




भटनेर पोस्ट डेस्क.
हनुमानगढ़ टाउन की पुरानी नगर पालिका का प्रांगण इन दिनों किसी जीवंत लोकचित्र में बदल गया है। फागुन की सांझ ढलते ही जैसे ही रात्रि की पहली रोशनी जलती है, हवा में रंगों की गंध घुल जाती है और चंग की थाप दिल की धड़कन से ताल मिलाने लगती है। हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी होली का पारंपरिक उत्सव पूरे हर्षाेल्लास और सांस्कृतिक गरिमा के साथ मनाया जा रहा है ऐसा उत्सव, जहां देखने वाला केवल दर्शक नहीं रहता, बल्कि खुद उस रंगीन संसार का हिस्सा बन जाता है।

उत्सव का आयोजन पारंपरिक धमाल-चंग कार्यक्रम के माध्यम से किया जा रहा है, जो इस अंचल की लोक संस्कृति की सशक्त पहचान है। मंच पर सजी चंग-ढोलक, लोकधुनों से सुसज्जित वाद्य और रंगीन रोशनियों में नहाया प्रांगण, सब मिलकर यह संकेत दे देते हैं कि यहां कोई साधारण कार्यक्रम नहीं, बल्कि परंपरा का उत्सव रचा जा रहा है। कार्यक्रम का शुभारंभ व्यापार मंडल शिक्षण समिति के अध्यक्ष बालकिशन गोल्याण, पवन खदरिया एवं प्रेम पारीक ने सामूहिक रूप से किया। दीप प्रज्ज्वलन के साथ ही तालियों की गूंज उठी और माहौल में उत्साह की पहली लहर दौड़ गई।

धमाल कार्यक्रम की शुरुआत कलाकार द्वारपाल की भावपूर्ण गणेश वंदना से हुई। सुर जैसे ही मंच से फिसले, पूरा प्रांगण श्रद्धा और उल्लास से भर उठा। इसके बाद ‘होली खेलो रे कन्हैया’ की प्रस्तुति ने मानो फागुन को खुला निमंत्रण दे दिया। गीत की हर पंक्ति के साथ रंग और राग घुलते गए, और श्रोताओं के चेहरे पर मुस्कान अपने आप खिल उठी। यह वह क्षण था, जब लगा कि समय ने थोड़ी देर के लिए अपनी चाल धीमी कर ली है।

इसके पश्चात गोरबंद चंग पार्टी के प्रसिद्ध कलाकारों ने जब रंगारंग धमाल प्रस्तुत किया, तो वातावरण पूरी तरह होलीमय हो गया। चंग की गूंज, ढोलक की थाप और लोकस्वरों की मिठास ने ऐसा समां बांधा कि प्रांगण में बैठा हर व्यक्ति खुद को लोकगीतों की नदी में बहता महसूस करने लगा। ‘रंग झीनो रे’ की धुन पर तालियां खुद-ब-खुद बज उठीं, ‘रुत आई पपीहा तेरे बोलण गी’ ने मन में फागुन की पीली धूप उतार दी, तो ‘भाभी म्हारी है पतासी’ पर हंसी और ठहाकों की लहर दौड़ पड़ी।

धमाल प्रस्तुतियों में ओम स्वामी, जगदीश सिराव, आनंद जोशी, संजय सेन, चंद्र स्वामी, दिनेश स्वामी, बृजलाल, सुंदर बंसल, संजय शर्मा, दीपक पारीक, संजय पांडिया, मोहन शर्मा एवं कमलेश स्वामी ने अपनी विशिष्ट प्रस्तुतियों से मंच को जीवंत बना दिया। किसी की आवाज़ में लोक की खनक थी, तो किसी की ताल में वर्षों की साधना की छाप। हर कलाकार अपनी प्रस्तुति के साथ जैसे परंपरा का एक-एक रंग दर्शकों के सामने खोल रहा था। प्रांगण में मौजूद दर्शकों की उपस्थिति भी कम मनोहारी नहीं थी। बुजुर्गों की आंखों में बीती होलियों की यादें तैर रही थीं और युवा ताल से ताल मिलाकर पूरे जोश में नजर आ रहे थे। बच्चों की खिलखिलाहट और तालियों की निरंतर गूंज इस बात का प्रमाण थी कि यह उत्सव पीढ़ियों को जोड़ने का काम कर रहा है।
एडवोकेट मदन पारीक बताते हैं कि यह सांस्कृतिक आयोजन 27 फरवरी से 2 मार्च तक प्रतिदिन रात्रि 8 बजे से 11 बजे तक आयोजित किया जा रहा है। जैसे-जैसे रात गहराती है, लोकसंगीत का जादू और प्रगाढ़ होता जाता है।

कार्यक्रम के सफल आयोजन में हनुमान मंदिर चोतिना कुआं समिति का विशेष सहयोग रहा है। समिति ने शहरवासियों से अधिक से अधिक संख्या में उपस्थित होकर इस लोक सांस्कृतिक उत्सव को सफल बनाने की अपील की है। व्यापारी नेता बालकृष्ण गोल्याण कहते हैं, ‘हनुमानगढ़ टाउन की पुरानी नगर पालिका में सजी यह होली सिर्फ रंगों का पर्व नहीं, बल्कि लोकसंस्कृति का उत्सव है, जहां हर गीत में इतिहास है, हर ताल में परंपरा है और हर चेहरे पर फागुन की चमक। यहां मौजूद होना, दरअसल होली को देखना नहीं, उसे जीना है।’




