



डॉ. संतोष राजपुरोहित.
आज के वैश्विक और डिजिटल युग में केवल पढ़ना-लिखना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि वित्तीय साक्षरता भी उतनी ही आवश्यक हो गई है। वित्तीय साक्षरता का अर्थ है, धन के प्रबंधन, बचत, निवेश, ऋण, बीमा और वित्तीय निर्णयों की समझ। भारतीय अर्थव्यवस्था के संदर्भ में यह विषय अत्यंत समसामयिक और महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह न केवल व्यक्तिगत समृद्धि बल्कि समग्र आर्थिक विकास से भी सीधे जुड़ा हुआ है।
भारत जैसे विकासशील देश में जहां बड़ी जनसंख्या अभी भी ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है, वहां वित्तीय साक्षरता का अभाव आर्थिक असमानता और गरीबी को बढ़ाता है। कई लोग बैंकिंग सेवाओं, डिजिटल भुगतान प्रणाली, बीमा योजनाओं और निवेश के विकल्पों से अनभिज्ञ रहते हैं। परिणामस्वरूप, वे साहूकारों के चंगुल में फंस जाते हैं या अपनी बचत का उचित उपयोग नहीं कर पाते।
विगत वर्षों में भारत सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक ने वित्तीय साक्षरता को बढ़ावा देने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। प्रधानमंत्री जन धन योजना, डिजिटल इंडिया अभियान, और वित्तीय साक्षरता केंद्र जैसी पहलें इस दिशा में उल्लेखनीय हैं। जन धन योजना के माध्यम से करोड़ों लोगों को बैंकिंग प्रणाली से जोड़ा गया है, जिससे वित्तीय समावेशन को बढ़ावा मिला है। वहीं, डिजिटल भुगतान प्रणाली जैसे यूपीआई,भीम ऐप ने लेन-देन को सरल और पारदर्शी बनाया है।
वर्तमान समय में डिजिटल साक्षरता और वित्तीय साक्षरता एक-दूसरे के पूरक बन चुके हैं। ऑनलाइन बैंकिंग, मोबाइल वॉलेट, और फिनटेक प्लेटफॉर्म्स के बढ़ते उपयोग ने वित्तीय लेन-देन को आसान तो बनाया है, लेकिन इसके साथ साइबर धोखाधड़ी के जोखिम भी बढ़े हैं। इसलिए, लोगों को सुरक्षित डिजिटल व्यवहार, पासवर्ड सुरक्षा और फर्जी कॉल्स से बचाव के बारे में जानकारी देना अत्यंत आवश्यक हो गया है।
वित्तीय साक्षरता का एक महत्वपूर्ण पहलू निवेश के प्रति जागरूकता भी है। आज के समय में केवल बचत पर्याप्त नहीं है, बल्कि सही निवेश के माध्यम से धन को बढ़ाना भी आवश्यक है। म्यूचुअल फंड्स, शेयर बाजार, पेंशन योजनाएं और बीमा उत्पाद जैसे विकल्पों के बारे में सही जानकारी होने से व्यक्ति बेहतर वित्तीय निर्णय ले सकता है। विशेष रूप से युवा वर्ग को निवेश के महत्व और जोखिम प्रबंधन के बारे में शिक्षित करना समय की मांग है।
महिलाओं की वित्तीय साक्षरता भी भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। जब महिलाएं वित्तीय रूप से सशक्त होती हैं, तो वे परिवार और समाज के आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान देती हैं। स्वयं सहायता समूह और माइक्रोफाइनेंस संस्थाएं इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं, लेकिन अभी भी व्यापक स्तर पर जागरूकता की आवश्यकता है।
वित्तीय साक्षरता का संबंध केवल व्यक्तिगत लाभ तक सीमित नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की स्थिरता और विकास से भी जुड़ा हुआ है। जब लोग समझदारी से खर्च, बचत और निवेश करते हैं, तो इससे पूंजी निर्माण बढ़ता है, जो आर्थिक विकास को गति देता है। साथ ही, यह बैंकिंग प्रणाली को मजबूत करता है और अनौपचारिक अर्थव्यवस्था को औपचारिक क्षेत्र में लाने में सहायक होता है।
हालांकि, चुनौतियाँ अभी भी मौजूद हैं। ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में जागरूकता का अभाव, भाषा की समस्या, डिजिटल विभाजन और शिक्षा का निम्न स्तर वित्तीय साक्षरता के प्रसार में बाधा बनते हैं। इसके लिए आवश्यक है कि सरकार, शैक्षणिक संस्थान और निजी क्षेत्र मिलकर समन्वित प्रयास करें। स्कूल और कॉलेज स्तर पर वित्तीय शिक्षा को पाठ्यक्रम में शामिल करना एक प्रभावी कदम हो सकता है।
वित्तीय साक्षरता केवल एक कौशल नहीं, बल्कि एक आवश्यक जीवन-कौशल है, जो व्यक्ति को आत्मनिर्भर बनाता है और देश की अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करता है। यदि भारत को एक मजबूत और समावेशी अर्थव्यवस्था बनाना है, तो वित्तीय साक्षरता का प्रसार प्रत्येक नागरिक तक पहुंचाना अनिवार्य है। यही आत्मनिर्भर भारत की वास्तविक नींव है।
-लेखक भारतीय आर्थिक परिषद के सदस्य है







