


गोपाल झा
बचपन में हमें जो पहली नैतिक सीख दी जाती है, वह यही होती है, झूठ बोलना पाप है। यह वाक्य किताबों, बड़ों की डांट और संस्कारों के साथ हमारी स्मृति में बैठा दिया जाता है। लेकिन जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, जीवन की गलियों में उतरते हैं, यह वाक्य दीवार पर टंगे किसी पुराने कैलेंडर की तरह फीका पड़ने लगता है। सच का आदर्श वहीं टंगा रहता है, पर व्यवहार की ज़मीन पर झूठ के पौधे खूब लहलहाने लगते हैं। सवाल यह नहीं कि झूठ गलत है या नहीं; सवाल यह है कि क्या हम सचमुच सौ फ़ीसद सच बोल पाते हैं?
आज के समाज में झूठ बोलने वाले किसी कोने में छिपे नहीं हैं। वे हमारे आसपास, हमारे बीच, कभी-कभी हमारे भीतर भी मौजूद हैं। झूठ अब चोरी-छिपे नहीं बोला जाता; वह बेधड़क, बेशर्मी से, पूरे आत्मविश्वास के साथ बोला जाता है। ऐसे लोगों के लिए आजकल एक नया शब्द चल पड़ा है, ‘फेकू’। यह शब्द अपने आप में बहुत कुछ कह देता है, बिना झिझक, बिना डर, हवा में तीर चलाने वाला इंसान।

दरअसल, झूठ बोलना कई बार एक आदत नहीं, एक ‘रोग’ बन जाता है। जैसे किसी को सिगरेट की लत लग जाए, वैसे ही किसी को झूठ की। फर्क बस इतना है कि सिगरेट का धुआं दिख जाता है, झूठ का धुआं अक्सर देर से नजर आता है। कुछ लोग झूठ इसलिए बोलते हैं ताकि उनका कद बड़ा लगे, उनका असर बढ़े। कोई कहेगा कि वह बड़े नेता का खास है, कोई किसी बड़े अफसर का। सामने वाला चाहे उसे पहचानता तक न हो, मगर कहानी ऐसे सुनाई जाएगी जैसे दोनों एक ही थाली में खाना खाते हों। यह झूठ नहीं, एक पूरी पटकथा होती है, संवादों, घटनाओं और गवाहों के साथ।

कुछ लोग झूठ को और महीन तरीके से परोसते हैं। वे अपने परिवार, अपने खानदान, अपनी हैसियत को लेकर इतनी बड़ी-बड़ी बातें करते हैं कि सुनने वाला पहली बार में तो दंग रह जाए। ‘मेरे घर में ये है, वो है,’, ‘हमारे रिश्ते वहां तक हैं,’ ऐसी बातें सुनकर शुरू में यकीन भी हो जाता है। लेकिन वक्त बड़ा बेदर्द जासूस है। वह धीरे-धीरे परतें खोल देता है। पोल खुलती है, पर अफसोस यह कि झूठ बोलने वाले को कोई शर्म नहीं आती। उसे यह एहसास ही नहीं होता कि सामने वाले की नजरों में उसकी कीमत अब कौड़ी भर भी नहीं रही।

कुछ झूठ तो और भी दिलचस्प होते हैं। जिनके पास अपना कोई अनुभव नहीं होता, वे दूसरों के किस्से उठाकर अपनी झोली में डाल लेते हैं। किसी का संस्मरण, किसी की बहादुरी, किसी की उपलब्धि, सब कुछ ऐसे सुनाया जाएगा जैसे खुद उसी मैदान के सूरमा रहे हों। दो-चार मुलाकातों में सामने वाला समझ जाता है कि यह बहादुरी उधार की है। मगर झूठा इंसान अपनी रफ्तार नहीं रोकता; वह एक झूठ को ढकने के लिए दूसरा झूठ गढ़ता चला जाता है।

झूठ की जड़ में अक्सर अतिमहत्त्वाकांक्षा होती है। जल्दी आगे बढ़ने की हसरत, बिना मेहनत के पहचान पाने की चाह। ऐसे लोग खुद कुछ बनने की जगह, किसी बड़े नाम के सहारे खुद को बड़ा दिखाना चाहते हैं। योग्यता की जगह जोड़-तोड़, परिश्रम की जगह शॉर्टकट। उन्हें लगता है कि दुनिया को बहलाया जा सकता है, लोगों की आंखों पर पट्टी बांधी जा सकती है। कुछ वक्त तक शायद ऐसा हो भी जाए, मगर सच की खासियत यही है कि वह देर से सही, मगर बेनकाब जरूर होता है।
झूठ बोलने वाले लोग एक तरह के भ्रम में जीते हैं। वे खुद भी भ्रमित रहते हैं और दूसरों को भी भ्रम में रखने की कोशिश करते हैं। दिलचस्प बात यह है कि हम जिस दुनिया में रहते हैं, उसे भी अक्सर ‘भ्रम’ कहा गया है, जो दिखता है, वह होता नहीं; जो होता है, वह दिखता नहीं। मगर इस दार्शनिक सच का यह मतलब कतई नहीं कि हम जान-बूझकर झूठ को गले लगा लें। सच का रास्ता मुश्किल जरूर है, मगर वही टिकाऊ है। झूठ का रास्ता चिकना लगता है, पर आखिर में फिसलन ही देता है।
आज समस्या यह है कि सच जानने की जिज्ञासा कम होती जा रही है। लोग सवाल पूछने से कतराते हैं, गहराई में जाने से डरते हैं। इसलिए झूठ फल-फूल रहा है। अगर सच जानने की ललक जाग जाए, तो झूठ खुद-ब-खुद बेपर्दा होने लगे। झूठ को ताकत हमारी चुप्पी से मिलती है।
इसलिए जब अगली बार किसी से मिलें, उसकी बातों पर सिर्फ वाह-वाह न करें। थोड़ा ठहरें, थोड़ा परखें। देखें कि सामने वाला बात कर रहा है या सिर्फ ‘फेंक’ रहा है। क्योंकि सच भले ही सादा हो, मगर उसकी चमक देर तक रहती है; और झूठ चाहे जितना रंगीन क्यों न हो, आखिरकार फीका पड़ ही जाता है।





