








भटनेर पोस्ट डॉट कॉम
राजस्थान का कोई भी शहर हो। नगरीय निकाय चुनाव में पार्षद बनने के लिए मैदान में उतरे प्रत्याशियों के वादों की फेहरिस्त लंबी है। कहीं सड़कें चमकाने का दावा है तो कहीं नालियों की तस्वीर बदलने का भरोसा। कोई सफाई व्यवस्था सुधारने और हर गली में स्ट्रीट लाइट लगाने की बात कर रहा है तो कोई जलभराव की स्थायी समस्या खत्म करने का वादा कर रहा है। कुछ प्रत्याशी तो अपने शहर को चंडीगढ़ जैसा विकसित बनाने तक का सपना दिखा रहे हैं।
लेकिन चुनावी शोर थमने और नई नगर सरकार बनने के बाद एक सवाल इन तमाम वादों के सामने खड़ा होगा, इन कामों के लिए पैसा आएगा कहां से? यही सवाल हनुमानगढ़ समेत राजस्थान के सभी 309 नगरीय निकायों की सबसे बड़ी राजनीतिक और आर्थिक चुनौती बनने वाला है। आंकड़े बताते हैं कि प्रदेश के शहरी निकाय अपनी कमाई से अपना खर्च तक पूरा करने की स्थिति में नहीं हैं। ऐसे में नई नगर सरकारों के सामने जनता की अपेक्षाओं को पूरा करने के साथ-साथ राज्य सरकार से पर्याप्त फंड हासिल करने की राजनीतिक चुनौती भी होगी।
राजस्थान सरकार के छठे राज्य वित्त आयोग के आंकड़ों और वर्ष 2026-27 के बजट के मुताबिक 2023-24 में प्रदेश के सभी शहरी निकायों की अपनी आय 1,460.35 करोड़ रुपए थी। इसी वर्ष निकायों को कुल 7,531.09 करोड़ रुपए की प्राप्तियां हुईं, जबकि उनका कुल खर्च 8,022.07 करोड़ रुपए रहा। यानी कुल प्राप्तियां भी खर्च से 490.98 करोड़ रुपए कम रहीं। इससे निकायों की आर्थिक निर्भरता का अंदाजा लगाया जा सकता है। उनकी अपनी आय कुल प्राप्तियों का केवल करीब 19.4 प्रतिशत और कुल खर्च का लगभग 18.2 प्रतिशत ही थी। सीधे शब्दों में कहें तो शहरों की नगर सरकारें जिन सड़कों, नालियों, सफाई, रोशनी और दूसरी सुविधाओं के बड़े-बड़े वादों के साथ चुनाव लड़ रही हैं, उनके लिए स्थानीय स्तर पर पर्याप्त आर्थिक संसाधन मौजूद नहीं हैं।
हालांकि तस्वीर का दूसरा पहलू यह है कि नगरीय निकायों की अपनी आय में पिछले कुछ वर्षों में अच्छी बढ़ोतरी हुई है। वर्ष 2019-20 में निकायों की अपनी आय 798.37 करोड़ रुपए थी, जो 2023-24 में बढ़कर 1,460.35 करोड़ रुपए हो गई। यानी करीब 83 प्रतिशत की वृद्धि हुई। लेकिन इसी अवधि में खर्च करीब 4,940.46 करोड़ रुपए से बढ़कर 8,022.07 करोड़ रुपए पहुंच गया। यानी आय बढ़ने के बावजूद खर्च की रफ्तार कहीं ज्यादा रही। हनुमानगढ़ जैसे शहरों के लिए इसका अर्थ साफ है, स्थानीय करों, शुल्कों और दूसरे स्रोतों से आय बढ़ाने के प्रयास जरूरी होंगे, लेकिन अकेले इन्हीं संसाधनों के भरोसे शहरों की बढ़ती जरूरतें पूरी करना आसान नहीं होगा।
निकायों की आर्थिक कमजोरी का सबसे बड़ा संकेत सरकारी सहायता पर बढ़ती निर्भरता है। वर्ष 2023-24 में शहरी निकायों को 2,491 करोड़ रुपए का अनुदान मिला था, जो 2024-25 में बढ़कर 4,298 करोड़ रुपए हो गया। एक साल में इसमें करीब 72.5 प्रतिशत की वृद्धि हुई। 2024-25 में मिले अनुदान में 1,982 करोड़ रुपए परिसंपत्तियों के निर्माण के लिए दिए गए। इससे पिछले साल यह राशि 1,492 करोड़ रुपए थी। यानी सड़क से लेकर सीवरेज और दूसरी आधारभूत सुविधाओं तक के विकास में राज्य सरकार की आर्थिक भागीदारी महत्वपूर्ण बनी हुई है। चुनाव जीतने के बाद स्थानीय पार्षदों और बोर्डों की राजनीतिक ताकत का एक बड़ा हिस्सा इसी बात पर निर्भर करेगा कि वे सरकार से अपने शहर के लिए कितना फंड ला पाते हैं।
राज्य सरकार ने 2026-27 के बजट में भी शहरी निकायों के लिए बड़े प्रावधान किए हैं। ऑक्ट्रॉय क्षतिपूर्ति तथा राज्य और केंद्रीय वित्त आयोग के अनुदान के रूप में सीधे 7,775.15 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है। इसके अलावा ।डत्न्ज् 2.0 के लिए 6,765.66 करोड़ रुपए, स्वच्छ भारत मिशन-शहरी 2.0 के लिए 1,289.25 करोड़ रुपए, राजस्थान अर्बन इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट प्रोजेक्ट के लिए 812.66 करोड़ रुपए और निकायों की सड़कों के रखरखाव व मरम्मत के लिए 500 करोड़ रुपए का प्रावधान है। फंड की ये योजनाएं नई नगर सरकारों के लिए राहत जरूर हैं, लेकिन साथ ही यह भी बताती हैं कि शहरों के विकास का बड़ा हिस्सा राज्य और केंद्र की योजनाओं पर निर्भर है।
यह समस्या केवल छोटे शहरों या सीमित संसाधनों वाले निकायों की नहीं है। प्रदेश के बड़े शहरों के उपलब्ध ऑडिटेड खातों में भी अपनी आय और खर्च के बीच बड़ा अंतर दिखाई देता है। यानी आबादी, कारोबार और संपत्ति बाजार बढ़ने के बावजूद नगर निकायों की वित्तीय क्षमता उसी अनुपात में मजबूत नहीं हो पाई है। ऐसे में हनुमानगढ़ जैसे शहरों के सामने चुनौती और स्पष्ट हो जाती है, स्थानीय जरूरतें लगातार बढ़ेंगी, लेकिन आमदनी के पारंपरिक स्रोत सीमित रहेंगे।
सबसे गंभीर संकेत भविष्य के आंकड़ों से मिलता है। 16वें वित्त आयोग की अवधि के लिए किए गए अनुमान के मुताबिक वर्ष 2026-27 से 2030-31 के बीच शहरी निकायों का कुल राजस्व-व्यय अंतर 21,592.81 करोड़ रुपए तक पहुंच सकता है। इस अनुमान में केंद्रीय वित्त आयोग के अनुदान को शामिल नहीं किया गया है। अनुमान है कि यह अंतर 2026-27 में 2,952.34 करोड़ रुपए से बढ़कर 2030-31 में 5,887.90 करोड़ रुपए तक पहुंच सकता है। इसका मतलब यह है कि आज चुनाव में किए जा रहे विकास के वादों का असली इम्तिहान आने वाले वर्षों में होगा।
राजस्थान वित्त आयोग के चेयरमैन अरुण चतुर्वेदी के मुताबिक फिलहाल राज्य सरकार अपनी आय से शहरी निकायों को आर्थिक मदद दे रही है। हालांकि निकायों को धीरे-धीरे वित्तीय रूप से आत्मनिर्भर बनाने के प्रयास किए जा रहे हैं। आयोग दूसरे राज्यों और नगर निकायों के सफल मॉडल का अध्ययन कर रहा है, जिनमें तमिलनाडु जैसे राज्यों के मॉडल भी शामिल हैं। चतुर्वेदी ने लंबे समय में निकायों के लिए नए राजस्व स्रोत विकसित करने की जरूरत बताई है। म्युनिसिपल बॉन्ड को भी उन्होंने संभावित विकल्प माना है, हालांकि इसके इस्तेमाल का फैसला राज्य सरकार को करना होगा।
हनुमानगढ़ में गठित होने वाली ‘शहर की सरकार’ के सामने इसलिए केवल यह चुनौती नहीं होगी कि कौन-सी सड़क कब बनेगी या किस वार्ड में नाली सुधरेगी। असली चुनौती होगी, इन कामों के लिए लगातार और पर्याप्त पैसा कैसे जुटाया जाए। चुनाव में पार्षद जनता से वादे करेंगे, जनता उनसे हिसाब मांगेगी और बोर्ड सरकार की ओर देखेगा। ऐसे में आने वाले वर्षों में अच्छा पार्षद वही नहीं माना जाएगा जो अपने वार्ड की समस्याएं गिनाए, बल्कि वह भी होगा जो अपने शहर के लिए सरकार से फंड खींचकर लाने की राजनीतिक और प्रशासनिक क्षमता दिखाए। क्योंकि नगर राजनीति में आखिरकार बात वादों पर नहीं, बजट की लाइन में दर्ज रकम पर जाकर टिकती है।








