



डॉ. संतोष राजपुरोहित.
मध्य-पूर्व विश्व ऊर्जा राजनीति का केंद्र रहा है। हाल के वर्षों में अमरीका, इज़राइल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने वैश्विक ऊर्जा बाज़ार को अस्थिर बना दिया है। विशेष रूप से 2023 के बाद गाज़ा संघर्ष, ईरान पर प्रतिबंध, और हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य में बढ़ती सैन्य गतिविधियों ने तेल और गैस की आपूर्ति तथा कीमतों पर गहरा प्रभाव डाला है। भारत जैसे ऊर्जा आयातक देश के लिए यह संकट केवल भू-राजनीतिक घटना नहीं बल्कि आर्थिक स्थिरता, महँगाई और विकास दर से सीधे जुड़ा मुद्दा है।
विश्व ऊर्जा संरचना में मध्य-पूर्व का महत्व अत्यधिक है। वैश्विक तेल भंडार का लगभग 48 फीसदी हिस्सा इसी क्षेत्र में है और दुनिया के कुल तेल निर्यात का लगभग 30-35 फीसदी हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है। यह वही मार्ग है जिसके आसपास ईरान और अमरीका-इज़राइल के बीच तनाव सबसे अधिक दिखाई देता है। यदि किसी कारण से इस जलडमरूमध्य में आपूर्ति बाधित होती है तो विश्व बाजार में तेल की कीमतों में अचानक उछाल आ सकता है। उदाहरण के लिए, 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद ब्रेंट क्रूड की कीमत लगभग 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुँच गई थी। इसी प्रकार यदि मध्य-पूर्व संकट गहरा होता है तो कई विशेषज्ञ कीमतों के 110-130 डॉलर प्रति बैरल तक जाने की संभावना व्यक्त करते हैं।

भारत के लिए यह स्थिति अत्यंत संवेदनशील है क्योंकि देश अपनी ऊर्जा जरूरतों का लगभग 85 फीसदी कच्चा तेल और लगभग 50 फीसदी प्राकृतिक गैस आयात करता है। 2023-24 में भारत ने लगभग 232 मिलियन टन कच्चा तेल आयात किया, जिसकी लागत लगभग 160 अरब डॉलर के आसपास रही। यदि तेल की कीमतों में केवल 10 डॉलर प्रति बैरल की वृद्धि होती है तो भारत के आयात बिल में लगभग 15 अरब डॉलर तक की अतिरिक्त वृद्धि हो सकती है। इससे चालू खाते का घाटा बढ़ता है और रुपये पर दबाव पड़ता है।

ईरान भारत के लिए ऐतिहासिक रूप से एक महत्वपूर्ण तेल आपूर्तिकर्ता रहा है। 2018 से पहले भारत अपनी कुल तेल आवश्यकताओं का लगभग 10 फीसदी ईरान से आयात करता था। लेकिन अमरीकी प्रतिबंधों के बाद यह आयात लगभग शून्य हो गया। परिणामस्वरूप भारत को सऊदी अरब, इराक, संयुक्त अरब अमीरात और हाल के वर्षों में रूस से अधिक तेल आयात करना पड़ा। 2024 तक रूस भारत का सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता बन गया, जिसकी हिस्सेदारी लगभग 35 फीसदी तक पहुँच गई है। हालांकि यह रणनीति भारत को सस्ते तेल का लाभ देती है, लेकिन भू-राजनीतिक जोखिम भी बढ़ाती है।
मध्य-पूर्व संकट का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू प्राकृतिक गैस बाजार है। यूरोप में ऊर्जा संकट के बाद एलएनजी की वैश्विक मांग बढ़ी है। भारत की गैस खपत लगभग 60 बिलियन क्यूबिक मीटर प्रतिवर्ष है, जिसमें से लगभग 45 फीसदी आयातित एलएनजी से पूरी होती है। यदि क्षेत्रीय संघर्ष के कारण कतर या अन्य गैस आपूर्तिकर्ता प्रभावित होते हैं तो भारत में गैस आधारित बिजली उत्पादन और उर्वरक उद्योग पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

तेल-गैस की कीमतों में वृद्धि का सीधा प्रभाव भारत की महँगाई पर पड़ता है। भारत में परिवहन, उर्वरक, बिजली और उद्योग में ऊर्जा का बड़ा हिस्सा पेट्रोलियम उत्पादों पर निर्भर है। यदि अंतरराष्ट्रीय कीमतें बढ़ती हैं तो सरकार को या तो पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ानी पड़ती हैं या करों में कटौती करनी पड़ती है। दोनों ही स्थितियाँ अर्थव्यवस्था के लिए चुनौतीपूर्ण होती हैं। उदाहरण के लिए, 2022 में तेल कीमतों में वृद्धि के कारण भारत में खुदरा महँगाई दर लगभग 7 फीसदी तक पहुँच गई थी।

हालाँकि इस संकट के बीच भारत के लिए कुछ अवसर भी मौजूद हैं। भारत ने ऊर्जा सुरक्षा के लिए ऊर्जा स्रोतों का विविधीकरण अपनाया है। रूस से सस्ता तेल, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया से एलएनजी, तथा अफ्रीकी देशों से नए तेल अनुबंध इस रणनीति का हिस्सा हैं। इसके अलावा भारत ने रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार भी विकसित किए हैं जिनकी क्षमता लगभग 5.3 मिलियन टन है, जिसे भविष्य में बढ़ाने की योजना है।
दीर्घकालिक दृष्टि से भारत नवीकरणीय ऊर्जा की ओर तेजी से बढ़ रहा है। भारत का लक्ष्य 2030 तक 500 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता स्थापित करना है। सौर, पवन और हरित हाइड्रोजन के क्षेत्र में निवेश बढ़ाकर भारत आयातित तेल-गैस पर निर्भरता कम करना चाहता है। यदि यह रणनीति सफल होती है तो भविष्य में मध्य-पूर्व के भू-राजनीतिक संकटों का भारत की अर्थव्यवस्था पर प्रभाव सीमित हो सकता है।

अमरीका-इज़राइल-ईरान संकट केवल क्षेत्रीय राजनीतिक टकराव नहीं बल्कि वैश्विक ऊर्जा व्यवस्था को प्रभावित करने वाला महत्वपूर्ण कारक है। भारत जैसे बड़े ऊर्जा आयातक देश के लिए यह संकट महँगाई, व्यापार घाटा और ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ी चुनौतियाँ पैदा करता है। किंतु ऊर्जा स्रोतों के विविधीकरण, रणनीतिक भंडार और नवीकरणीय ऊर्जा के विस्तार के माध्यम से भारत इन चुनौतियों को अवसर में बदलने की दिशा में आगे बढ़ सकता है। भविष्य की ऊर्जा नीति का मूल लक्ष्य यही होना चाहिए कि भारत वैश्विक भू-राजनीतिक अस्थिरताओं के बावजूद अपनी ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता को सुनिश्चित कर सके।
-लेखक भारतीय आर्थिक परिषद के सदस्य हैं




