



डॉ. संतोष राजपुरोहित
एक समय भारत के औद्योगिक विकास का पर्याय माना जाने वाला बंगाल आज आर्थिक पुनर्निर्माण और औद्योगिक पुनर्जागरण की चुनौती से जूझ रहा है। औपनिवेशिक काल में कोलकाता केवल प्रशासनिक राजधानी ही नहीं था, बल्कि व्यापार, उद्योग, बैंकिंग और बंदरगाह गतिविधियों का सबसे बड़ा केंद्र भी था। जूट उद्योग, इंजीनियरिंग इकाइयाँ, रेलवे वर्कशॉप, चाय व्यापार और विदेशी कंपनियों के मुख्यालय बंगाल की आर्थिक शक्ति के प्रतीक थे। हुगली नदी के किनारे विकसित औद्योगिक पट्टी को कभी भारत की औद्योगिक धुरी कहा जाता था। किंतु स्वतंत्रता के बाद धीरे-धीरे यह औद्योगिक चमक फीकी पड़ती गई और बंगाल आर्थिक पिछड़ेपन, बेरोजगारी तथा पूंजी पलायन की समस्या से घिर गया। आज नई सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती इसी खोए हुए औद्योगिक विश्वास को पुनः स्थापित करने की है।
बंगाल के औद्योगिक पतन की शुरुआत विभाजन के बाद ही दिखाई देने लगी थी। जूट उद्योग इसका सबसे बड़ा उदाहरण था। जूट मिलें पश्चिम बंगाल में रह गईं, जबकि कच्चे जूट का बड़ा हिस्सा पूर्वी पाकिस्तान, अर्थात वर्तमान बांग्लादेश में चला गया। इससे उद्योग और कच्चे माल के बीच असंतुलन उत्पन्न हो गया। विभाजन के कारण लाखों शरणार्थियों का आगमन हुआ, जिसने राज्य की सामाजिक और आर्थिक संरचना पर भारी दबाव डाला। इसके बाद राजनीतिक अस्थिरता, श्रमिक आंदोलनों और उद्योगों के प्रति बढ़ती असुरक्षा की भावना ने निवेशकों का विश्वास कमजोर कर दिया। कई बड़े औद्योगिक घरानों ने अपना निवेश महाराष्ट्र, गुजरात और दक्षिण भारत की ओर स्थानांतरित कर दिया।
बंगाल में श्रमिक राजनीति और अत्यधिक ट्रेड यूनियनवाद भी औद्योगिक गिरावट का एक महत्वपूर्ण कारण बना। श्रमिक अधिकारों की रक्षा लोकतांत्रिक व्यवस्था का आवश्यक हिस्सा है, किंतु जब आंदोलन और हड़तालें उत्पादन प्रक्रिया को लगातार प्रभावित करने लगें, तो उद्योगों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता कमजोर होने लगती है। 1960 और 1970 के दशक में ‘बंद’ और ‘घेराव’ की राजनीति ने बंगाल की औद्योगिक छवि को गंभीर नुकसान पहुँचाया। निवेशकों को यह संदेश गया कि राज्य में उद्योग चलाना जोखिमपूर्ण है। परिणामस्वरूप नए उद्योग स्थापित होने की गति धीमी पड़ गई और पुराने उद्योग भी धीरे-धीरे बंद होने लगे।
केंद्र सरकार की कुछ आर्थिक नीतियों ने भी बंगाल को नुकसान पहुँचाया। फ्रेट इक्वलाइजेशन नीति के कारण खनिज संसाधनों वाले राज्यों का प्राकृतिक लाभ समाप्त हो गया। इससे पूर्वी भारत की औद्योगिक बढ़त कम हुई और उद्योग देश के अन्य हिस्सों में तेजी से फैलने लगे। साथ ही कोलकाता बंदरगाह समय के साथ तकनीकी रूप से पिछड़ता गया। नदी में गाद जमने, आधुनिकीकरण की कमी और प्रतिस्पर्धी बंदरगाहों के विकास ने बंगाल के व्यापारिक महत्व को कम कर दिया। 1991 के आर्थिक उदारीकरण के बाद भी बंगाल सूचना प्रौद्योगिकी, इलेक्ट्रॉनिक्स और ऑटोमोबाइल जैसे नए क्षेत्रों में अपेक्षित तेजी से आगे नहीं बढ़ पाया।
आज नई सरकार के सामने सबसे बड़ी आर्थिक चुनौती रोजगार सृजन की है। राज्य में शिक्षित युवाओं की बड़ी संख्या रोजगार के लिए अन्य राज्यों की ओर पलायन कर रही है। यह ‘ब्रेन ड्रेन’ बंगाल की अर्थव्यवस्था को दीर्घकालीन नुकसान पहुँचा रहा है। यदि योग्य मानव संसाधन ही राज्य छोड़ देंगे, तो नवाचार और उद्यमिता का वातावरण कमजोर होगा। दूसरी बड़ी चुनौती निवेशकों का विश्वास पुनः प्राप्त करना है। उद्योगपति केवल कर रियायतें नहीं देखते, बल्कि नीति स्थिरता, प्रशासनिक पारदर्शिता, कानून व्यवस्था और श्रम संबंधों में संतुलन भी चाहते हैं। नई सरकार को यह संदेश देना होगा कि बंगाल अब केवल राजनीतिक विमर्श का केंद्र नहीं, बल्कि निवेश और औद्योगिक विकास का सुरक्षित गंतव्य भी है।
इसके अतिरिक्त इन्फ्रास्ट्रक्चर का विकास भी एक बड़ी आवश्यकता है। सड़क, बिजली, लॉजिस्टिक्स, औद्योगिक पार्क और बंदरगाह सुविधाओं के बिना आधुनिक उद्योगों को आकर्षित करना कठिन होगा। कोलकाता बंदरगाह और हल्दिया बंदरगाह का आधुनिकीकरण राज्य की आर्थिक दिशा बदल सकता है। बंगाल की भौगोलिक स्थिति उसे पूर्वाेत्तर भारत, बांग्लादेश, नेपाल और दक्षिण-पूर्व एशिया के व्यापारिक द्वार के रूप में स्थापित कर सकती है। यदि सरकार क्षेत्रीय व्यापार और लॉजिस्टिक्स नेटवर्क को मजबूत करे, तो राज्य पूर्वी भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक केंद्र पुनः बन सकता है।
हालाँकि चुनौतियों के साथ-साथ संभावनाएँ भी अत्यंत व्यापक हैं। सूचना प्रौद्योगिकी और सेवा क्षेत्र में बंगाल तेजी से आगे बढ़ सकता है, क्योंकि यहाँ शिक्षित मानव संसाधन की कमी नहीं है। कोलकाता में आईटी और स्टार्टअप संस्कृति धीरे-धीरे विकसित हो रही है। एमएसएमई, खाद्य प्रसंस्करण, चमड़ा उद्योग, पर्यटन और बंदरगाह आधारित उद्योगों में भी विशाल संभावनाएँ मौजूद हैं। बंगाल की सांस्कृतिक पहचान, साहित्यिक विरासत और शैक्षणिक संस्थान उसे ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था के लिए उपयुक्त बनाते हैं।
नई सरकार यदि उद्योग और श्रम के बीच संतुलन स्थापित कर सके, प्रशासनिक प्रक्रियाओं को सरल बनाए, निवेश को प्रोत्साहित करे और आधुनिक अवसंरचना पर ध्यान दे, तो बंगाल फिर से औद्योगिक पुनर्जागरण की ओर बढ़ सकता है। इसके लिए केवल आर्थिक सुधार ही नहीं, बल्कि मानसिकता में भी परिवर्तन आवश्यक होगा। उद्योगों को विरोध के नहीं, बल्कि विकास और रोजगार के साधन के रूप में देखने की आवश्यकता है।
बंगाल का इतिहास यह सिद्ध करता है कि उसके पास संसाधन, प्रतिभा और रणनीतिक स्थिति की कोई कमी नहीं है। आवश्यकता केवल दूरदर्शी नेतृत्व, स्थिर नीतियों और विकासोन्मुख वातावरण की है। यदि नई सरकार इन चुनौतियों को अवसर में बदलने में सफल होती है, तो बंगाल एक बार फिर भारत के आर्थिक मानचित्र पर अपनी खोई हुई पहचान प्राप्त कर सकता है।
-लेखक भारतीय आर्थिक परिषद के सदस्य हैं








