






गोपाल झा.
अजीब दौर है यह। अधिकांश लोग रात को अपने दिल-दिमाग में शिकायतों का पिटारा लेकर सोते हैं और सुबह उठते ही उस पिटारे का हिसाब-किताब खोलकर दिन की शुरुआत करते हैं। नतीजा यह होता है कि जीवन के अनमोल क्षण शिकायतों और गिले-शिकवों में ही जाया हो जाते हैं। दरअसल, शिकायत करना आसान है, पर उन कसौटियों पर खुद को कसना बेहद मुश्किल, जिन पर खरे न उतरने से शिकायत जन्म लेती है। लोग दूसरों के व्यवहार, आदतों और रवैये पर तो सवाल उठाते हैं, मगर वही कठोर नजरें अपने स्वभाव की ओर मोड़ने का साहस नहीं जुटा पाते।

ऐसे लोग हर जगह मिल जाते हैं, जो दिन-रात दूसरों से गिले-शिकवे करते रहते हैं। पहले तक यह सिलसिला घर-परिवार और मोहल्लों तक सीमित था, अब ‘चुगली-चांटी’ ने सोशल मीडिया का रास्ता पकड़ लिया है। फेसबुक की दीवारें और व्हाट्सऐप के ग्रुप मानो शिकायतों की डायरी बन चुके हैं। बात-बात पर तंज़, कटाक्ष और व्यंग्य, कभी किसी तस्वीर पर, कभी किसी पोस्ट पर। कब नजरों की हया मिट गई और कब मर्यादा की सीमाएँ टूट गईं, इसका एहसास किसी को नहीं हुआ।

लेकिन यह सच है कि सोशल मीडिया ने समाज के असली रूप को उजागर कर दिया है। जो लोग बाहर से ‘बेहतर’ दिखाई देते थे, उनकी असलियत सामने आते ही वे ‘कमतर’ नज़र आने लगे। एक मायने में देखें तो यह भी समय की विडंबना है कि जो दुनिया दिखावे पर टिकी थी, वह अब धीरे-धीरे बेनकाब हो रही है।

सवाल यह है कि क्या शिकायत करना ही समाधान है? यदि कोई अपने व्यक्तित्व को वास्तव में बदलना चाहता है तो रास्ता साफ है। साहित्य और संगीत जैसे माध्यम आत्मा को शुद्ध करने की क्षमता रखते हैं। कुछ ग़ज़लें सुनना, अच्छी किताबें पढ़ना और फिर उन्हें महसूस करना। यही आत्मिक बदलाव की शुरुआत है।

जब कोई इंसान शब्दों की गहराई में उतरता है और उन्हें अपने स्वभाव में ढालने का प्रयास करता है, तो उसकी शिकायतें अपने आप क्षीण होने लगती हैं। यही आत्ममंथन की शक्ति है। दूसरों की जगह खुद को रखकर सोचना कि उस परिस्थिति में हम क्या करते। यही सोच शिकायतों की आग को बुझा सकती है।

आज का समय रिश्तों के लिहाज से निःसंदेह भयावह है। हर कोई आत्ममुग्ध दिखाई देता है। संवाद का अर्थ सिर्फ़ ‘हाँ’ सुनना रह गया है। ‘ना’ किसी को स्वीकार्य नहीं। यदि आपने असहमति जता दी, तो तुरंत आप ‘अच्छे’ लोगों की सूची से बाहर हो जाते हैं। यह प्रवृत्ति रिश्तों को खोखला बना रही है। वरिष्ठ पत्रकार और शायर प्रताप सोमवंशी की पंक्तियाँ यहाँ प्रासंगिक प्रतीत होती हैं,
जहाँ सच है, वहाँ पर हम खड़े हैं,
इसी खातिर तो, कईयों की आँखों में गड़े हैं।

वास्तव में संवाद की असफलता ही शिकायतों का मूल है। लोग ताली बजाना चाहते हैं लेकिन एक हाथ से। तालियों की गूंज तभी बनती है जब दोनों हाथ मिलते हैं। यही स्थिति रिश्तों और संवाद की भी है। जब एक पक्ष केवल वफ़ा करता है और दूसरा केवल जफ़ा, तो रिश्ते टूटने लगते हैं। शायर राजा मेहदी अली खाँ के ये शब्द इस स्थिति को मार्मिक ढंग से व्यक्त करते हैं,
है इसी में प्यार की आबरू, वो जफ़ा करें मैं वफ़ा करूँ,
जो वफ़ा भी काम न आ सके तो वही कहें कि मैं क्या करूँ।

लेकिन रिश्तों के द्वंद्व में इतना समर्पण संभव है क्या ? खैर। कभी-कभी लोग बेमतलब सवाल पूछकर आपकी ऊर्जा नष्ट करना चाहते हैं। उनका मक़सद जवाब पाना नहीं होता, बल्कि आपकी शांति को भंग करना होता है। यदि आप चुप्पी साध लें, तो उन्हें यह भी बर्दाश्त नहीं होता। लेकिन चुप रहना कई बार सबसे बड़ा उत्तर होता है। शायर राजेंद्र कृष्ण का शेर यहां बिलकुल सटीक बैठता है,
उनको ये शिकायत है कि हम कुछ नहीं कहते,
अपनी तो ये आदत है कि हम कुछ नहीं कहते।
कुछ कहने पे तूफ़ान उठा लेती है दुनिया,
अब इस पे क़यामत है कि हम कुछ नहीं कहते।

बेशक, ऐसे हालात में सबसे बेहतर यही है कि हम शिकायतों और बेमतलब की चर्चाओं से दूरी बना लें। अपनी पारिवारिक, सामाजिक और व्यवसायिक ज़िम्मेदारियों के साथ-साथ अपने लिए भी समय निकालें। किताबें पढ़ें, अच्छे गीत सुनें, शब्दों और सुरों के भावों को महसूस करें और उन्हें जीवन में आत्मसात करें। धीरे-धीरे शिकायतों का बोझ हल्का पड़ने लगेगा और सकारात्मकता भीतर जगह बनाने लगेगी।
यह दौर शिकायतों का है, लेकिन हम इसे आत्ममंथन और आत्मसुधार का दौर भी बना सकते हैं। हमें यह तय करना होगा कि हम शिकायतों की आग में जलते रहेंगे या साहित्य, संगीत और आत्मसंवाद की रोशनी में नया जीवन ढूँढेंगे। जो बदलाव हम दुनिया में देखना चाहते हैं, उसकी शुरुआत स्वयं से करनी होगी। तभी शिकायतों का शोर थमेगा और रिश्तों का संगीत फिर से सुनाई देने लगेगा।
-लेखक भटनेर पोस्ट मीडिया ग्रुप के चीफ एडिटर हैं


