







गोपाल झा
सियासत में जब मौसम चुनाव का होता है, तो हवा का मिजाज सिर्फ चौराहों पर लगे बैनर या पर्चों से नहीं बदलता, बल्कि चाय की थड़ियों पर खदबदाती बहसों से तय होता है। राजस्थान के आखिरी छोर पर बसे हनुमानगढ़ जिले में इन दिनों ठीक वही सियासी तपिश महसूस की जा सकती है। तारीखें आती-जाती रहती हैं, लेकिन कुछ चुनाव ऐसे होते हैं जो महज पांच साल के लिए पार्षद या चेयरमैन तय नहीं करते, बल्कि बड़े-बड़े धुरंधरों की सियासी सल्तनत की नींव हिलाने या मजबूत करने का माद्दा रखते हैं।
संगरिया, टिब्बी, रावतसर, नोहर और भादरा के 170 वार्डों में 586 उम्मीदवारों ने ताल ठोक रखी है। 1 लाख 45 हजार 152 वोटर अपनी अंगुली पर स्याही लगवाकर अपनी तकदीर का फैसला करेंगे। कागजों में तो यह मुकाबला इन 586 चेहरों की किस्मत का है, लेकिन सच पूछिए तो यह उन ‘सियासी सूरमाओं’ का इम्तिहान है जो एयर-कंडीशन कमरों से निकलकर खुद को जनता का ‘इकलौता मसीहा’ बताते आए हैं। यह चुनाव 2028 के उस बड़े दंगल की रिहर्सल है, जहां टिकट की दावेदारी इसी बात पर तय होगी कि आपने अपनी चौखट पर पार्टी का झंडा कितना ऊंचा फहराया था।

पूरे जिले में पांच विधानसभा सीटें हैं, और बीजेपी के पास बचाने के लिए सिर्फ यही एक किला है। इसलिए शुरुआत भादरा की रेत से करते हैं। विधायक संजीव बेनीवाल के कंधों पर इस वक्त दोहरी जिम्मेदारी है। उनके लिए यह सिर्फ एक बोर्ड बनाने की जंग नहीं, बल्कि जयपुर के सत्ता गलियारों में अपनी धमक साबित करने का जरिया है। अगर बेनीवाल यहां कमल खिलाने में कामयाब रहे, तो समझ लीजिए कि संगठन या सत्ता की झोली से उन्हें कोई बड़ा सियासी ‘तोहफा’ मिलना तय है। लेकिन अगर चूके, तो जवाबदेही के कांटे भी सबसे पहले उन्हीं के हिस्से आएंगे।
थोड़ा आगे बढ़ें तो नोहर का मैदान अलग ही कहानी कह रहा है। यहां एक ही तीर से दो बड़े निशाने साधे जा रहे हैं। कांग्रेस के विधायक अमित चाचाण लगातार दूसरी बार जीत दर्ज कर अपने कद को मजबूत कर चुके हैं। अगर वे पालिका में अपना बोर्ड बनवा लेते हैं, तो नोहर की जमीन पर उनकी पकड़ और पुख्ता हो जाएगी। लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू भी कम दिलचस्प नहीं है। लगातार दो बार हार का कड़वा घूंट पी चुके पूर्व विधायक अभिषेक मटोरिया के लिए यह चुनाव किसी ‘संजीवनी बूटी’ से कम नहीं है। मटोरिया के समर्थक इस वक्त पलकें बिछाए नतीजों की राह देख रहे हैं। अगर बीजेपी का बोर्ड बना, तो मटोरिया के सियासी खेमे में जान फूंक जाएगी और 2028 के टिकट की दावेदारी में उनका दावा फिर से सबसे आगे नजर आएगा।

इधर संगरिया विधानसभा क्षेत्र में मामला और पेचीदा है, क्योंकि यहां एक नहीं, दो-दो निकायों, संगरिया और टिब्बी की बिसात बिछी है। यहां कांग्रेस के युवा विधायक अभिमन्यु पूनिया की साख कसौटी पर है, तो वहीं बीजेपी के जिलाध्यक्ष प्रमोद डेलू और पूर्व विधायक गुरदीप शाहपीनी का सियासी रसूख दांव पर लगा है। संगरिया प्रमोद डेलू का अपना घर है, अपनी जमीन है। जब अपने ही आंगन में दंगल हो, तो दबाव कई गुना बढ़ जाता है। अगर यहां बीजेपी बाजी मारती है, तो डेलू और शाहपीनी की जोड़ी संगठन के भीतर अपना सिक्का और मजबूती से जमाएगी; लेकिन अगर कांग्रेस ने बाजी पलट दी, तो जिले की कप्तानी पर कई दबी जुबानों से सवाल उठने लगेंगे।
और आखिर में आइए रावतसर, जहां की फिजाओं में सियासी सरगोशियां सबसे ज्यादा तेज हैं। पीलीबंगा विधानसभा क्षेत्र का यह कस्बा इन दिनों आरोपों और सफाई की भट्ठी में तप रहा है। विधायक विनोद गोठवाल को बाहरी विरोधियों से ज्यादा ‘अपनों’ के तीखे तीरों का सामना करना पड़ा। नुक्कड़ सभाओं के माइक्रोफोन गवाह हैं कि कैसे विधायक ने एक-एक आरोप का खुलकर जवाब दिया, दिल की भड़ास निकाली। अब रावतसर की जनता की बारी है कि वह उन दलीलों पर एतबार करती है या नहीं। अगर गोठवाल यहां कांग्रेस का बोर्ड बना लेते हैं, तो वे अपनी पार्टी के भीतर अपने तमाम विरोधियों को एक झटके में खामोश कर देंगे।
वहीं दूसरी तरफ, बीजेपी के लिए भी रावतसर नाक का सवाल है। यह इलाका पार्टी के प्रदेश महामंत्री कैलाश मेघवाल और पूर्व विधायक धर्मेंद्र मोची का गृहक्षेत्र है। हालांकि कैलाश मेघवाल पूरे सूबे की सियासत साधने में व्यस्त रहे और कस्बाई गलियों में कम दिखे, लेकिन घर के आंगन में हार-जीत का सेहरा या ठीकरा पूर्व विधायक धर्मेंद्र मोची के साथ उनके सिर भी बंधेगा।
कुल जमा बात इतनी है कि यह चुनाव सिर्फ नालियों, सड़कों और स्ट्रीट लाइटों का नहीं रह गया है। यह कस्बाई क्षत्रपों की साख की सीधी लड़ाई है। जनता जब ईवीएम का बटन दबा रही है तो सिर्फ वार्ड का नुमाइंदा नहीं चुन रही, बल्कि उन नेताओं का रिपोर्ट कार्ड भी तैयार कर रही है, जो हर पांच साल में टिकट की दावेदारी लेकर दिल्ली और जयपुर के चक्कर काटते हैं। परिणाम आते ही पार्टियों के दफ्तरों से हिसाब मांगा जाएगा और उस वक्त कागजी दावों की नहीं, बल्कि जमीन पर बने बोर्डों की गिनती होगी।
-लेखक भटनेर पोस्ट मीडिया ग्रुप के चीफ एडिटर हैं






