



गोपाल झा
राजनीति में ‘बदलाव’ शब्द जितना मासूम दिखता है, उतना ही पेचीदा होता है। और जब इस बदलाव की धुरी में नीतीश कुमार हों, तो सियासी बेचैनी लाज़िमी है। देश भर में होली के रंग उड़ रहे थे, लेकिन पटना के पावर कॉरिडोर में रंगों से ज्यादा चर्चाओं की गूंज थी। 4 मार्च को जेडीयू के आला नेता लंबी मीटिंग में मशगूल थे और तभी एक खबर ने सियासी गलियारों में सनसनी फैला दी। कहा गया कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह 5 मार्च को पटना आने वाले हैं और साथ ही नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री पद से ‘मुक्त’ कर सांसद बनाने का फैसला हो चुका है।

खबर फैली तो सवालों की बौछार शुरू हो गई। सबसे बड़ा सवाल यही, क्या नीतीश कुमार इस फैसले को स्वीकार करेंगे? अब तक न तो जेडीयू की तरफ से और न ही बीजेपी की ओर से कोई अधिकृत बयान सामने आया है। मगर राजनीति में खामोशी भी अक्सर बहुत कुछ कह जाती है। चर्चा यह भी है कि नीतीश कुमार राज्यसभा जाने को राज़ी हो गए हैं। कहा जा रहा है कि वे अपने इकलौते बेटे के सियासी मुस्तक़बिल को महफूज़ करने के बदले बीजेपी के इस प्रस्ताव पर हामी भर सकते हैं।

यहीं से चर्चा ने रफ्तार पकड़ ली। सवाल उछला, क्या नीतीश कुमार के बेटे को डिप्टी सीएम बनाकर बीजेपी बिहार में अपना मुख्यमंत्री बैठाने की तैयारी कर चुकी है? अगर ऐसा है तो फिर बीजेपी का सीएम कैंडिडेट कौन होगा? यह सवाल जितना दिलचस्प है, उतना ही रहस्यमय भी। फिलहाल इन तमाम अटकलों के पीछे कोई ठोस सबूत नहीं है। ज़मीन पर हकीकत यह है कि सब कुछ अभी कयासों के धुएं में लिपटा हुआ है।

एक सादा सच यह भी है कि न तो जनता दल (यूनाइटेड) की यह ख्वाहिश है कि नीतीश कुमार सीएम पद छोड़ें और न ही बिहार की ब्यूरोक्रेसी इसके हक़ में दिखाई देती है। प्रशासनिक हलकों में आज भी नीतीश कुमार को ‘सिस्टम का संतुलन’ माना जाता है। ऐसे में सवाल उठता है, खुद नीतीश कुमार क्यों चाहेंगे कि वे कुर्सी छोड़कर दिल्ली की राजनीति में जाएं? जवाब सीधा नहीं है। सियासत में कभी-कभी तर्क नहीं, जज़्बात काम करते हैं। और अगर पुत्रमोह इस फैसले का आधार बनता है, तो फिर राजनीति भी इंसानी कमज़ोरियों से अछूती नहीं रहती।

बीजेपी की राजनीति को समझने वाले एक और पहलू की तरफ इशारा करते हैं। साल 2014 के बाद से भारतीय जनता पार्टी ‘सरप्राइज पॉलिटिक्स’ की उस्ताद रही है। जिस नाम की चर्चा मीडिया में जितनी ज़्यादा होती है, वह उस पद से उतना ही दूर चला जाता है। पिछले बारह साल का रिकॉर्ड यही बताता है। अचानक चेहरा बदलना, आखिरी वक्त पर चौंकाने वाला फैसला लेना, यह बीजेपी की सियासी रणनीति का हिस्सा रहा है।

ऐसे में यह सवाल और पेचीदा हो जाता है कि अगर नीतीश कुमार सच में सीएम पद छोड़ते हैं, तो बिहार की कमान किसे सौंपी जाएगी? क्या कोई ऐसा चेहरा तैयार है, जो बिहार की जटिल सियासत को संभाल सके? या फिर यह सारी चर्चा सिर्फ माहौल बनाने की कवायद है, ताकि असली चाल पर्दे के पीछे चलती रहे?

फिलहाल पटना की फिज़ा में सस्पेंस कायम है। अफवाहें उड़ रही हैं, चर्चाएं गरम हैं और हर चाय की दुकान से लेकर सचिवालय तक एक ही सवाल तैर रहा है, क्या नीतीश कुमार वाकई बदलाव के लिए तैयार हैं, या यह भी सियासत की उन कहानियों में शामिल हो जाएगा, जो खूब शोर मचाकर खामोशी में दफन हो जाती हैं? जवाब शायद आज मिल जाए, या फिर राजनीति की तरह यह सवाल भी कुछ वक्त तक अधूरा ही रह जाए।
-लेखक भटनेर पोस्ट मीडिया ग्रुप के चीफ एडिटर हैं





