


भटनेर पोस्ट ब्यूरो.
अंबाला के बराड़ा-दोसड़का रोड पर करीब दो किलो आरडीएक्स, आईईडी, डेटोनेटर और बैटरी की बरामदगी ने साफ कर दिया है कि यह सीमापार से रची गई एक गहरी आतंकी साजिश थी। इस साजिश की शुरुआती धुरी हनुमानगढ़ था। पुलिस पूछताछ में खुलासा हुआ है कि पाकिस्तान में बैठे आतंकी शहजाद भट्टी के निर्देश पर पहली योजना हनुमानगढ़ में बम विस्फोट करने की थी। आईईडी वहां तक पहुंचा भी दिया गया, लेकिन आरडीएक्स समय पर नहीं पहुंच सका। इसी वजह से चार दिन बाद आईईडी वापस मंगानी पड़ी और प्लान टाल दिया गया।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, जांच एजेंसियों ने माना कि यह महज तकनीकी विफलता नहीं, बल्कि रणनीतिक बदलाव का हिस्सा था। हनुमानगढ़ जैसे सीमावर्ती, अपेक्षाकृत शांत और कम हाई-प्रोफाइल जिले में विस्फोट का मकसद दहशत फैलाना, सुरक्षा एजेंसियों को चौंकाना और यह संदेश देना था कि आतंकी नेटवर्क बड़े शहरों तक ही सीमित नहीं हैं। हनुमानगढ़ पंजाब सीमा से सटा हुआ जिला है, जहां से तस्करी और ड्रोन गतिविधियों के पुराने रूट पहले से मौजूद रहे हैं। ऐसे इलाके में हमला होने से न सिर्फ स्थानीय भय पैदा होता, बल्कि सुरक्षा व्यवस्था पर भी सवाल खड़े होते।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, पूछताछ में यह भी सामने आया कि आरोपियों ने हनुमानगढ़ के अलावा पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और चंडीगढ़ के कई संवेदनशील स्थानों की रेकी की थी। वीडियो बनाकर वाट्सऐप के जरिए पाकिस्तान भेजे गए, ताकि अंतिम टारगेट तय किया जा सके। जब हनुमानगढ़ का प्लान विफल हुआ, तब साजिश का केंद्र अंबाला की ओर शिफ्ट कर दिया गया, जहां धार्मिक स्थल, राजनीतिक व्यक्ति और सैन्य ठिकाना तीन संभावित टारगेट चुने गए।

अंबाला कैंट की ओर जाते वक्त एसटीएफ ने समय रहते तीनों आरोपियों को पकड़ लिया। जिस वक्त वे पकड़े गए, आईईडी पूरी तरह एक्टिव था और प्रेशर रिलीज स्विच से जुड़ा हुआ था। यानी जरा सी चूक भारी तबाही में बदल सकती थी। बम निरोधक दस्ते ने मौके पर पहुंचकर टिफिन में फिट इस बम को निष्क्रिय किया। पुलिस ने चार मोबाइल फोन भी बरामद किए हैं, जिनसे पाकिस्तान में बैठे हैंडलर से संपर्क के सबूत मिले हैं।

इस मामले की गंभीरता को देखते हुए अब राष्ट्रीय जांच एजेंसी की एंट्री लगभग तय मानी जा रही है। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने हरियाणा पुलिस से रिपोर्ट मांगी है और संकेत हैं कि जांच जल्द एनआईए को सौंपी जा सकती है।
अब सवाल यह है कि आगे क्या? हनुमानगढ़ पुलिस के लिए यह एक चेतावनी है कि जिला अब केवल सीमांत प्रशासनिक इकाई नहीं, बल्कि आतंकी नेटवर्क की नजर में संभावित सॉफ्ट टारगेट बन चुका है। सीमावर्ती इलाकों में ड्रोन मूवमेंट, संदिग्ध किराएदारों, बाहरी गतिविधियों और सोशल मीडिया संपर्कों पर सख्त निगरानी जरूरी है। स्थानीय स्तर पर खुफिया तंत्र को मजबूत करना और पड़ोसी जिलों व पंजाब पुलिस के साथ तालमेल बढ़ाना समय की मांग है।

आमजन की भूमिका भी कम अहम नहीं है। अनजान लोगों की संदिग्ध गतिविधियां, अचानक आए बाहरी चेहरे, या असामान्य मूवमेंट को नजरअंदाज करने के बजाय तुरंत पुलिस को सूचना देना जरूरी है। यह मामला बताता है कि दहशत की साजिशें अक्सर शोर नहीं करतीं, चुपचाप जमीन तलाशती हैं। हनुमानगढ़ इस बार बच गया, लेकिन सतर्कता ही वह दीवार है, जो अगली बार किसी भी साजिश को शुरुआत में ही ढहा सकती है।





