



डोली शाह.
प्रवीण एक सीधा-सादा, सरल और बेहद प्रतिभाशाली बालक था। कद-काठी भले ही नन्ही थी, लेकिन उसका दिमाग ऐसा पैना कि किसी भी विषय पर नजर पड़ते ही दो मिनट में पाँच पन्ने उकेर दे। बचपन से ही यही विशेषता उसे अन्य बच्चों से अलग करती रही और वह विद्यालय के दिनों से ही सबकी आँखों का तारा बन गया। विद्यालय के साथ-साथ कॉलोनी के सामाजिक आयोजनों में भी उसकी भागीदारी बराबर रहती। कहीं वह मंच संचालन करता, तो कहीं किसी प्रतियोगिता में भाग लेकर सबका ध्यान खींच लेता। समय के साथ-साथ वह अपने माता-पिता के लिए गर्व का कारण बनता गया। पिता पहले से ही शहर के नामी-गिरामी उद्यमी थे और बेटे की प्रतिभा उनके सपनों को और ऊँचाइयों तक ले जाती थी।
दसवीं और बारहवीं की पढ़ाई पूरी होने के बाद, प्रवीण की इच्छा अनुसार पिता ने उसे भारत के एक प्रख्यात इंजीनियरिंग महाविद्यालय में दाखिला दिलाया। वहाँ भी उसने मन लगाकर पढ़ाई की और मात्र छह माह में ही अपनी अलग पहचान बना ली। अंतिम वर्ष में पहुँचते-पहुँचते उसे एक निजी कंपनी में नौकरी मिल गई।
हालाँकि माता-पिता खुश थे, पर ऐश्वर्य में पले प्रवीण को लाख-सवा लाख की नौकरी से संतोष नहीं हुआ। उसने स्वयं का उद्योग स्थापित करने का निश्चय किया और ईंट निर्माण की एक फैक्ट्री की नींव रखी। पिता ने भी भरपूर आर्थिक सहयोग दिया। आधुनिक मशीनों और नई तकनीक के सहारे काम तेजी से बढ़ने लगा। कच्चा माल बाहर से आता और प्रवीण अपनी आँखों के सामने उसे साकार रूप लेते देखता। जल्द ही ‘एस-एस ब्रिक्स’ का नाम देश के कोने-कोने में फैलने लगा। काम बढ़ने पर प्रवीण ने तीन अनुभवी कर्मचारियों की नियुक्ति की। वे काम में निपुण थे और चौबीसों घंटे कंपनी के लिए समर्पित रहते। प्रवीण उन्हें अच्छा वेतन देता और वे शिकायत का कोई अवसर नहीं छोड़ते।
सेवा-भाव पिता से विरासत में मिला था। सर्दियों में गरीबों को कंबल बाँटना, त्योहारों पर बच्चों को कपड़े देना, ये सब उसके स्वभाव का हिस्सा था। धीरे-धीरे कंपनी परिवार बन गई। मेहनत के सम्मान में उसने रविवार को अवकाश घोषित कर दिया।
रविवार मौज-मस्ती का दिन बन गया। एक ऐसे ही रविवार की शाम प्रवीण अपने तीनों कर्मचारियों के साथ पहले बीयर बार और फिर तैराकी के लिए गया। सर्द रात, नशे की गर्मी और लापरवाही, सब एक साथ थे। अचानक मौसम बदला। किसी तरह सभी बाहर निकले, लेकिन प्रवीण वहीं मूर्छित होकर गिर पड़ा। अस्पताल पहुँचने पर पता चला कि उसे मिर्गी का दौरा पड़ा था और लंबी बेहोशी के कारण मस्तिष्क ने काम करना बंद कर दिया। प्रवीण इस संसार से विदा हो गया।
यह समाचार माता-पिता के लिए वज्रपात समान था। गाँव, रिश्तेदार और कर्मचारियों के सहयोग से अंतिम संस्कार की रस्में पूरी हुईं, पर माँ वाणी के आँसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। पिता जयराम जी भीतर ही भीतर टूट चुके थे। मन में बार-बार प्रश्न उठता, प्रवीण इतना सतर्क था, फिर उस दिन ऐसा कैसे?
लोगों की कानाफूसी ने संदेह को जन्म दिया। कहा जाने लगा कि कर्मचारियों ने जानबूझकर लापरवाही की। जयराम जी के मन में आग सुलगने लगी। उन्होंने अपनी भतीजी प्रिया, जो पेशे से वकील थी, से सलाह ली। मामला दर्ज हुआ और तीनों कर्मचारी जेल पहुँचा दिए गए। अब विपत्ति दोनों ओर थी। एक ओर बेटे को खो चुके माता-पिता, दूसरी ओर उजड़ते परिवार। एक दिन तीनों कर्मचारियों की पत्नियाँ वाणी के सामने रोती-गिड़गिड़ाती पहुँचीं। वाणी का हृदय द्रवित हो उठा, पर वह मौन रहीं।
रात भर आत्मसंघर्ष के बाद वाणी ने कहा, ‘मृत्यु अटूट सत्य है। यदि यह विधाता की इच्छा थी, तो हम क्यों पाप बटोरें? क्षमा में बदले से अधिक शांति है।’
अगली सुबह जयराम जी ने मुकदमा वापस ले लिया। कंपनी का उत्तरदायित्व उन्होंने गाँव के एक गरीब परिवार की बेटी रिया के नाम कर दिया। यह निर्णय उन्हें भीतर से हल्का कर गया। धीरे-धीरे नए संबंध बने, टूटी हुई जिंदगियों को सहारा मिला और जयराम जी व वाणी को भी जीवन का नया अर्थ। अटूट सत्य यही है, मृत्यु टाली नहीं जा सकती, पर करुणा और क्षमा से जीवन को फिर भी सुंदर बनाया जा सकता है।






