आपके जीवन में भी हैं ‘चुगलखोर’

डॉ. एमपी शर्मा.
जो दूसरों की बुराई करता है, वह अपने चरित्र की सच्चाई उजागर करता है।
रनिंदा अर्थात किसी की अनुपस्थिति में उसकी बुराई करना, यह कोई साधारण आदत नहीं, बल्कि एक खतरनाक प्रवृत्ति है जो व्यक्ति के चारित्रिक पतन का परिचायक होती है। दुर्भाग्यवश, आज यह प्रवृत्ति समाज में सामान्य होती जा रही है, घर की बैठक से लेकर दफ्तर की चर्चा तक, सोशल मीडिया से लेकर सार्वजनिक मंचों तक, हर जगह लोग दूसरों की बुराई करने में संकोच नहीं करते। यह न केवल रिश्तों में दरार डालती है, बल्कि कार्यक्षेत्र के माहौल को विषैला और समाज को विभाजित करने का काम करती है।
परनिंदा करने वाले लोग प्रायः भीतर से असुरक्षित होते हैं, आत्मविश्वास की कमी से ग्रस्त होते हैं, जिन्हें स्वयं की योग्यता पर भरोसा नहीं होता, और वे दूसरों को नीचा दिखाकर स्वयं को ऊँचा सिद्ध करने का प्रयास करते हैं। यह प्रवृत्ति ईर्ष्या, प्रतियोगिता, नकारात्मक सोच या फिर केवल फालतू समय बिताने की आदत से उपजती है। कुछ लोग तो दूसरों की गलतियों से ध्यान हटाने के लिए, किसी तीसरे व्यक्ति की बुराई करके खुद को बचाने का प्रयास करते हैं। ऐसे लोग सामने अत्यंत विनम्र और मिलनसार दिखते हैं लेकिन पीठ पीछे बुराई करते हैं, जिससे उनका व्यवहार ऊपर से मीठा पर भीतर से खोखला होता है।


संबंधों की शत्रु, मन की अशांति का कारण
परनिंदा केवल दूसरों को नुकसान नहीं पहुंचाती, बल्कि स्वयं परनिंदक को धीरे-धीरे खोखला कर देती है। वह व्यक्ति अपनी विश्वसनीयता खो देता है, मानसिक शांति से दूर हो जाता है और धीरे-धीरे उसकी सकारात्मक ऊर्जा खत्म हो जाती है। परनिंदा करने से रिश्तों में संदेह और कटुता पैदा होती है, लोग दूरी बनाने लगते हैं और अंततः ऐसा व्यक्ति अकेला पड़ जाता है। इसके अलावा, जो लोग बार-बार दूसरों की निंदा सुनते हैं, वे भी प्रभावित हुए बिना नहीं रहते। वे अनजाने में दूसरों के प्रति गलत धारणा बना लेते हैं, जिससे मतभेद, ईर्ष्या और द्वेष जैसी नकारात्मक भावनाएं जन्म लेती हैं। कार्यस्थल पर यह प्रवृत्ति आपसी सहयोग को खत्म करती है और टीम भावना को तोड़ देती है। ऐसे लोग किसी की सफलता में खोट ढूंढते हैं, निजी बातें सार्वजनिक करते हैं और हर बातचीत को नकारात्मक रंग देने में माहिर होते हैं। ऐसे लोगों की पहचान कठिन नहीं होतीकृये अक्सर आलोचना की भाषा बोलते हैं, प्रशंसा में कृत्रिमता दिखाते हैं और दूसरों के निजी मामलों पर बिना हिचक राय व्यक्त करते हैं।


ऐसे लोगों से कैसे बचें?
परनिंदा करने वालों से बचने का पहला उपाय है, सीधी और सीमित बातचीत। उनके साथ बहुत अधिक आत्मीयता न रखें और जब वे किसी की बुराई करें, तो विषय बदल दें या मौन धारण करें। उनसे कोई भी व्यक्तिगत या गोपनीय बात साझा न करें, क्योंकि जो दूसरों के बारे में आपको बताता है, वह आपकी बातें भी किसी और से कह सकता है। ध्यान रखें, किसी की प्रशंसा यदि दिल से नहीं बल्कि दिखावे के लिए की जा रही है, तो उसमें सच्चाई नहीं होती। ऐसी बनावटी आत्मीयता को पहचानें और अपने दृष्टिकोण में स्पष्टता रखें। सबसे आवश्यक बात यह है कि खुद भी कभी परनिंदक बनने से बचें। इसके लिए आत्मनिरीक्षण करें। क्या आप भी दूसरों की आलोचना करके अपने को बेहतर महसूस करते हैं? रुककर सोचें, क्या जो आप कह रहे हैं, वह उस व्यक्ति के सामने कह सकते हैं? यदि नहीं, तो वह बात कहना ही अनुचित है। जीवन में दूसरों की अच्छाइयों को पहचानने और उन्हें सराहने की आदत डालें। आलोचना की बजाय प्रेरणा में शक्ति होती है।


खुद को बदलें, समाज को दिशा दें
दूसरों की बुराई में समय गंवाने वाले व्यक्ति जीवन की असली रोशनी से दूर हो जाते हैं। यदि आप लगातार दूसरों की छाया देखने में लगे रहेंगे, तो अपनी प्रतिभा, अपनी आत्मशक्ति और विकास के अवसर खो देंगे। एक दिन में दुनिया नहीं बदलेगी, लेकिन यदि आप बदलते हैं, तो आपकी दुनिया ज़रूर बदल सकती है। परनिंदा एक बीमारी है, जो पहले आपको खोखला करती है, फिर आपके रिश्तों को तोड़ती है और अंततः आपको अकेलेपन की ओर धकेल देती है। इस समाज को शुद्ध करने की शुरुआत हर व्यक्ति को अपने आप से करनी होगी। निंदा नहीं, सराहना करें। आलोचना नहीं, प्रेरणा दें। क्योंकि असली ताकत बुराई में नहीं, अच्छाई की पहचान और स्वीकार में होती है।
याद रखें, शब्द तलवार से अधिक घातक होते हैं। किसी की अनुपस्थिति में कहे गए शब्द, किसी के आत्मविश्वास और चरित्र को गहराई तक चोट पहुँचा सकते हैं। इसलिए बोलने से पहले सोचें, और आलोचना से पहले आत्ममंथन करें।
-लेखक सामाजिक चिंतक, सीनियर सर्जन और आईएमए राजस्थान के प्रदेशाध्यक्ष हैं

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