








गोपाल झा
हनुमानगढ़ का नगर निकाय चुनाव। कल यानी 11 सितंबर को मतदान होगा। 60 वार्ड और 277 प्रत्याशी। मुकाबला पार्षद बनने का है। लेकिन कहानी इससे कहीं बड़ी है। यह चुनाव सिर्फ 277 प्रत्याशियों की सियासी किस्मत तय नहीं करेगा। यह हनुमानगढ़ विधानसभा क्षेत्र के तीन प्रमुख चेहरों की लोकप्रियता का भी पैमाना बनेगा। तीनों ने चुनाव मैदान में पूरी ताकत झोंक दी है। तीनों ने शहर की गलियों में पसीना बहाया है। तीनों ने अपने-अपने समर्थकों को लामबंद किया है।
ये तीन चेहरे हैं, निर्दलीय विधायक गणेशराज बंसल, भाजपा नेता अमित चौधरी और कांग्रेस के प्रमुख रणनीतिकारों में शामिल पीसीसी सदस्य भूपेंद्र चौधरी। इसलिए 11 सितंबर का मतदान केवल वोट डालने की तारीख नहीं है। यह तीनों के लिए जनमत की बड़ी परीक्षा है।
पहले विधानसभा और फिर लोकसभा चुनाव में भाजपा की हार के बाद हनुमानगढ़ की राजनीति में काफी कुछ बदल चुका है। नेतृत्व की पुरानी तस्वीर धुंधली हुई है। नई तस्वीर आकार ले रही है। नगर निकाय चुनाव उस तस्वीर को और स्पष्ट कर सकता है।
भाजपा में पूर्व मंत्री डॉ. रामप्रताप की राजनीतिक विरासत अब उनके पुत्र अमित चौधरी के इर्द-गिर्द दिखाई दे रही है। डॉ. रामप्रताप की कार्यकर्ताओं के बीच ‘विकासदूत’ की छवि रही है। ऐसे में अमित चौधरी के सामने केवल चुनाव जिताने की चुनौती नहीं है। उन्हें यह भी साबित करना है कि पिता की राजनीतिक विरासत को संभालने की क्षमता उनमें है। हालांकि चुनाव हारने के बाद उनकी कार्यशैली में अपेक्षित बदलाव की चर्चा है।
दूसरी ओर कांग्रेस की राजनीति में पूर्व मंत्री चौधरी विनोद कुमार की सक्रियता अब पहले जैसी नहीं है। कांग्रेस कार्यकर्ताओं में उनकी पहचान विनम्र नेता की रही है। अब उनके पुत्र भूपेंद्र चौधरी का नाम तेजी से सामने आ रहा है। निकाय चुनाव उनके लिए संगठन के भीतर अपनी उपयोगिता और शहर में अपनी पकड़ दिखाने का महत्वपूर्ण अवसर है।
तीसरा चेहरा गणेशराज बंसल हैं। बंसल विधायक हैं। उनके पास सत्ता का अपना जनादेश है। लेकिन नगर निकाय चुनाव की परीक्षा अलग है। विधानसभा चुनाव में मिला जनादेश अपने आप नगर निकाय चुनाव में स्थानांतरित नहीं होता। वार्ड की राजनीति अलग होती है। यहां व्यक्ति काम आता है। संगठन काम आता है। प्रत्याशी का निजी प्रभाव काम आता है। सबसे बढ़कर चुनावी प्रबंधन काम आता है।
यही वजह है कि 60 वार्डों का यह चुनाव तीनों नेताओं के लिए कई स्तरों पर परीक्षा है।
पहली परीक्षा लोकप्रियता की है। किस नेता के समर्थित प्रत्याशी कितने वार्डों में बढ़त बनाते हैं? किसके साथ स्थानीय मतदाता खड़ा दिखाई देता है? किस नेता की अपील वार्ड स्तर तक पहुंचती है? इन सवालों के जवाब मतगणना के दिन मिलेंगे। लेकिन असली परीक्षा इससे आगे है।
रणनीति की परीक्षा। किसने किस वार्ड में किस चेहरे को उतारा? कहां समझौता किया? कहां बागी को रोका? कहां निर्दलीय को साधा? कहां अपने समर्थक को मैदान से हटाया? इन फैसलों का असर बोर्ड के गठन के समय दिखाई देगा।
और यहीं तीनों नेताओं की राजनीतिक चतुराई सामने आएगी।
निकाय चुनाव में केवल ज्यादा पार्षद जिताना पर्याप्त नहीं होता। बोर्ड भी बनाना पड़ता है। बहुमत जुटाना पड़ता है। अलग-अलग खेमों को साथ लाना पड़ता है। समीकरण साधने पड़ते हैं। जरूरत पड़ने पर राजनीतिक कूटनीति दिखानी पड़ती है। यानी चुनाव का पहला चरण जनसमर्थन है। दूसरा चरण रणनीति है। तीसरा चरण बोर्ड गठन है। इन तीनों चरणों में जो नेता सफल होगा, उसकी राजनीतिक हैसियत मजबूत होगी।
गणेशराज बंसल के लिए यह चुनाव खास मायने रखता है। विधायक के रूप में उनकी अगली राजनीतिक पारी की दिशा का संकेत यहां से मिल सकता है। यदि उनके समर्थक बड़ी संख्या में जीतते हैं तो विधानसभा क्षेत्र में उनकी पकड़ मजबूत होने का संदेश जाएगा। यदि अपेक्षित प्रदर्शन नहीं हुआ तो विरोधियों को सवाल उठाने का मौका मिलेगा।
अमित चौधरी के सामने चुनौती अलग है। उन्हें भाजपा के संगठन और कार्यकर्ताओं के बीच अपनी स्वीकार्यता साबित करनी है। साथ ही यह भी दिखाना है कि वे केवल राजनीतिक विरासत के उत्तराधिकारी नहीं हैं, बल्कि चुनावी राजनीति के खिलाड़ी भी हैं।
भूपेंद्र चौधरी के लिए भी मुकाबला कम महत्वपूर्ण नहीं है। टिकट वितरण से लेकर चुनाव प्रबंधन तक उनकी भूमिका चर्चा में रही है। ऐसे में कांग्रेस का प्रदर्शन उनके संगठनात्मक प्रभाव व नेतृत्व क्षमता का संकेत देगा।
इस चुनाव को विधानसभा चुनाव 2028 का सीधा परिणाम मानना जल्दबाजी होगी। अभी दो साल का राजनीतिक सफर बाकी है। समीकरण बदलेंगे। चेहरे बदल सकते हैं। गठबंधन बदल सकते हैं। लेकिन निकाय चुनाव एक महत्वपूर्ण राजनीतिक संकेत जरूर देगा। क्योंकि स्थानीय चुनाव जनता के मूड की बारीक तस्वीर दिखाते हैं।
इसलिए हनुमानगढ़ में 11 सितंबर को वोट केवल पार्षद चुनने के लिए नहीं पड़ेगा। वोट के साथ तीन नेताओं की लोकप्रियता, संगठन क्षमता और राजनीतिक रणनीति पर भी मुहर लगेगी। अब 14 सितंबर की मतगणना बताएगी कि किसका दावा मजबूत है। किसका संगठन जमीन पर खड़ा है। किसकी रणनीति कारगर रही।
फिलहाल मुकाबला खुला है।
तीनों मैदान में हैं।
तीनों ने ताकत झोंकी है।
तीनों के दावे बड़े हैं।
अब फैसला जनता के हाथ में है।
ईवीएम खुलेंगी तो सिर्फ वार्डों के विजेता सामने नहीं आएंगे। हनुमानगढ़ की बदलती राजनीति की अगली तस्वीर भी दिखाई देगी।
-लेखक भटनेर पोस्ट मीडिया ग्रुप के चीफ एडिटर हैं







