






डॉ. एमपी शर्मा.
हर दिन हम सैकड़ों फैसले लेते हैं, कुछ बड़े, कुछ छोटे। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इनमें से कितने निर्णय सच में हमारे अपने होते हैं? अक्सर हम समाज की उम्मीदों, परिवार की परंपराओं और दूसरों की सोच के दबाव में जीते हैं। हम वही बनते हैं, जो दुनिया हमें देखना चाहती है और धीरे-धीरे, हमारी अपनी आवाज़, हमारी ख़ुद की पहचान, कहीं गुम हो जाती है। ऐसे में ‘मन की आवाज़’ वो गूंज है, जो हमें हमसे मिलाती है, हमें बताती है कि हम क्या हैं, क्या चाहते हैं, और कहाँ जाना चाहते हैं। लेकिन इस आवाज़ को सुनना आसान नहीं, क्योंकि डर है, तिरस्कार का, अस्वीकार का, असफलता का। फिर भी, अगर आपको खुद से सच्चा रहना है, तो इस आवाज़ को अनसुना नहीं कर सकते। क्योंकि हर बदलाव की शुरुआत यहीं से होती है, अपने मन की सुनने से।
दरअसल, हम सब के भीतर एक आवाज़ होती है, जिसे हम ‘मन की आवाज़’ कहते हैं। यह वही आवाज़ है जो कभी हमें कुछ नया करने को प्रेरित करती है, कभी हमें किसी निर्णय पर सोचने को मजबूर करती है, तो कभी जीवन की भीड़ में हमें खुद से मिलवाती है। लेकिन अक्सर हम इस आवाज़ को नजरअंदाज़ कर देते हैं कृ सिर्फ इसलिए कि हमें डर होता है कि दूसरे क्या सोचेंगे, समाज क्या कहेगा, लोग कैसे लेंगे।
अपने मन की सुनना क्यों ज़रूरी है? पहचान का आधारः जब हम अपने मन की सुनते हैं, तभी हम असली ‘मैं’ को पहचानते हैं। हम क्या सोचते हैं, क्या चाहते हैं, यही हमारी असल पहचान है। अगर हम बार-बार दूसरों की सोच के हिसाब से खुद को ढालते रहेंगे, तो एक दिन हमारी खुद की आवाज़ कहीं खो जाएगी। जो व्यक्ति अपने मन की सुनकर निर्णय लेता है, उसे अपने फैसलों पर गर्व होता है, चाहे परिणाम कुछ भी हो। वह दूसरों को दोष नहीं देता क्योंकि उसने खुद चुना था। जब आप अपने विचारों को महत्व देते हैं, तब ही आप नए रास्ते बना सकते हैं, नई सोच ला सकते हैं। हर बदलाव की शुरुआत इसी से होती है।
लेकिन मन की सुनने से डर क्यों लगता है? लोग क्या कहेंगे? यह सबसे बड़ा डर होता है। समाज की नजरें, रिश्तेदारों की टिप्पणियाँ, दोस्तों की हँसी, ये सब हमें अपने ही विचारों से दूर कर देते हैं। स्वीकृति की इच्छाः हम सब चाहते हैं कि लोग हमें पसंद करें, सराहें। इसलिए हम वैसा ही बोलते या करते हैं जो उन्हें अच्छा लगे, भले ही वह हमारे मन के खिलाफ हो। अगर हमारा फैसला गलत हुआ तो लोग कहेंगे, “देखा! हमने तो पहले ही कहा था!” इस डर से भी लोग अपने मन की नहीं सुनते।
कैसे दृढ़ता से आगे बढ़ें?
दिन में कुछ समय अकेले बैठें और सोचें कि आप क्या चाहते हैं, बिना किसी दबाव या तुलना के। लोगों की राय लें, पर गुलाम न बनेंः सलाह ज़रूरी है, पर फैसला आपका होना चाहिए। छोटे निर्णयों से शुरुआत करेंः अपनी पसंद के कपड़े पहनना, मनचाही किताब पढ़ना, अपने तरीके से समय बिताना, ये सब आत्मनिर्भरता की शुरुआत हैं। याद रखें, जो लोग आज सफल हैं, उन्होंने भी कभी अपने मन की सुनकर जोखिम उठाया था। आत्मसम्मान को प्राथमिकता देंः खुद से सच्चे रहें, भले ही दुनिया को समझाने में समय लगे।
अपने मन की सुनना आत्मविश्वास, आत्मनिर्भरता और आत्मसम्मान की शुरुआत है। हो सकता है, शुरुआत में लोग आपको समझें नहीं, आपकी आलोचना करें, या आपसे दूरी बना लें। लेकिन धीरे-धीरे वही लोग आपकी दृढ़ता को सलाम करेंगे। और सबसे बड़ी बात कृ आप खुद को खोए बिना जी पाएँगे। इसलिए, दूसरों की सोच ज़रूरी है, पर आपकी अपनी सोच उससे कहीं ज़्यादा अनमोल है। ‘दुनिया को बदलना है तो सबसे पहले खुद से सच्चा होना पड़ेगा, अपने मन की सुनकर।’
-लेखक सामाजिक चिंतक, सीनियर सर्जन और आईएमए राजस्थान के प्रदेशाध्यक्ष हैं





