




निराला झा
गुरु पूर्णिमा कोई चुपचाप आता है और एक सीधा सवाल छोड़ जाता है, क्या हम अब भी सीखने को तैयार हैं? भारतीय परंपरा में गुरु को केवल शिक्षक नहीं माना गया, बल्कि वह व्यक्ति माना गया है जो अज्ञान से ज्ञान, भ्रम से विवेक और असमंजस से दिशा की ओर ले जाए। यही वजह है कि गुरु पूर्णिमा का महत्व सदियों बाद भी कम नहीं हुआ, बल्कि बदलते दौर में और गहरा हो गया है।
गुरु पूर्णिमा का संबंध महर्षि वेदव्यास से जोड़ा जाता है। वेदों का संकलन, महाभारत की रचना और पुराण परंपरा, भारतीय ज्ञान-व्यवस्था की रीढ़ इन्हीं के नाम से जुड़ी है। इसी कारण यह दिन ‘व्यास पूर्णिमा’ भी कहलाता है। गुरु को यहां अंधकार हटाने वाला कहा गया यानि वह जो सिर्फ जानकारी नहीं देता, बल्कि सोच को साफ करता है।
पर सवाल यह है कि आज, जब हर जवाब गूगल पर मिल जाता है, तब गुरु की जरूरत क्यों? सच यही है कि आज जानकारी बहुत है, लेकिन समझ कम है। डेटा है, लेकिन दिशा नहीं। सोशल मीडिया राय देता है, लेकिन जिम्मेदारी नहीं लेता। ऐसे में गुरु का रोल और अहम हो जाता है। गुरु वह होता है जो बताता है कि क्या जानना जरूरी है और क्या छोड़ देना चाहिए।
मौजूदा दौर में गुरु की परिभाषा बदल गई है। आज गुरु केवल क्लासरूम में नहीं बैठा होता। वह मेंटर हो सकता है, बॉस, सीनियर, कोच या वह व्यक्ति भी, जिसने जीवन के किसी मोड़ पर बिना स्वार्थ सही सलाह दी हो। फर्क सिर्फ इतना है कि पहले गुरु की पहचान आसान थी, आज उसे पहचानने के लिए विनम्रता चाहिए।
आज की सबसे बड़ी समस्या ‘मैं सब जानता हूँ’ वाली मानसिकता है। गुरु पूर्णिमा इसी अहंकार पर चोट करती है। यह दिन याद दिलाता है कि सीखना कभी खत्म नहीं होता। तकनीक तेज़ हो सकती है, लेकिन विवेक हमेशा अनुभव से आता है। और अनुभव बिना गुरु के अक्सर महंगा पड़ता है।
कॉर्पाेरेट दुनिया में मेंटरशिप, स्टार्टअप्स में गाइडेंस, खेल में कोच और प्रोफेशनल लाइफ में लाइफ-कोच, ये सब आधुनिक रूप में गुरु परंपरा ही हैं। नाम बदल गए हैं, भावना वही है। जो आगे चल चुका है, वही पीछे वाले का हाथ थामता है। गुरु पूर्णिमा इसी रिश्ते को सम्मान देने का दिन है।
आज के युवा स्वतंत्र हैं, आत्मनिर्भर हैं, यह अच्छी बात है। लेकिन आत्मनिर्भरता का मतलब यह नहीं कि मार्गदर्शन बेकार हो गया। गुरु शॉर्टकट नहीं देता, वह सही रास्ता दिखाता है। वह गलतियों से सीखने की छूट देता है, लेकिन हर गलती खुद करने की ज़िद से बचाता है।
रिश्तों के स्तर पर भी गुरु पूर्णिमा प्रासंगिक है। आज संवाद कम, प्रतिक्रिया ज़्यादा है। गुरु वह है जो डांटता है तो सुधार के लिए, और तारीफ करता है तो ज़मीन से जोड़कर। वह आईना है, जिसमें चेहरा नहीं, चरित्र दिखता है।
आखिर में, गुरु पूर्णिमा पूजा-पाठ या औपचारिक सम्मान का दिन भर नहीं है। यह आत्ममंथन का अवसर है, क्या हम सीखने के लिए खुले हैं? क्या हम सलाह को कमजोरी नहीं, ताकत मानते हैं? और क्या हम खुद किसी के लिए गुरु बन पाने की जिम्मेदारी निभा रहे हैं?
परंपरा कहती है, गुरु बिना ज्ञान अधूरा है। आधुनिक समय कहता है, गुरु बिना दिशा सब बिखरा है। दोनों मिलकर यही बताते हैं कि गुरु पूर्णिमा आज भी उतनी ही ज़रूरी है, जितनी हमेशा रही है, बस अब उसे समझने की ज़रूरत पहले से ज़्यादा है।








