




डॉ. संतोष राजपुरोहित.
हाल के दिनों में भारतीय रुपये में आई तेज गिरावट ने आम नागरिक से लेकर नीति-निर्माताओं तक सभी को फिक्रमंद कर दिया है। खबरों के मुताबिक, रुपया डॉलर के मुकाबले 95 के नीचे तक फिसल गया है, जिसे पिछले लगभग 14 वर्षों की सबसे बड़ी गिरावट माना जा रहा है। यह सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि भारतीय अर्थव्यवस्था के भीतर मौजूद कई गहरी चुनौतियों का आईना है।
सबसे पहले यह समझना ज़रूरी है कि रुपये की कीमत गिरती क्यों है। किसी भी मुद्रा का मूल्य मूलतः मांग और आपूर्ति से तय होता है। जब विदेशी मुद्रा, खासकर डॉलर, की मांग बढ़ती है और उसकी उपलब्धता सीमित होती है, तो रुपया कमजोर पड़ता है। भारत एक आयात-प्रधान देश है, विशेषकर कच्चे तेल के मामले में। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होते ही भारत को ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ते हैं, जिससे डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपया दबाव में आ जाता है।

दूसरा अहम कारण है विदेशी निवेश का रुख। जब विदेशी संस्थागत निवेशक (एफआईआई) भारतीय बाजार से पैसा निकालते हैं, तो वे उसे डॉलर में बदलकर बाहर ले जाते हैं। हाल के समय में वैश्विक अनिश्चितताओं, खासकर अमेरिका में ब्याज दरों में बढ़ोतरीकृने निवेशकों को सुरक्षित ठिकानों की ओर मोड़ा है। नतीजतन, भारत से पूंजी का बहिर्वाह बढ़ा और रुपये पर और बोझ पड़ा।

अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम पर नजर डालें तो विदेशी निवेशकों की बिकवाली, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और वैश्विक बाजार में डॉलर की मजबूती, तीनों मिलकर रुपये की गिरावट को तेज कर रहे हैं। जब अमेरिकी अर्थव्यवस्था मजबूत होती है और Federal Reserve ब्याज दरें बढ़ाता है, तो डॉलर और मजबूत होता है। इसका सीधा असर यह होता है कि अन्य देशों की मुद्राएं, जिनमें रुपया भी शामिल है, कमजोर पड़ जाती हैं।

इस पूरी प्रक्रिया में भारतीय रिजर्व बैंक की भूमिका भी अहम रहती है। आरबीआई समय-समय पर बाजार में हस्तक्षेप कर डॉलर बेचता है ताकि रुपये को सहारा मिल सके। हालांकि, यह हस्तक्षेप असीमित नहीं हो सकता, क्योंकि विदेशी मुद्रा भंडार की भी अपनी सीमाएं हैं। हाल के नियमों में बदलाव, जैसे बैंकों की ओपन पोजीशन लिमिट में ढील, अल्पकालिक स्थिरता लाने के प्रयास हैं, लेकिन जब तक बुनियादी आर्थिक कारण मजबूत नहीं होंगे, ऐसे कदम स्थायी राहत नहीं दे सकते।

रुपये की गिरावट का सबसे सीधा असर महंगाई पर पड़ता है। कमजोर रुपया आयातित वस्तुओं को महंगा बना देता है। पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ते हैं, परिवहन लागत बढ़ती है और अंततः हर चीज़ की कीमत ऊपर चली जाती है। इसका खामियाज़ा आम आदमी को अपनी जेब से चुकाना पड़ता है।
हालांकि, इस तस्वीर का एक दूसरा पहलू भी है। कमजोर रुपया निर्यात को बढ़ावा देता है क्योंकि भारतीय उत्पाद विदेशों में सस्ते हो जाते हैं। आईटी, फार्मा और निर्यात-उन्मुख उद्योगों को इससे फायदा होता है। लेकिन सच्चाई यह है कि भारत जैसे आयात-निर्भर देश में नकारात्मक प्रभाव ज्यादा नुमाया होते हैं।
दीर्घकालिक समाधान के लिए भारत को अपनी आयात निर्भरता कम करनी होगी, खासकर ऊर्जा क्षेत्र में। आत्मनिर्भरता बढ़ाने, निर्यात क्षमता सुधारने और गुणवत्ता पर जोर देने की जरूरत है। ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ जैसे अभियानों को कागज़ से निकालकर ज़मीन पर उतारना अब वक्त की मांग है।

साथ ही, विदेशी निवेश को आकर्षित और बनाए रखने के लिए नीतिगत स्थिरता, पारदर्शिता और मजबूत बुनियादी ढांचे पर काम करना होगा। रुपये की गिरावट कोई एक-दिन की समस्या नहीं है। यह एक जटिल आर्थिक चुनौती है, जिसका हल समन्वित नीति, मजबूत आर्थिक बुनियाद और वैश्विक हालात पर पैनी नजर से ही निकलेगा। अगर सही दिशा में कदम उठाए गए, तो यह संकट कल का मौका भी बन सकता है।
-लेखक भारतीय आर्थिक परिषद के सदस्य हैं




