



रोहित अग्रवाल.
हर बजट अपने साथ उम्मीदों की लंबी सूची लेकर आता है। इस बार भी वही कहानी है, मध्यम वर्ग राहत चाहता है, किसान सुरक्षा चाहता है, युवा रोज़गार चाहता है, व्यापारी स्थिरता चाहता है और उद्योग भरोसा चाहता है। सवाल सीधा है, क्या सरकार इस बार सिर्फ़ भाषण देगी या ज़मीन पर असर दिखाने वाला बजट लाएगी? राजस्थान आज कई मोर्चों पर दबाव में है। जल संकट गहराता जा रहा है, कृषि की लागत बढ़ रही है, एमएसएमई जूझ रहे हैं, निवेश सुस्त है और शहर बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं। ऐसे में यह बजट केवल वित्तीय दस्तावेज़ नहीं, शासन की नीयत की परीक्षा है। मध्यम वर्ग देश का सबसे ईमानदार करदाता है और सबसे ज़्यादा अनदेखा भी। महंगाई बढ़ी, शिक्षा महंगी हुई, इलाज खर्चीला हुआ, लेकिन कर राहत नाम की चिड़िया उड़ती रही। इस बजट से साफ़ उम्मीद है कि आयकर स्लैब में वास्तविक राहत मिले, स्टैंडर्ड डिडक्शन बढ़े और स्वास्थ्य-शिक्षा पर कर-छूट को व्यावहारिक बनाया जाए।

जीएसटी में दरों का सरलीकरण और अनावश्यक नोटिसों पर रोक भी ज़रूरी है। कर प्रणाली भय की नहीं, भरोसे की होनी चाहिए। अमनेस्टी योजना के ज़रिये पुराने विवाद सुलझें तो व्यापार भी सांस लेगा और राजस्व भी बढ़ेगा। एमएसएमई को अर्थव्यवस्था की रीढ़ कहा जाता है, लेकिन व्यवहार में उन्हें बैसाखी भी नहीं मिलती। सस्ती क्रेडिट सुविधा, ब्याज सब्सिडी, समयबद्ध भुगतान और तकनीकी उन्नयन के लिए ठोस पैकेज जरूरी है। एमएलयूपीवाई जैसी योजनाओं में वर्षों से अटका ब्याज अनुदान यह बताता है कि घोषणाओं और ज़मीनी हकीकत में कितना फासला है। स्किल लिंक्ड जॉब्स पर ज़ोर दिए बिना युवाओं को सिर्फ़ प्रशिक्षण देकर छोड़ देना बेरोज़गारी का इलाज नहीं है। उद्योग आएगा, तभी रोज़गार बनेगा, यह सीधा गणित है।

राजस्थान का किसान सिर्फ़ मौसम से नहीं लड़ता, व्यवस्था से भी जूझता है। सिंचाई, माइक्रो इरिगेशन, फसल बीमा का प्रभावी क्रियान्वयन और समय पर भुगतान उसकी पहली ज़रूरत है। जल संरक्षण, वर्षा जल संचयन, नहरों का आधुनिकीकरण और सौर ऊर्जा आधारित पंपों पर विशेष आवंटन अब विकल्प नहीं, मजबूरी है। जल बिना कृषि, कृषि बिना ग्रामीण विकास और ग्रामीण बिना शहरकृयह श्रृंखला अगर टूटी तो पूरा ढांचा ढह जाएगा।

स्मार्ट सिटी के बोर्ड लग गए, लेकिन कई शहरों में सीवरेज, कचरा प्रबंधन और सार्वजनिक परिवहन आज भी भगवान भरोसे हैं। सड़क, रेल, लॉजिस्टिक्स और औद्योगिक कॉरिडोर में निवेश ज़रूरी है, लेकिन साथ ही हाउसिंग, पानी और सफाई पर खर्च बढ़ाना भी उतना ही जरूरी है। शहरों को रहने लायक बनाना सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए, न कि केवल पोस्टर लायक।

सरकारी स्कूलों में गुणवत्ता, कॉलेजों में कौशल आधारित शिक्षा और डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर पर फोकस जरूरी है। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों से लेकर जिला अस्पतालों तक संसाधन बढ़ें। वरिष्ठ नागरिक, महिलाएं और वंचित वर्ग के लिए सामाजिक सुरक्षा योजनाएं मजबूत हों। यह खर्च नहीं, निवेश है, भविष्य में लौटकर मिलने वाला। नवीकरणीय ऊर्जा, ई-वाहन, ग्रीन हाइड्रोजन और कार्बन क्रेडिट जैसे क्षेत्र भविष्य की दिशा तय करेंगे। राजस्थान का पर्यटनकृधरोहर, धार्मिक और इको टूरिज्म, रोज़गार का बड़ा स्रोत बन सकता है, बशर्ते बुनियादी ढांचा और मार्केटिंग मजबूत हो। हमारे किले और मेले केवल विरासत नहीं, रोज़गार की फैक्ट्री बन सकते हैं।

सबसे संवेदनशील मुद्दा है, नए उद्योगों की राह में स्थानीय अवरोध। वैधानिक अनुमति मिलने के बाद भी अगर उद्योग रोके जाते हैं तो यह निवेश के साथ अन्याय है। बजट में स्पष्ट होना चाहिए कि उद्योगपति की कानूनी, प्रशासनिक और भौतिक सुरक्षा राज्य की जिम्मेदारी होगी।
इंडस्ट्रियल प्रोटेक्शन फंड, नो-ऑब्स्ट्रक्शन गारंटी, जिला स्तर पर इंडस्ट्रियल फेसीलिटेशन सेल और अफवाह फैलाने वालों पर सख्त कार्रवाई, ये सब अब विकल्प नहीं, आवश्यकता हैं। जन-सुनवाई को संस्थागत रूप देकर विवाद की गुंजाइश ही खत्म करनी होगी। यह बजट सरकार की नीयत का आईना होगा। अगर इसमें आम आदमी को राहत, किसान को सुरक्षा, युवा को रोज़गार, उद्योग को भरोसा और शहर-गांव को सुविधा मिली, तो यह याद रखा जाएगा। वरना यह भी भाषणों में चमककर फाइलों में गुम हो जाएगा। जनता उम्मीद लगाए बैठी है। अब देखना यह है कि सरकार उस उम्मीद को सम्मान देती है या आंकड़ों की चादर में ढक देती है।
-लेखक जाने-माने कर सलाहकार व टैक्स बार एसोसिएशन के अध्यक्ष हैं




