






गोपाल झा
नगरपरिषद चुनाव के नतीजे आने के बाद हनुमानगढ़ की राजनीति में अब मुकाबला सिर्फ सभापति की कुर्सी तक सीमित नहीं रह गया है। एक तरफ निर्दलीय विधायक गणेशराज बंसल गुट 35 पार्षदों के समर्थन का दावा करते हुए मंजू रणवां को सभापति पद के लिए आगे कर रहा है, वहीं भाजपा के पास 15 पार्षद हैं और उसने विनीता बतरा को मैदान में उतारा है। कांग्रेस की ओर से सुशीला खीचड़ प्रत्याशी हैं। इसी बीच 21 साल पुराने पट्टा प्रकरण में विधायक और उनके करीबियों के खिलाफ मामला दर्ज होने तथा विधायक समर्थकों से जुड़े प्रतिष्ठानों पर स्वास्थ्य विभाग की कार्रवाई ने राजनीतिक बहस को और तेज कर दिया है।
सवाल 1. चुनाव के बाद असली विवाद किस बात पर है?
नगरपरिषद चुनाव में विधायक गणेशराज बंसल गुट के 35 पार्षद निर्वाचित हुए हैं, जबकि भाजपा के खाते में 15 सीटें आई हैं। यानी अब चुनाव का केंद्र पार्षदों की जीत से आगे बढ़कर सभापति और उसके बाद बनने वाले बोर्ड की राजनीतिक दिशा पर आ गया है। इसी वजह से निर्वाचित पार्षदों को लेकर दोनों खेमों में संपर्क और राजनीतिक गतिविधियां तेज हुई हैं।
सवाल 2. क्या सभापति को लेकर समझौते की कोशिश भी हुई थी?
विधायक समर्थकों के अनुसार, सरकार के प्रतिनिधियों की ओर से ऐसा प्रस्ताव रखा गया था कि सभापति विधायक की पसंद का हो, लेकिन उपसभापति भाजपा के चुनाव चिह्न पर जीतकर आए पार्षद को बनाया जाए। समर्थकों का कहना है कि कांग्रेस पृष्ठभूमि से जुड़े निर्दलीय पार्षद भाजपा को समर्थन देने के पक्ष में नहीं थे। इसी राजनीतिक गणित के कारण विधायक गुट ने इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया। एक शर्त जो विधायक को मंजूर नहीं था, वह है कि पूर्व मंत्री डॉ. रामप्रताप की सहमति से सभापति पद का चयन। दावा है कि सरकार की ओर से चार-पांच संभावित सभापति उम्मीदवारों के नाम सामने रखने को कहा गया था, जिनमें से पूर्व मंत्री डॉ. रामप्रताप किसी एक नाम पर सहमति दे सकते थे। भाजपा सूत्रा भी इस दावे पर मुहर लगाते हैं। बताया गया है कि विधायक गणेशराज बंसल ने इससे साफ इनकार किया। हालांकि यह बात फिलहाल दावों और प्रतिदावों के स्तर पर है, स्थापित तथ्य के रूप में नहीं यानी पूरी तरह ऑफ द रिकॉर्ड।
सवाल 3. 21 साल पुराना पट्टा मामला अचानक क्यों चर्चा में आया?
17 सितंबर को हनुमानगढ़ जंक्शन थाने में शहर निवासी संदीप सोनी की शिकायत पर वर्ष 2003 के आवासीय पट्टा आवंटन से जुड़े मामले में प्राथमिकी दर्ज की गई। शिकायत में गणेशराज बंसल, उनकी पत्नी एवं पूर्व सभापति संतोष बंसल तथा दो अन्य लोगों के नाम हैं। विधायक के पद पर होने के कारण मामले की जांच सीआईडी-सीबी से कराए जाने की बात सामने आई है। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया है कि सेक्टर 9एल के आवासीय क्षेत्र में कुछ ऐसे भूखंडों के पट्टे जारी किए गए, जिनसे संबंधित जमीन पर अतिक्रमण का विवाद था।
सवाल 4. शिकायत में आखिर आरोप क्या लगाए गए हैं?
शिकायत के मुताबिक, सेक्टर 9एल की योजना वर्ष 1965 की थी और वहां 170 आवासीय भूखंड बताए गए हैं। शिकायतकर्ता का आरोप है कि करीब 70 भूखंड बिकने के बाद शेष भूमि, सड़क, पार्क और शिक्षण संस्थान के लिए आरक्षित जमीन पर अतिक्रमण हुआ। आरोप यह भी है कि अक्टूबर 2003 में तत्कालीन नगर निकाय अधिकारियों और संबंधित लोगों की मिलीभगत से कुछ कब्जाधारियों को पट्टे जारी किए गए। शिकायत में दो उदाहरण भी दिए गए हैं, 13 अक्टूबर 2003 को प्लॉट संख्या 16 और 18 अक्टूबर 2003 को प्लॉट संख्या 08 के पट्टे जारी किए जाने का उल्लेख है। शिकायतकर्ता ने संबंधित राजस्व रिकॉर्ड में बताए गए कुछ विवरणों के अस्तित्व पर भी सवाल उठाया है। ये सभी शिकायत में लगाए गए आरोप हैं। इनकी सत्यता जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया में तय होगी।
सवाल 5. क्या प्रशासन ने पहले भी पट्टे रोकने का आदेश दिया था?
शिकायत में दावा किया गया है कि तत्कालीन जिला कलेक्टर ने 29 सितंबर 2003 को अतिक्रमित भूमि पर पट्टे जारी नहीं करने के निर्देश दिए थे। यह निर्देश संयुक्त जांच रिपोर्ट के आधार पर दिए जाने की बात शिकायत में कही गई है। शिकायतकर्ता का आरोप है कि इसके बावजूद बाद में संबंधित दस्तावेज जारी किए गए। यही बिंदु इस पूरे प्रकरण को राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बनाता है। यदि जांच में शिकायत के आरोप प्रमाणित होते हैं तो जिम्मेदारी तय करने का सवाल उठेगा; यदि आरोप प्रमाणित नहीं होते तो मामले की दूसरी तस्वीर सामने आएगी।
सवाल 6. विधायक समर्थकों से जुड़े प्रतिष्ठानों पर स्वास्थ्य विभाग की कार्रवाई क्या है?
इसी राजनीतिक घटनाक्रम के बीच स्वास्थ्य विभाग की टीम ने विधायक के करीबी माने जाने वाले कुछ लोगों के व्यावसायिक प्रतिष्ठानों का निरीक्षण किया। टीम ने जिन चार प्रतिष्ठानों पर दबिश दी, इनमें से तीन प्रतिष्ठान विधायक समर्थकों के बताए जाते हैं। सीएमएचओ डॉ. नवनीत शर्मा के नेतृत्व में जीएम रिसोर्ट, शक्ति फ्लोर मिल और शिव डेयरी का निरीक्षण किया गया। जीएम रिसोर्ट से दही और आटे के नमूने लिए गए, जबकि अन्य स्थानों पर साफ-सफाई और खाद्य सामग्री के रखरखाव की जांच की गई। कुल चार खाद्य नमूने बीकानेर स्थित राज्य जन स्वास्थ्य प्रयोगशाला भेजे जाने की बात सामने आई है। स्वास्थ्य विभाग ने इसे खाद्य सुरक्षा और स्वच्छता से जुड़ी नियमित कार्रवाई बताया है।
सवाल 7. इस कार्रवाई को लेकर दोनों पक्ष क्या कह रहे हैं?
विधायक समर्थकों का आरोप है कि चुनाव परिणाम के बाद पुलिस और प्रशासनिक एजेंसियों के जरिए उनके खेमे पर दबाव बनाया जा रहा है। वे इसे राजनीतिक प्रतिशोध बताते हुए विरोध की तैयारी कर रहे हैं। दूसरी ओर भाजपा और शिकायतकर्ता पक्ष का कहना है कि कानून सभी के लिए समान है। यदि सरकारी या सार्वजनिक भूमि से जुड़े पट्टों में अनियमितता हुई है तो उसकी जांच होनी चाहिए। स्वास्थ्य विभाग की ओर से भी कार्रवाई को राजनीतिक नहीं, बल्कि खाद्य सुरक्षा और स्वच्छता से जुड़ा बताया गया है। इस तरह पूरे विवाद में फिलहाल दो अलग-अलग दावे सामने हैं,एक इसे राजनीतिक दबाव से जोड़ रहा है, दूसरा इसे कानूनी एवं प्रशासनिक कार्रवाई बता रहा है।
सवाल 8. क्या अब यह मामला सड़क पर भी उतरने वाला है?
विधायक समर्थकों ने 19 सितंबर को आंदोलन की घोषणा की है। सोशल मीडिया संदेशों के जरिए समर्थकों और नागरिकों को सुबह 9 बजे अग्रसेन भवन पहुंचने का आह्वान किया गया है जबकि माकपा कार्यकर्ताओं ने इसे ‘लोकतंत्र की हत्या’ करार देते हुए 10 बजे कलक्टर कार्यालय घेरने का एलान किया है। इसके बाद पुलिस अधीक्षक कार्यालय के घेराव और ज्ञापन देने की योजना बताई गई है। विधायक समर्थक प्रशासनिक पक्षपात का आरोप लगाते हुए विरोध दर्ज कराने की तैयारी में हैं। प्रशासन की ओर से अतिरिक्त पुलिस बल की तैनाती पर विचार किए जाने की बात भी सामने आई है।
सवाल 9. अब आगे क्या होगा और सबसे बड़ा पेंच कहां है?
अब पूरे घटनाक्रम के तीन समानांतर रास्ते हैं।
पहला, सभापति चुनाव। मंजू रणवां, विनीता बतरा और सुशीला खीचड़ के बीच मुकाबला होना है। निर्वाचित पार्षदों का समर्थन किस उम्मीदवार के साथ जाता है, इससे नगरपरिषद के अगले बोर्ड की तस्वीर तय होगी।
दूसरा, 21 साल पुराने पट्टा प्रकरण की जांच। प्राथमिकी दर्ज होने के बाद मामले की जांच आगे बढ़ेगी। आरोप सही हैं या नहीं, यह जांच और कानूनी प्रक्रिया से तय होगा।
तीसरा, राजनीतिक टकराव। विधायक समर्थकों के प्रस्तावित प्रदर्शन और प्रशासनिक कार्रवाई को लेकर दोनों पक्षों के बीच आरोप-प्रत्यारोप जारी रहने की संभावना है।
इसलिए हनुमानगढ़ में नगरपरिषद का मौजूदा घटनाक्रम केवल सभापति पद के चुनाव की कहानी नहीं है। एक तरफ निर्वाचित पार्षदों का संख्याबल और बोर्ड गठन की प्रक्रिया है, तो दूसरी तरफ पुराना पट्टा प्रकरण, प्रशासनिक कार्रवाई और उसके राजनीतिक असर को लेकर विवाद है। आने वाले दिनों में सभापति चुनाव के साथ-साथ यह भी महत्वपूर्ण होगा कि जांच किस दिशा में आगे बढ़ती है और दोनों राजनीतिक पक्ष इस टकराव को किस तरह आगे ले जाते हैं।








