



गोपाल झा
लोकतंत्र की असली परीक्षा चुनावी जीत के साथ समाप्त नहीं होती, बल्कि वहीं से शुरू होती है। जनादेश सरकार बनाता है, लेकिन जनविश्वास उसे टिकाऊ बनाता है। सरकार और जनता के बीच विश्वास का जो पुल बनता है, उसकी नींव घोषणाओं, योजनाओं और बजट से कहीं अधिक संवाद, संवेदनशीलता और जवाबदेही पर टिकी होती है। जब इस पुल में दरारें पड़ने लगती हैं तो सत्ता के गलियारों में बेचैनी बढ़ती है और जनता के मन में निराशा घर करने लगती है। ऐसे समय में सरकारों को केवल फैसले नहीं, बल्कि विश्वास बहाल करने वाले कदम भी उठाने पड़ते हैं।
राजस्थान की राजनीति इन दिनों कुछ ऐसी ही परिस्थितियों से गुजर रही है। सरकार के सामने चुनौतियों की कमी नहीं है। बढ़ती अफसरशाही को लेकर लगातार चर्चाएं होती रही हैं। जनप्रतिनिधियों की शिकायत रही कि उनकी अनुशंसाओं और सुझावों को प्रशासन में अपेक्षित महत्व नहीं मिल रहा। भाजपा के कार्यकर्ताओं के बीच भी समय-समय पर यह भावना उभरती रही कि सरकार और संगठन के बीच पहले जैसा सहज संवाद कमजोर पड़ा है। उधर पंचायतीराज और नगरीय निकाय चुनावों में हुई देरी तथा इस पर उच्च न्यायालय की तल्ख टिप्पणियों ने सरकार को राजनीतिक असहजता के दौर में ला खड़ा किया। विपक्ष ने इन परिस्थितियों को सरकार की कार्यशैली पर सवाल उठाने का अवसर बनाया, जबकि आमजन के मन में भी व्यवस्था को लेकर अनेक प्रश्न उठने लगे।

संभवतः इन्हीं परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए राज्य सरकार ने जिला जन अभाव एवं सतर्कता समितियों के पुनर्गठन का निर्णय लिया है। यह निर्णय केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक व्यापक राजनीतिक संकेत भी है। सरकार ने उन नेताओं को फिर से सक्रिय भूमिका दी है जिन्होंने वर्षों तक संगठन को मजबूत किया, चुनाव लड़े, संघर्ष किया और समाज के बीच अपनी विश्वसनीय पहचान बनाई। यह संदेश भी निहित है कि संगठन की मजबूती केवल नए चेहरों से नहीं, बल्कि अनुभवी कंधों से भी बनी रहती है।

हनुमानगढ़ जिले की जिला जन अभाव एवं सतर्कता समिति इसका सशक्त उदाहरण है। पूर्व जिला प्रमुख दमयंती बेनीवाल, पूर्व जिलाध्यक्ष रामकृष्ण भाकर और देवेंद्र पारीक के साथ जुगलकिशोर गौड़, शैलेंद्र वर्मा तथा सुरेंद्र जलंधरा जैसे अनुभवी कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारी सौंपी गई है। ये केवल राजनीतिक नियुक्तियां नहीं हैं, बल्कि वर्षों के संगठनात्मक अनुभव, जनसंपर्क और स्थानीय समस्याओं की गहरी समझ का प्रतिनिधित्व करती हैं। यदि इस अनुभव को प्रभावी ढंग से उपयोग में लाया गया तो यह समिति प्रशासन और आमजन के बीच संवाद का सशक्त सेतु बन सकती है।

लोकतांत्रिक व्यवस्था की सफलता राजनीति और प्रशासन के संतुलन पर निर्भर करती है। प्रशासन कानून और नियमों के अनुसार व्यवस्था संचालित करता है, जबकि जनप्रतिनिधि जनता की अपेक्षाओं, समस्याओं और भावनाओं को शासन तक पहुंचाते हैं। दोनों की भूमिका परस्पर प्रतिस्पर्धी नहीं, बल्कि पूरक होती है। जब यह संतुलन बिगड़ता है तो व्यवस्था में दूरी, असंतोष और अविश्वास बढ़ने लगता है। इसलिए सुशासन का अर्थ केवल सक्षम प्रशासन नहीं, बल्कि उत्तरदायी प्रशासन भी है।
यहीं जिला जन अभाव एवं सतर्कता समितियों की उपयोगिता सामने आती है। इनका दायरा केवल शिकायतें सुनने तक सीमित नहीं है। समिति अधिकारियों से जवाब मांग सकती है, सरकारी योजनाओं की समीक्षा कर सकती है, लंबित मामलों की सुनवाई कर सकती है, सरकारी अभिलेखों की जांच कर सकती है तथा लापरवाह कर्मचारियों के विरुद्ध कार्रवाई की अनुशंसा भी कर सकती है। यदि इन अधिकारों का निष्पक्ष, नियमित और प्रभावी उपयोग हो तो प्रशासनिक पारदर्शिता और जवाबदेही दोनों को नई मजबूती मिल सकती है।

हालांकि किसी भी संस्था की सफलता उसके गठन से नहीं, बल्कि उसकी सक्रियता और परिणामों से तय होती है। लोकतांत्रिक व्यवस्था का अनुभव बताता है कि अनेक समितियां बड़े उद्देश्यों के साथ बनीं, लेकिन समय के साथ वे औपचारिक बैठकों और फाइलों तक सिमट गईं। इसलिए सबसे बड़ी चुनौती यही है कि जिला जन अभाव एवं सतर्कता समितियां भी केवल नियुक्तियों की सूची बनकर न रह जाएं। उन्हें जनता की समस्याओं का प्रभावी समाधान, प्रशासन की जवाबदेही और शासन की पारदर्शिता का जीवंत मंच बनना होगा।

आगामी पंचायतीराज और नगरीय निकाय चुनावों के संदर्भ में इस निर्णय का राजनीतिक महत्व भी कम नहीं है। वरिष्ठ नेताओं का अनुभव, कार्यकर्ताओं की ऊर्जा और प्रशासन की जवाबदेही यदि एक सूत्र में बंधती है तो सरकार के प्रति जनविश्वास निश्चित रूप से मजबूत हो सकता है। लेकिन यदि यह पहल केवल राजनीतिक असंतोष को शांत करने या संदेश देने तक सीमित रह गई, तो जनता उसके वास्तविक प्रभाव का आकलन करने में देर नहीं लगाएगी। लोकतंत्र में प्रतीकों का महत्व होता है, किंतु स्थायी विश्वास केवल परिणामों से अर्जित होता है।
लिहाजा, किसी भी सरकार की सबसे बड़ी ताकत उसका बहुमत नहीं, बल्कि जनता का सतत बना रहने वाला भरोसा होता है। यह भरोसा भाषणों से नहीं, बल्कि संवेदनशील शासन, उत्तरदायी प्रशासन और समय पर न्याय से अर्जित होता है। जिला जन अभाव एवं सतर्कता समितियों का पुनर्गठन सरकार के सामने एक अवसर है, सरकार और संगठन के बीच संवाद मजबूत करने का, प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के बीच संतुलन स्थापित करने का तथा जनता के विश्वास को नई ऊर्जा देने का। अब यह आने वाला समय तय करेगा कि यह पहल केवल राजनीतिक प्रतीक बनकर रह जाती है या वास्तव में सुशासन और जनभागीदारी की नई इबारत लिखती है।
-लेखक भटनेर पोस्ट मीडिया ग्रुप के चीफ एडिटर हैं





