





भटनेर पोस्ट डेस्क
1 अप्रैल यानी वह दिन जब समझदार से समझदार आदमी भी दो बार सोचकर बात करता है। दुनिया भर में इसे अप्रैल फूल डे या मूर्ख दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस दिन हल्की-फुल्की शरारतें, मज़ाक और प्रैंक आम बात हैं। लेकिन परंपरा यही कहती है कि हंसी हो, दिल न दुखे वरना मज़ाक भी बेअदबी बन जाता है।
अप्रैल फूल डे की शुरुआत को लेकर कोई एक पक्की तारीख या दस्तावेज़ मौजूद नहीं है। इतिहासकारों की मानें तो इसकी जड़ें 16वीं शताब्दी के फ्रांस से जुड़ी मानी जाती हैं। उस दौर में यूरोप में कैलेंडर प्रणाली बदली जा रही थी। पहले जूलियन कैलेंडर के अनुसार नया साल मार्च के अंतिम दिनों, यानी लगभग 1 अप्रैल के आसपास मनाया जाता था। बाद में ग्रेगोरियन कैलेंडर लागू हुआ, जिसमें नया साल 1 जनवरी से शुरू होने लगा।
समस्या यह थी कि उस समय न तो व्हाट्सएप था, न अख़बार, न ब्रेकिंग न्यूज़। कई लोगों को इस बदलाव की जानकारी ही नहीं मिल पाई। वे पुराने हिसाब से अप्रैल के आसपास ही नया साल मनाते रहे। ऐसे लोगों को समाज के ‘अतिसूचनाधारी’ वर्ग ने ‘अप्रैल फूल’ कहना शुरू कर दिया। बस, यहीं से ‘मूर्ख बनाने’ की परंपरा ने इतिहास में एंट्री मार दी।
फ्रांस में इस दिन को एक और दिलचस्प नाम मिला, अप्रैल की मछली। वहां मज़ाक का तरीका भी थोड़ा कलात्मक था। किसी अनजान व्यक्ति की पीठ पर कागज़ की मछली चुपके से चिपका दी जाती थी और फिर उसकी मासूमियत पर ठहाके लगाए जाते थे। मतलब साफ है, मज़ाक भी शालीन, और अपमान से दूर।
कुछ इतिहासकार अप्रैल फूल डे को प्राचीन रोमन परंपराओं से भी जोड़ते हैं। वसंत ऋतु के दौरान मौसम की अनिश्चितता, अचानक बदलता मिज़ाज और प्रकृति के साथ होने वाला ‘धोखा’, इन सबको भी इस परंपरा की पृष्ठभूमि माना जाता है। इंसान जब मौसम से चकमा खा सकता है, तो इंसान से क्यों नहीं, शायद यही सोच रही होगी रोमन सभ्यता।
18वीं शताब्दी तक यह परंपरा ब्रिटेन और अन्य यूरोपीय देशों में फैल चुकी थी। बाद में उपनिवेशों के ज़रिए यह परंपरा दुनिया के बाकी हिस्सों तक पहुंची। भारत में भी इसे शहरी संस्कृति और मीडिया के असर से लोकप्रियता मिली। हालांकि यहां एक बात हमेशा याद रखी गई, मज़ाक वही, जिसमें मर्यादा बनी रहे।
आज के दौर में अप्रैल फूल डे सोशल मीडिया, न्यूज़ हेडलाइंस और वायरल मैसेज का दिन बन चुका है। कभी-कभी लोग मज़ाक के नाम पर सीमा लांघ देते हैं, जबकि परंपरा की आत्मा कुछ और ही कहती है। असली अप्रैल फूल वही है, जो हंसा भी दे और रिश्ते भी न बिगाड़े।
तो 1 अप्रैल को अगर कोई आपको ‘फूल’ बनाने की कोशिश करे, तो मुस्कुरा दीजिए। आखिर सदियों पुरानी इस परंपरा का मकसद बेवकूफ़ बनाना नहीं, बल्कि ज़िंदगी को थोड़ा हल्का बनाना है। और हां, मज़ाक करें, मगर इतना नहीं कि अगला साल भी कोई आपसे बात न करे।







