प्रभावशाली चर्चा की। उन्होंने कहा कि जैसे प्रकृति स्वयं को नये रंगों में ढालती है, वैसे ही मनुष्य को भी नव वर्ष में आत्ममंथन और नव संकल्प करने चाहिए।
अंग्रेजी साहित्यकार मोहनलाल ने अपने भावना-प्रधान गीत का सुरीले कंठ से वाचन किया, ‘हे राम मेरे दर्श दे दो, पाषाण मूर्ति रोए, वन की छाया में पड़ी हूं, धूल में लिपटी हुई’, उनका गायन श्रोताओं को भावलोक में ले गया, जहां भक्ति और पीड़ा एक-दूसरे में घुलती दिखाई दीं।
कार्यक्रम में हास्य का रंग भी कम नहीं था। सुरेंद्र शर्मा ‘सत्यम’ ने अपनी हास्य कविताओं ‘लातों की बात भूतों को भा गई’ और ‘बेगम की बेगी’ से श्रोताओं को ठहाके लगाने पर विवश कर दिया। वहीं चैन सिंह शेखावत ने ‘औरत’ कविता के माध्यम से महिलाओं के प्रति संवेदनात्मक भावनाओं को सशक्त शब्द दिए।
सूर्य प्रकाश जोशी ने अंतरराष्ट्रीय गौरैया दिवस के संदर्भ में अपने विचार रखते हुए प्रकृति और पक्षियों के संरक्षण की आवश्यकता पर जोर दिया। कुलविंदर सिंह ने धर्म की वैज्ञानिक व्याख्या प्रस्तुत करते हुए आधारभूत सांस्कृतिक मूल्यों की तार्किक पड़ताल की। लालचंद कोचर ने विक्रम संवत के महत्व पर अपनी नवीन कविता प्रस्तुत की, ‘समय है उत्कर्ष का, स्वागत करें नव वर्ष का।’
अध्यक्षीय उद्बोधन में भवानी शंकर शर्मा ने हिंदू नव वर्ष के अवसर पर सभी को शुभकामनाएं दीं और हमारे पर्वों तथा भारतीय संस्कृति की गहन विवेचना की। उन्होंने कहा कि उत्सव तभी सार्थक हैं जब वे हमें हमारी जड़ों से जोड़ें। कार्यक्रम के अंत में अखिल भारतीय साहित्य परिषद के राष्ट्रीय अधिवेशन (रीवा, मध्य प्रदेश) में पारित प्रस्ताव का अनुमोदन किया गया, जिसमें पूरे भारत में ओटीटी प्लेटफॉर्म की सामग्री के नियमन की मांग की गई है। मंच संचालन वीरेंद्र छापोला ने सधे और प्रभावी ढंग से किया।







