





गोपाल झा
नगरीय निकाय चुनाव की सरगर्मी के बीच इस बार बीजेपी और कांग्रेस दोनों के चेहरों पर वह आत्मविश्वास नहीं दिख रहा, जो चुनाव आते ही आमतौर पर दिखाई देता है। दोनों पार्टियां कुछ सहमी-सहमी सी हैं। माजरा टिकट का है। लेकिन यह टिकट कोई साधारण टिकट नहीं रह गया। एक टिकट देने से पहले पार्टियां जितनी जानकारी जुटा रही हैं, उतनी तो शायद किसी पिता ने अपनी बेटी के लिए रिश्ता तलाशते समय भी नहीं जुटाई होगी। लड़का क्या करता है, घर-परिवार कैसा है, कमाता कितना है, चरित्र कैसा है, इन सवालों के बाद रिश्ता तय हो जाता है। लेकिन यहां तो उम्मीदवार की पूरी जन्मपत्री के साथ-साथ उसकी राजनीतिक वफादारी की एक्स-रे रिपोर्ट भी चाहिए।
कौन जीत सकता है?
किसके कितने वोट हैं?
किसके साथ खड़ा है?
किसके साथ बैठता है?
किससे फोन पर बात करता है?
किस नेता के यहां सुबह की चाय पीता है?
और सबसे महत्वपूर्ण, टिकट मिलने के बाद पार्टी में रहेगा या जीतते ही किसी और की गोद में जा बैठेगा? यानी अब सवाल सिर्फ ‘जीताऊ’ का नहीं है। पार्टियों को ‘टिकाऊ’ भी चाहिए। और यही असली संकट है।

हनुमानगढ़ नगरपरिषद चुनाव में विधायक गणेशराज बंसल की राजनीति ने दोनों दलों का गणित उलझा दिया है। बंसल हर हाल में अपना बोर्ड बनाने की तैयारी में हैं और बीजेपी के सामने चुनौती है कि उनके रास्ते को कैसे रोका जाए। अब बीजेपी ऐसे प्रत्याशी तलाश रही है जो बंसल की रणनीति का मुकाबला कर सके। लेकिन उम्मीदवार में एक और खूबी जरूरी है, वह चुनाव जीतने के बाद भी पार्टी के साथ खड़ा रहे। यानी उम्मीदवार को यह प्रमाण देना होगा कि उसे लालच नहीं लुभाएगा, डर नहीं डराएगा और पद नहीं पटखनी देगा।

सुनने में बड़ा शानदार लगता है। लेकिन ऐसे कार्यकर्ता आज की राजनीति में मिल जाएं तो उन्हें सीधे ‘संग्रहालय’ में रख देना चाहिए। आने वाली पीढ़ियां टिकट लेकर देखने जाएंगी। गैलिलियो को दूरबीन से आसमान में बहुत कुछ दिखाई दे गया था। मगर आज के राजनीतिक दौर में ऐसा कार्यकर्ता ढूंढने के लिए शायद उससे भी ज्यादा ताकतवर दूरबीन चाहिए।
बगावत का डर इतना है कि बीजेपी और कांग्रेस दोनों ने प्रत्याशियों के नामों को लगभग गुप्त दस्तावेज बना दिया है। बीजेपी ने कुछ वार्डों में टिकटार्थियों के नामांकन तक करवा दिए, लेकिन कांग्रेस तो नाम खोलने का जोखिम भी उठाने के मूड में नहीं दिख रही।

क्यों?
क्योंकि नाम सामने आते ही दूसरा दावेदार नाराज होगा। नाराज होगा तो निर्दलीय बनेगा। निर्दलीय बनेगा तो वोट काटेगा। वोट काटेगा तो पार्टी का गणित बिगड़ेगा। और अगर जीत गया तो फिर पार्टी उसे मनाने के लिए हाथ जोड़ती घूमेगी। यानी पार्टी पहले टिकट देती है, फिर उसी टिकट से पैदा हुए बागी को मनाने के लिए नया टिकट तलाशती है। राजनीति भी कमाल की चीज है।
बीजेपी हो या कांग्रेस, दोनों पार्टियां अनुशासन की बात करती हैं। लेकिन सवाल यह है कि अनुशासन बचा कहां है? जब बड़े नेता ही अपने-अपने हिसाब से राजनीतिक मर्यादाओं की व्याख्या करने लगें तो कार्यकर्ता से अनुशासन की उम्मीद कुछ वैसी ही है जैसे बच्चे को मिठाई की दुकान में बैठाकर उससे डायटिंग की उम्मीद करना।
लालच भी राजनीति का पुराना हथियार है और डर भी। पहले इन चीजों को थोड़ा पर्दे में रखा जाता था। अब पर्दा इतना पतला हो गया है कि अंदर का खेल बाहर से साफ दिखाई देता है। ऐसे में कार्यकर्ता से यह कहना कि ‘पार्टी के प्रति वफादार रहो’, कुछ वैसा ही है जैसे नदी में खड़े आदमी को कहना कि कपड़े गीले मत होने देना।
बीजेपी इस चुनाव को लेकर कितनी गंभीर है, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि मुख्यमंत्री को प्रदेशाध्यक्ष के साथ पार्टी मुख्यालय में देर रात तक वार्ड स्तर के दावेदारों के नामों पर मंथन करना पड़ा। यह अपने आप में दिलचस्प दृश्य है। राजस्थान का मुख्यमंत्री प्रदेश चलाए या वार्ड नंबर 18 में कौन पार्षद बनेगा, इस पर माथापच्ची करे?
लेकिन निकाय चुनावों की राजनीति ही ऐसी है। यहां एक छोटा-सा वार्ड आगे चलकर बड़ा राजनीतिक दरवाजा खोल सकता है। इस बहाने मुख्यमंत्री को प्रदेश के उन हजारों कार्यकर्ताओं से परिचय जरूर हो गया होगा, जिनसे राजधानी की राजनीति आमतौर पर दूर रहती है। इसे संगठन का फीडबैक कहिए या चुनावी मजबूरीकृफायदा तो हुआ ही।
असल में बीजेपी और कांग्रेस दोनों को सिर्फ चुनाव हारने का डर नहीं है। बड़ा डर यह है कि जिस उम्मीदवार पर भरोसा करके टिकट दिया, वही चुनाव जीतने के बाद भरोसा बदल दे। आजकल पार्षद बनना मंजिल नहीं है। बोर्ड बनते ही असली राजनीति शुरू होती है।
किसके पास कितने पार्षद हैं?
कौन किसके साथ है?
किसे सभापति बनना है?
किसे उपसभापति बनाना है?
और किस रात किस होटल में कितने पार्षद पहुंचे?
निकाय राजनीति में चुनाव परिणाम से ज्यादा दिलचस्प कभी-कभी उसके बाद की कहानी होती है। इसलिए पार्टियां अब उम्मीदवार का चेहरा नहीं, उसकी रीढ़ तलाश रही हैं। मगर सवाल वही है, रीढ़ सीधी कितने दिन रहेगी?
क्योंकि राजनीति में मौसम बदलने में देर नहीं लगती। कल तक जो कार्यकर्ता पार्टी का झंडा उठा रहा था, वह आज दूसरे खेमे का झंडा उठाए नजर आ सकता है। और दोनों तरफ से उसे यही बताया जाएगा कि वह विचारधारा के साथ है। विचारधारा बेचारे को शायद खुद पता नहीं कि वह किसके साथ है।
कुल मिलाकर नगरीय निकाय चुनाव इस बार सिर्फ बीजेपी बनाम कांग्रेस नहीं है। यह निष्ठा बनाम लालच, अनुशासन बनाम महत्वाकांक्षा और संगठन बनाम व्यक्तिगत राजनीति की भी लड़ाई है। और हनुमानगढ़ में यह लड़ाई थोड़ी ज्यादा दिलचस्प है।
बंसल बोर्ड बनाने के लिए मैदान में हैं।
बीजेपी उन्हें रोकने के लिए मैदान में है।
कांग्रेस अपना गणित बचाने में लगी है।
टिकटार्थी टिकट के लिए बेचौन हैं।
बागी टिकट न मिलने की स्थिति में तैयार बैठे हैं।
और पार्टियां उम्मीदवारों की तलाश में ऐसे घूम रही हैं जैसे आज के जमाने में कोई ईमानदार दलाल तलाश रहा हो।
बकौल शायर,
‘उनको है हमसे वफा की उम्मीद,
जो नहीं जानते वफा क्या है।’
अब देखना सिर्फ यह नहीं है कि कौन चुनाव जीतता है। असल तमाशा तो उसके बाद होगा, कौन किसके साथ टिकता है और कौन कितने में खिसकता है। नगरीय निकाय चुनाव का असली परिणाम शायद मतगणना वाले दिन नहीं, बोर्ड बनने वाले दिन सामने आएगा।
-लेखक भटनेर पोस्ट मीडिया ग्रुप के चीफ एडिटर हैं






