



त्रिभुवन.
क्या हम एक सौ साल पुराने उस ऐतिहासिक मोड़ से भी बदतर हालात पर आ खड़े हुए हैं, जहाँ भारत के महत्वपूर्ण निर्णय साम्राज्य की सत्ता तय करती थी? कभी यह काम सात हज़ार किमी दूर लंदन में बैठी ब्रिटेन की महारानी और उसके साम्राज्यवादी प्रशासक किया करते थे। वे तय करते थे कि भारत क्या उगाएगा, क्या खरीदेगा और किससे व्यापार करेगा। आज जब अमेरिकी ट्रेज़री सचिव स्कॉट बेसेंट यह कहता है कि भारत को 30 दिनों के लिए रूसी तेल खरीदने की ‘छूट’ दी जा रही है तो स्वाभाविक रूप से वही औपनिवेशिक स्मृति जीवित हो उठती है। सवाल है कि क्या भारत की संप्रभुता अब भी उतनी ही मज़बूत है जितनी हम समझते हैं या वैश्विक शक्ति राजनीति के नए रूपों में वही पुराना अहंकार लौट आया है? आख़िर बारह हज़ार किलोमीटर दूर बैठा कोई बददिमाग़ भारत का फ़ैसला क्यों करेगा?

अंतरराष्ट्रीय राजनीति में शब्द कभी-कभी गोलियों से भी तीखे होते हैं। अमेरिकी ट्रेज़री सचिव के इस बयान ने कि भारत को सीमित समय के लिए रूसी तेल खरीदने की अनुमति दी जा रही है, हमारी संप्रभुता और वैश्विक प्रतिष्ठा पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। सवाल सीधा है, क्या भारत अब इतना निर्भर और कमजोर हो गया है कि उसे अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए भी किसी अन्य देश से ‘अनुमति’ लेनी पड़े?

भारत आज दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। इसका अर्थ है कि ऊर्जा सुरक्षा हमारे आर्थिक अस्तित्व का मूल आधार है। ऐसी स्थिति में यदि कोई विदेशी शक्ति यह कहती है कि वह भारत को एक निश्चित अवधि के लिए किसी तीसरे देश से तेल खरीदने की अनुमति दे रही है तो यह केवल एक कूटनीतिक बयान नहीं; वैश्विक शक्ति-संतुलन की मानसिकता का प्रदर्शन है और वह मानसिकता यह मानकर चलती है कि भारत की ऊर्जा नीति पर उसका नैतिक या राजनीतिक अधिकार है।

असल समस्या यह नहीं कि अमेरिका अपने प्रतिबंधों की नीति चला रहा है। हर महाशक्ति अपने हितों के अनुसार वैश्विक नियमों को मोड़ती रही है। समस्या यह है कि उस बयान में भारत को एक स्वतंत्र राष्ट्र नहीं; एक ‘अनुमति प्राप्त उपभोक्ता’ की तरह प्रस्तुत किया गया है। यह भाषा ही बताती है कि पश्चिमी सत्ता-तंत्र अब भी एशियाई देशों को बराबरी के साझेदार के रूप में नहीं, अपने रणनीतिक ढांचे के हिस्से के रूप में देखता है। यह बहुत ही शर्मनाक स्थिति है और देश के कथित राष्ट्रवादियों और उनके समर्थकों और भक्तों को एक बार अपनी आत्मा से संवाद करना चाहिए, अगर वह कहीं बची हुई है तो!

भारत की विदेश नीति का मूल सिद्धांत लंबे समय से रणनीतिक स्वायत्तता रहा है। शीत युद्ध के समय भारत ने गुटनिरपेक्षता के माध्यम से यही संदेश दिया था कि वह किसी भी महाशक्ति के आदेश पर नहीं चलेगा। लेकिन आज के बयान से यह आभास दिया जा रहा है कि वैश्विक ऊर्जा व्यापार भी अब वाशिंगटन की अनुमति से संचालित होगा।

यह भी समझना जरूरी है कि रूस से तेल खरीदना भारत की मजबूरी नहीं, आर्थिक विवेक है। पिछले कुछ वर्षों में रियायती रूसी तेल ने भारत की रिफाइनरी और घरेलू अर्थव्यवस्था को स्थिर रखने में बड़ी भूमिका निभाई है। यदि भारत केवल राजनीतिक दबाव में अपने ऊर्जा स्रोत बदलता है तो उसका सीधा असर भारतीय जनता की जेब पर पड़ेगा; महंगाई, परिवहन लागत और औद्योगिक उत्पादन पर।

अमेरिका यह भी कह रहा है कि भारत भविष्य में अमेरिकी तेल खरीद बढ़ाएगा। यह बयान वैश्विक ऊर्जा बाजार की वास्तविकता को भी उजागर करता है। ऊर्जा राजनीति अक्सर व्यापार और दबाव का मिश्रण होती है। एक तरफ प्रतिबंध, दूसरी तरफ बाजार का प्रस्ताव। यह वही नीति है जिसमें नैतिकता से अधिक आर्थिक हित काम करते हैं। भारत के लिए इस समय सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या वह अपनी ऊर्जा नीति को पूरी तरह राष्ट्रीय हितों के आधार पर तय करेगा, या फिर वैश्विक शक्ति राजनीति के दबावों में संतुलन बनाता रहेगा।
सच्चाई यह है कि भारत कोई छोटा देश नहीं है जिसे अनुमति की जरूरत हो। यह दुनिया की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक अर्थव्यवस्थाओं में से एक है, जिसकी जनसंख्या, बाजार और रणनीतिक स्थिति उसे वैश्विक शक्ति संतुलन का निर्णायक खिलाड़ी बनाती है।
और अंत में एक कड़वी लेकिन जरूरी बात भी कहनी होगी। राष्ट्रभक्ति केवल नारों से सिद्ध नहीं होती। जोर-जोर से ‘वंदे मातरमम्’ बोलने या उसका प्रदर्शन करने से कोई अपने आप राष्ट्रवादी नहीं हो जाता। राष्ट्रभक्ति के लिए वैसा आत्मसम्मान, वैसी स्वतंत्र सोच और वैसा साहस चाहिए जो किसी भी वैश्विक शक्ति के सामने राष्ट्रीय हितों की रक्षा कर सके। देशभक्ति का असली अर्थ यही है कि भारत के फैसले भारत में हों, भारत के हितों, उसके संवैधानिक स्वातंत्र्य और भारत के हितों के अनुसार हों!
–लेखक वरिष्ठ पत्रकार, राजनीतिक विश्लेषक और चिंतक हैं, इन्हें सोशल मीडिया के ‘एक्स’ और फेसबुक आदि पर फॉलो कर सकते हैं





