



गोपाल झा
रंगों की अपनी-अपनी भाषा होती है। कोई रंग उत्सव का प्रतीक बन जाता है, कोई शोक का, और कोई विरोध का। काला रंग भी ऐसा ही है, गहरा और बेबाक। सियासत के गलियारों में इसकी पहचान विरोध के रंग के रूप में बन चुकी है। जब किसी सरकार के खिलाफ गुस्सा उबलता है, तो वही काला झंडा हवा में लहराता है और अपनी मौजूदगी दर्ज करा देता है।
दिलचस्प बात यह है कि यह रंग विपक्ष को बड़ा रास आता है। विरोध जताने का सबसे आसान और असरदार तरीका काला झंडा ही तो है। लेकिन जैसे ही वही विपक्ष सत्ता की कुर्सी पर बैठता है, कहानी बदल जाती है। जिस काले रंग को वह कभी लोकतंत्र की आवाज बताता था, वही रंग अचानक उसे नागवार गुजरने लगता है। काले झंडे तो दूर, काले कपड़े भी उसे खटकने लगते हैं।
कुछ ऐसा ही दृश्य अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर हनुमानगढ़ में देखने को मिला। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा और डिप्टी सीएम दीया कुमारी की मौजूदगी में एक बड़ा कार्यक्रम आयोजित हुआ। मंच से नारी सशक्तिकरण पर लंबी-लंबी तकरीरें हुईं, महिलाओं के सम्मान की दुहाई दी गई, उनके हक और अधिकारों पर बड़ी-बड़ी बातें कही गईं।
लेकिन मंच के सामने जो मंजर था, वह इन भाषणों से बिल्कुल जुदा दिखाई दे रहा था। सभास्थल पर पुलिस और प्रशासन की चौकसी इस कदर थी कि काले रंग से जैसे उन्हें खौफ हो गया हो। काले झंडे की तो बात छोड़िए, महिलाओं के काले दुपट्टे तक उतरवा लिए गए। यहां तक कि कुछ महिलाओं से काले रंग के पर्स भी रखवा लिए गए।
विडंबना देखिए, जिन महिलाओं को सरकारी कार्यक्रम में भाग लेने के लिए बुलाया गया था, उन्हीं महिलाओं को अपने दुपट्टे तक उतारने के लिए मजबूर होना पड़ा। कई महिलाओं ने एतराज जताया, कुछ ने विरोध भी किया, मगर उनकी बात सुनने वाला कोई नहीं था। पुलिसकर्मी अपने आदेशों का पालन कराने में इतने सख्त थे कि आखिरकार महिलाओं को मन मारकर बिना दुपट्टे के ही सभा में प्रवेश करना पड़ा।
अब सवाल यह उठता है कि यह नारी सम्मान का कौन-सा रूप है? जिस मंच से महिलाओं की इज्जत और उनके सशक्तिकरण की बातें हो रही थीं, उसी कार्यक्रम में महिलाओं की असहजता और अपमान को नजरअंदाज कर दिया गया।
असल में डर काले रंग से नहीं होता, डर उस प्रतीक से होता है जो यह रंग बन चुका है। प्रशासन को यह अंदेशा रहा होगा कि कहीं कोई महिला काले रंग की चुनरी या दुपट्टा लहराकर विरोध दर्ज न करा दे। लेकिन सोचने वाली बात यह है कि अगर ऐसा हो भी जाता तो आखिर आसमान टूट पड़ता क्या? लोकतंत्र में विरोध कोई जुर्म तो नहीं है।
सियासत का यह भी एक दिलचस्प पहलू है कि जो नेता कभी जनता के बीच जाकर विरोध की राजनीति करते हैं, वही जब बड़े ओहदे पर पहुंच जाते हैं तो उन्हें वही जनता खौफनाक लगने लगती है। कभी-कभी तो यह डर इतना बढ़ जाता है कि काले रंग के कपड़े भी उन्हें बगावत की साजिश नजर आने लगते हैं।
सच तो यह है कि यह सिर्फ किसी एक पार्टी की कहानी नहीं है। सरकार किसी की भी हो, बीजेपी की, कांग्रेस की या किसी और की। सत्ता का मिजाज अक्सर एक जैसा हो जाता है। कुर्सी पर बैठते ही विरोध की आवाजें उन्हें नागवार गुजरने लगती हैं।
अगर काले रंग से इतनी ही परेशानी है तो क्यों न इसे ही बैन कर दिया जाए। न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी। कम से कम महिलाओं को यूं शर्मिंदगी और बेइज्जती का सामना तो नहीं करना पड़ेगा।
लेकिन असली जरूरत किसी रंग को बैन करने की नहीं है। जरूरत है उस सोच को बदलने की, जो विरोध को दुश्मनी समझ बैठती है। लोकतंत्र की खूबसूरती ही यही है कि यहां असहमति की गुंजाइश रहती है।
आखिर काला रंग बुरा कैसे हो सकता है? जब सियासत में ‘काले कारनामे’ करने से किसी को परहेज नहीं होता, तो फिर काले झंडे से इतनी परेशानी क्यों? लोकतंत्र की असली ताकत रंगों को दबाने में नहीं, बल्कि हर रंग को जगह देने में है।
-लेखक भटनेर पोस्ट मीडिया ग्रुप के चीफ एडिटर हैं







